एक मुगल की वजह से आज भी यहां नहीं मनाया जाता Rakshabandhan, हैरान कर देगी 12वीं सदी की ये कहानी

इस समय पूरे देश में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जा रहा है। हर भाई की कलाई पर बहन का बांधा हुआ पवित्र धागा नजर आ रहा है। भाइयों ने भी उस धागे का वचन निभाते हुए बहन की रक्षा का वादा किया है। लेकिन यूपी के गाजियाबाद में एक ऐसा गांव है, जहां भाइयों की कलाई सूनी है और रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया गया। इसकी वजह कोई नहीं है, बल्कि सैकड़ों साल पहले आए लुटेरे मुगल हैं।

भाइयों की कलाई सूनी, नहीं मनाया रक्षाबंधन
आपको बता दें कि यह किस्सा दिल्ली से सटे गाजियाबाद के मुरादनगर से कई किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव सुराना का है। यहां हर साल रक्षाबंधन के त्योहार पर खुशियों की जगह गम का माहौल हो जाता है। इलाके में कोई रौनक नहीं होती। क्योंकि यहां पर भाई-बहन का यह खूबसूरत त्योहार नहीं मनाया जाता है। असल में यह परंपरा सैकड़ो वर्षों से चली आ रही है।

from 12th century Rakshabandhan is not celebrated in this village of ghaziabad because of Mughal

12वीं सदी में मोहम्मद गौरी ने किया था नरसंहार
दरअसल, इस अनोखी परंपरा की वजह बेहद चौंकाने वाली है। गांव की प्रधान रेनू यादव बताती हैं कि 12वीं सदी में यहां कुछ ऐसा हुआ था, जिसकी वजह से भाई बहन का यह पावन पर्व रक्षाबंधन यहां नहीं मनाया जाता है। बताया जाता है कि उस समय के शासक मोहम्मद गौरी ने गांव का लगान बढ़ा दिया था और जब उसे मनचाहा लगान नहीं मिला तो उसने यहां रहने वाले हर व्यक्ति को हाथियों से कुचलवा दिया था।

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पूरे गाँव को हाथियों से कुचलवा दिया
जिस दिन यह नरसंहार हुआ था, वह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का ही दिन था यानी रक्षाबंधन का दिन। मोहम्मद गौरी पूरे गांव का अस्तित्व खत्म करना चाहता था। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। हालांकि उसके बाद से कभी भी गांव वासियों ने रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया, क्योंकि इसे अपशगुन माना जाने लगा। तबसे से गाँव में ऐसी मान्यता है कि अगर किसी ने रक्षाबंधन मनाने की कोशिश की तो गांव में अनहोनी हो जाएगी।

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ऐसे बचा सुराना गाँव का अस्तित्व
इतने बड़े नरसंहार के बाद गांव का अस्तित्व कैसे बचा, इसकी भी कहानी अनोखी है। यहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि जिस समय मोहम्मद गौरी ने सभी लोगों को हाथी से कुचलवा दिया था, उस समय गांव की एक गर्भवती महिला अपने मायके गई हुई थी और बाद में महिला ने दो बच्चों को जन्म दिया। इसके बाद धीरे-धीरे गांव फिर से अस्तित्व में आया जिसका नाम सुराना रखा गया। पहले गांव का नाम सुराना नहीं था। पहले गांव को सोहनगढ़ के नाम से पहचानते थे।

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रक्षाबंधन को मानते हैं अपशगुन
आपको बताते चलें कि गांव के सभी लोग इस प्रथा को मानते हैं और रक्षाबंधन नहीं मनाते हैं। आज की पीढ़ी के बच्चे अपने माता-पिता से पूछते हैं कि हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते तो उन्हें भी यही बात बताई जाती है। बच्चे काफी ज्यादा निराश हो जाते हैं। वहीं जब हमने बच्चों से बात की तो उनका कहना है कि रक्षाबंधन का त्योहार मनाना चाहते हैं लेकिन जैसा पूर्वज और उनके बड़े कह रहे हैं वह उसी पर चलते हैं।

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