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किशोर न्याय (संशोधन) अधिनियम: 'दबाव की उपज' वाला यह कानून होगा कारगार?

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सुशील कुमार

MJMC छात्र (लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ).
राजनीति शास्त्र में परास्नातक करने के साथ साथ वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय के MJMC का छात्र हूँ। राजनीति एवं समसामयिक मुद्दों पर नज़र रखना मेरी रूचि है।

नई दिल्ली। किशोर न्याय (संशोधन) अधिनियम 2015 आखिर पारित हो ही गया और यह एक और कानून के रूप में हमारे समक्ष है। संसद से मंजूरी मिलने के बाद 16 से 18 साल के किशोरों के जघन्य अपराध में संलिप्तता के बाद उन पर वयस्क अपराधियों के समान सजा का प्रावधान किया गया है लेकिन क्या इससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं और अपराधों की संख्या घटेगी?

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यह एक यक्ष प्रश्न की तरह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। इतना तो तय है कि यह कानून मीडिया और जनता के दबाव की उपज है। जो निर्भया काण्ड के बाद से ही चर्चा जोरों पर थी और आखिर 3 साल बाद इसे मंजूरी मिल गयी। 'दबाव की उपज' वाला यह क़ानून कितना कारगर साबित होगा, यह तो फिलहाल अभी भविष्य के अंधेरों में कैद है।

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जरुरत है समाज के मनोविज्ञान को समझने की, उसकी जरूरतों और कमियों के परीक्षण की। किसी समस्या का समाधान एक क़ानून ही है? यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है, क्योंकि हत्या की अधिकतम सजा फांसी होने के बावजूद क्या देश में हत्याएं होना बंद हो गयीं? बंद होना तो दूर इनमे थोड़ा सा अंकुश भी नही लगाया जा सका है।

यहां समझने की आवश्यकता ये है की इन कारणों के पीछे कौन से कारक हैं?

ऐसी घटनाओं के पीछे उनका सामजिक परिवेश, शिक्षा का अभाव, मानसिक स्तिथि, गरीबी, भूख आदि समस्याएं हैं। अमीरी गरीबी का फ़ासला, कम समय में दुनिया की आधुनिक भोग बिलासता पूर्ण जीवन की हिलोरें मारती आकांक्षाएं इस अपराध का दूसरा बड़ा कारण है।

अपराधों के लिए उकसाये जाते हैं बच्चे

इन बाल अपराधों के पीछे इससे जुड़े रैकेट इन कार्यों को लालच देकर करवाते हैं। खुद महिला एवम बाल विकास मंत्री मेनका गांधी इस बात को स्वीकार करती हैं, कि बच्चों को इन अपराधों को करने के लिए उकसाने का कार्य किया जाता है।

करने होंगे कारगार उपाय

  • इसलिए इस प्रकार की समस्याओं से निजात पाने के लिए कुछ कारगार उपाय करने होंगे, सामजिक चेतना बढ़ानी होगी।
  • अनिवार्य शिक्षा को जन जन तक पहुंचाने के लिए गैर सरकारी संस्थानों की सहायता लेनी होगी।
  • जो पैसा सरकार विज्ञापनों पर खर्च करती उन्ही पैसों से इन संस्थाओं में खर्च कर लाभ लेने को जरुरत है।
  • सुधार गृहों में घर जैसा माहौल दिया जाए, वहां शिक्षा का प्रबन्ध सुचारू रुप से किया जाए।
  • पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जाए।
  • ये जिम्मेदारी समाज को खुद अपने कन्धों पर लेनी होगी सिर्फ सरकार से उम्मीद लगाना श्रेयस्कर नही होगा।
  • कानून बना देना ही अपराध का अंत नहीं

    सिर्फ कैंडल मार्च लेकर प्रदर्शन में ही आगे आना सामजिक दायित्व नहीं है, इन सबकी बारी ही नही आये इसका प्रण लेना होगा। किसी भी समस्या का निराकरण, उसके कारणों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने में ही निकलेगा, ना कि क़ानून बना देने से। समस्या की शाखाओं को कुतरने का प्रयास करने से बेहतर उसकी मूल जड़ों पर प्रहार किया जाए।

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    English summary
    Juveniles aged 16 years and above will now be tried under laws for adults for heinous crimes as Parliament passed a much-expected bill in this regard against the backdrop of a juvenile convict being released in the gangrape-cum-murder case of December 2012.
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