'0.85% वोट ने बदल दिया गणित', हरियाणा में कमल खिलने और पंजा धुलने की इनसाइड स्टोरी

हरियाणा में इस बार विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण ने काफी अहम भूमिका निभाई है। प्रदेश में 36 जातियों के जटिल समीकरण को जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने साधने में सफलता हासिल की, उसका परिणाम चुनाव के नतीजों में स्पष्ट तौर पर नजर आया है।

प्रदेश की सत्ता में 10 साल से काबिज भाजपा ने ना सिर्फ सत्ता विरोधी लहर को समाप्त करने में सफलता हासिल की बल्कि अलग-अलग जातियों को अपने साथ मिलाकर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने में सफल रही।

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सत्ता विरोधी लहर को खत्म करने के लिए पार्टी ने तकरीबन दो दर्जन से अधिक मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया। जिन विधायकों के टिकट काटे गए वहां पर तकरीबन 15 सीटों पर पार्टी ने जीत दर्ज की।

भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति गैर जाट पिछड़ी जातियों के इर्द-गिर्द तैयार की जोकि प्रदेश में तकरीबन 35 फीसदी आबादी में हैं। पार्टी को अपनी इस रणनीति का लाभ चुनाव में स्पष्ट तौर पर मिला है।

इससे पहले इस वर्ष की शुरुआत में भाजपा ने मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी से हटाकर नायब सिंह सैनी को सीएम बनाया था जोकि खुद ओबीसी नेता हैं, ऐसे में पार्टी ने सैनी के जरिए प्रदेश के ओबीसी वोटर्स को साधने की कोशिश की।

इन कदमों में भाजपा ने ना सिर्फ सत्ता विरोधी लहर को खत्म करने में सफलता हासिल की बल्कि ओबीसी वोटर्स को भी अपने पाले में करने में सफलता प्राप्त की।

दलितों को साधने की रणनीति

इसके साथ ही भाजपा ने दलितों को अपनी ओर लाने की रणनीति पर काम किया। पार्टी ने एससी वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर भी सफलता हासिल की। हरियाणा में 17 रिजर्व सीटें हैं, जिसमे से 7 में भाजपा ने जीत दर्ज की है, जबोकि पिछले चुनाव में पार्टी ने 5 आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी।

जबरदस्त बूथ मैनेजमेंट

भाजपा अपने बूथ मैनेजमेंट के लिए जानी जाती है, इसी के बलबूते भाजपा दूसरे दलों को एक के बाद एक चुनाव में मात देती आ रही है। जिस तरह से भाजपा आरएसएस के साथ मिलकर विपक्ष के खिलाफ एक लहर बनाने का काम करती है, वह काफी अहम होती है।

हरियाणा में विपक्ष ने किसान, जवान और पहलवान का मुद्दा उठाया था, लेकिन इसे भाजपा और संघ ने मिलकर बेहतर तरीके से संभालने में सफलता हासिल की और यह मुद्दा सरकार के खिलाफ नहीं चल सका।

संघ-भाजपा का साथ

हरियाणा में चुनाव अभियान की कमान धर्मेंद्र प्रधान की दी गई थी और उन्हें यहां का प्रभारी बनाया गया था। उनके साथ सतीश पुनाया पार्टी के अध्यक्ष थे। इसके अलावा मनोहर लाल खट्टर, नायब सिंह सैनी ने अरुण कुमार के साथ कई दौर की बैठक की। अरुण कुमार संघ और भाजपा के बीच समन्वय का कार्य करते हैं।

वह आरएसएस की रणनीति को जमीन पर लागू करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में संघ और भाजपा के बीच बेहतर समन्वय ने भी पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई।

कांग्रेस में आपसी फूट ले डूबी

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की बात करें तो वह एकजुट होकर यह चुनाव नहीं लड़ सकी और एक बार फिर से प्रदेश की ईकाई दो खेमों में बंटी नजर आई। एक तरफ जहां भूपिंदर सिंह हुड्डा का खेमा था तो दूसरी तरफ सांस कुमारी शैलजा का खेमा था।

दोनों के बीच तकरार खुलकर इस चुनाव में देखने को मिली। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस विवाद को सुलझा पाने में पूरी तरह से विफल रहा, जिसका पार्टी को चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ा।

पार्टी में गुटबाजी

कांग्रेस की प्रदेश ईकाई पिछले 10 वर्षों से बिना ब्लॉक और जिला ईकाई के चल रही है, इसकी बड़ी वजह पार्टी के भीतर आंतरिक गुटबाजी है। इसके साथ ही कांग्रेस काफी हद तक जाट वोटर्स पर निर्भर थी, जोकि प्रदेश में 22 फीसदी आबादी में हैं।

एक वोट बैंक के सहारे कांग्रेस

प्रदेश में दलित समुदाय की बात करें तो उनकी आबादी तकरीबन 20 फीसदी है। लेकिन जिस तरह से दलित वोट प्रदेश में बंटा, उसने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया।

वोटों का बंटवारा

जननायक जनता पार्टी जोकि पिछले सरकार में भाजपा की सहयोगी थी, वो इस चुनाव में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। चुनाव से कुछ महीने पहले जेजेपी ने भाजपा से अलग होने का फैसला लिया। लेकिन चुनाव के नतीजों से ऐसा लगता है कि पार्टी के वोटर्स भाजपा के पक्ष में चले गए।

लोग जेजेपी की इस रणनीति को समझ गए थे कि 4 साल तक सत्ता में रहिए और इसके बाद चुनावी फायदे के लिए खुद को अलग कर लीजिए और किसी भी जवाबदेही से बच जाइए। यही वजह है कि जेजेपी के वोटर कांग्रेस, भाजपा और आईएनएलडी के बीच बंट गए।

0.85 फीसदी वोट ने पलटी बाजी

अगर चुनाव आयोग के आंकड़े पर नजर डालें तो भाजपा और कांग्रेस के बीच कुल वोट शेयर में सिर्फ 0.85 फीसदी का अंतर रहा है। भाजपा को कुल 39.94 फीसदी वोट मिले हैं जबकि कांग्रेस को 39.09 फीसदी वोट मिले हैं। ऐसे में सिर्फ 0.85 फीसदी वोटों के अंतर के चलते एक तरफ भाजपा ने जहां 48 सीटों पर जीत दर्ज की तो कांग्रेस सिर्फ 37 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। ऐसे में स्पष्ट है कि वोटों के बंटवारे का खामियाजा बड़े पैमाने पर कांग्रेस को उठाना पड़ा है।

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