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Dehuli Massacre: जिस हत्याकांड ने हिला दिया था उत्तर प्रदेश, 44 साल बाद मिला न्याय

Firozabad Dehuli Massacre: चर्चित दिहुली हत्याकांड में 44 साल बाद न्याय मिला है। कोर्ट ने तीन दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है और उन पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। 1981 में फिरोजाबाद के जसराना थाना क्षेत्र के दिहुली गांव में डकैतों के गिरोह ने 24 दलितों की निर्मम हत्या कर दी थी।

मंगलवार को मैनपुरी की विशेष अदालत ने यह फैसला सुनाया। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि दोषियों को गर्दन में फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए। इस हत्याकांड में कुल 20 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिनमें से 13 आरोपियों की मौत हो चुकी है, जबकि चार अब भी फरार हैं।

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कैसे हुआ था दिहुली हत्याकांड?

18 नवंबर 1981 की रात डकैत गिरोह ने दलित बस्ती पर हमला कर दिया था। हमलावर पुलिस की वर्दी में थे और पूरी तैयारी के साथ आए थे। उन्होंने महिलाओं, बच्चों और पुरुषों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। देखते ही देखते 24 लोग गोलियों से भून दिए गए।

इस हत्याकांड में संतोष सिंह उर्फ संतोषा और राधेश्याम उर्फ राधे के गिरोह का नाम सामने आया था। उस समय यह क्षेत्र मैनपुरी जिले का हिस्सा था, लेकिन अब यह फिरोजाबाद जिले में आता है।

फैसले के बाद पीड़ित परिवारों की प्रतिक्रिया

मुख्य गवाह बनवारीलाल, जिनके पिता और भाई इस हत्याकांड में मारे गए थे, ने कहा कि उन्हें संतोष है कि देर से सही, लेकिन न्याय मिला। उन्होंने बताया कि काफी दबाव के बावजूद वह अपनी गवाही पर अडिग रहे।

पीड़ित परिवारों का कहना है कि इस हत्याकांड के बाद अधिकतर लोग गांव छोड़कर चले गए। अब केवल तीन परिवार ही गांव में रह रहे हैं। 90 वर्षीय जयदेवी ने कहा कि इतने सालों बाद भी वे अपने परिवार के सदस्यों को खोने के दर्द को नहीं भूल पाई हैं।

हत्याकांड से दहल गया था प्रदेश?

बताया जाता है कि इस हत्याकांड ने पूरे उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। यही कारण था कि उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, गृह मंत्री बीपी सिंह, मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी दिहुली पहुंचे थे।

इस मामले में एफआईआर लायक सिंह ने दर्ज करवाई थी। उन्होंने बताया कि गांव में मुखबिरी और गवाही को लेकर डकैतों का गिरोह नाराज था। इसी बदले की भावना से उन्होंने पूरे गांव पर हमला कर दिया था।

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