क्या है धारा-377, आखिर समलैंगिक सेक्स अपराध क्यों..?

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    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट मंगलवार से समलैंगिगता को अपराध के तहत लाने वाली धारा 377 पर सुनवाई करने वाला है, आपको बता दें कि इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ कर रही है, इस पीठ के पांच जजों में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा चार और जज हैं, जिनमें आरएफ नरीमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा शामिल हैं।

    संवैधानिक वैधता पर सवाल

    संवैधानिक वैधता पर सवाल

    सेक्‍स वर्करों के लिए काम करने वाली संस्‍था नाज फाउंडेशन ने हाईकोर्ट में यह कहते हुए धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया था कि अगर दो एडल्‍ट आपसी सहमति से एकांत में सेक्‍सुअल संबंध बनाते है तो उसे धारा 377 के प्रावधान से बाहर किया जाना चाहिए।

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    समलैंगिक संबंध वैध नहीं हैं

    समलैंगिक संबंध वैध नहीं हैं

    जिस पर साल 2009 में हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दो व्‍यस्‍क आपसी सहमति से एकांत में समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा कोर्ट ने सभी नागरिकों के समानता के अधिकारों की बात की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में हाईकोर्ट के इस फैसले को खारिज कर दिया था, सर्वोच्च अदालत ने कहा जबतक धारा 377 रहेगी तब तक समलैंगिक संबंध को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

    क्या है धारा 377?

    क्या है धारा 377?

    • आईपीसी की धारा 377 अप्राकृतिक (अननैचुरल) यौन संबंध को गैरकानूनी ठहराता है। इस धारा के नियम के मुताबिक स्त्री या पुरुष के साथ अननैचुरल संबध बनाने पर दस साल की सजा व जुर्माना हो सकता है।
    • सहमति से 2 पुरुषों, स्त्रियों और समलैंगिकों के बीच सेक्‍स भी इसके दायरे में आता है, जो कि एक अपराध है।
    • यही नहीं धारा 377 के तहत अपराध गैर जमानती है।
    एलजीबीटी, लेस्ब‍ियन, गे, बाईसेक्सुएल और ट्रांसजेंडर....

    एलजीबीटी, लेस्ब‍ियन, गे, बाईसेक्सुएल और ट्रांसजेंडर....

    • इस अपराध में गिरफ्तारी के लिए वॉरंट की जरूरत नहीं होती
    • 1862 में यह कानून लागू हुआ था।
    • समलैंग‍िकों को आम बोलचाल की भाषा में एलजीबीटी, लेस्ब‍ियन, गे, बाईसेक्सुएल और ट्रांसजेंडर कहते हैं, वहीं कई और दूसरे वर्गों को जोड़कर इसे क्व‍ियर समुदाय का नाम दिया गया है।
    • एलजीबीटी समुदाय का कहना है कि समलैंगिक संबंध कहीं से भी अप्राकृतिक नहीं हैं, यह कई जानवरों की तरह इंसानों में भी एक आम स्वभाव है।

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    English summary
    A Constitution Bench will begin to re-visit its December 2013 verdict of the Supreme Court, which upheld the criminalisation of gay sex and dismissed the LGBT community as a negligible part of the population while virtually denying them the right of choice and sexual orientation.

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