सिनेमा नहीं ओटीटी पर जादू चलाएंगी ये फिल्में, आखिर क्यों बॉक्स ऑफिस छोड़कर OTT की तरफ भाग रहे मेकर्स?

फ्रेडी और गोविंदा मेरा नाम फिल्मों की जब ओटीटी पर रिलीज की घोषणा हुई है, फिल्मों के बड़े पर्दे पर रिलीज ना होने पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं।

OTT Platforms: कार्तिक आर्यन की 'फ्रेडी' और विक्की कौशल की 'गोविंदा मेरा नाम' की जब से घोषणा हुई है, फैंस की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं है। दोनों ही फिल्मों ने रिलीज से पहले ही फिल्म इंडस्ट्री को एक उम्मीद दी है। दोनों ही फिल्में बड़े पर्दे की बजाय ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज की जानी है। ऐसे में ये माना जा रहा है कि मेकर्स एक सेफ ऑप्शन के तौर पर बड़े पर्दे की बजाय डिजिटल स्पेस को चुन रहे हैं।

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फ्रेडी और गोविंदा मेरा नाम के अलावा सिद्धार्थ मल्होत्रा और रश्मिका मंदाना स्टारर फिल्म मिशन मजनू और रकुल प्रीत सिंह की छतरीवाली के भी सीधे स्ट्रीमिंग स्पेस में जाने की उम्मीद जताई जा रही है। बताते चलें कि थैंक गॉड, डबल एक्सएल, फोन बूथ, डॉक्टर जी और मिली जैसी फिल्में बड़े पर्दे पर रिलीज की गई थी। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस में उम्मीदों पर भी खरी नहीं हो सकीं।

फिल्में बड़े पर्दे पर निराशाजनक प्रदर्शन कर रही हैं। ऐसे में मेकर्स अब किसी भी फिल्म को बॉक्स ऑफिस के सहारे छोड़ने का रिस्क नहीं लेना चाहते। इसी संबंध में बात करते हुए ट्रेड एनालिस्ट और निर्माता गिरीश जौहर कहते हैं कि इंडियन इंडस्ट्री के अंदर अभी आत्मविश्वास की बहुत कमी है। क्योंकि किसी को समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर हो क्या रहा है और असल में क्या काम करेगा। बॉक्स ऑफिस पर आने और यहां वेलिडेशन लेने के लिए अभी बहुत हिम्मत की जरूरत है। मुझे लगता है कि मेकर्स को लगता है कि कोशिश करना बेकार है और ऐसे में वे ओटीटी स्पेस में चले जाते हैं। क्योंकि ये इकॉनोमी के लिहाज से बेहद सुरक्षित विकल्प है।

मेकर्स के ओटीटी पर आने से ये पता चलता है कि उन्हें बॉक्स
ऑफिस पर जाने का डर सता रहा है। क्योंकि किसी भी प्रोजेक्ट की कीमत वसूलने के लिए वे ओटीटी प्लेटफॉर्म का रुख करते हैं। ये निर्माताओं का बेहद कैलकुलेटिव स्टेप है। उन्हें लगता है कि ओटीटी के साथ सौदा करके वे अपने प्रोजेक्ट्स की लागत वसूलेंगे। इसके बाद वे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के साथ सौदा कर लेते हैं। लेकिन अगर फिल्म फ्लॉप होती है तो ओटीटी और सेटेलाइट डील भी काफी हद तक प्रभावित होते हैं।

वहीं ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श आने वाले ट्रेंड के बारे में चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि दो साल से भी ज्यादा समय से बड़े पर्दे पर फिल्मों का इंतजार करने के बाद अब मैं ये नहीं समझ पा रहा हूं कि जब चीजें फिर से खुल गई हैं तो फिल्में ओटीटी पर क्यों चल रही हैं? मुझे लगता है कि सबसे बड़ी बात तो ये है कि मेकर्स को लगता है कि ये फिल्में ओटीटी फ्रेंडली हैं। लेकिन ये बेहद अजीब है कि इन प्रोजेक्ट्स से बड़े नाम जुड़े हुए हैं।

वहीं निर्माता रतन जैन को लगता है कि अच्छा है कि मेकर्स रियलिस्टिक हो रहे हैं और ओटीटी का रास्ता चुन रहे हैं। इससे बड़े पर्दे पर रिलीज का इंतजार करने वाली भीड़ तो कम हो ही रही है। अक्षय कुमार की एक और फिल्म का भी जल्द ही ओटीटी प्रीमियर होगा। जोगिंदर टुटेजा कहते हैं कि मेकर्स ये पता लगा रहे हैं कि कौन सी फिल्म थिएटर में चलेगी और कौन सी नहीं। ऐसे में ये एक अच्छी रणनीति है।

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