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इंसेफेलाइटिस : बिहार सरकार के इलाज पर सेंट्रल टीम ने उठाये सवाल, सबसे जरूरी जांच ही नदारद

नई दिल्ली। मुजफ्फरपुर में इंसेफेलाइटिस की जांच और इलाज में कई खामियां पायी गयी हैं। सेंट्रल टीम ने एसकेएमसीच के डॉक्टरों के इलाज के तरीके और डाइग्नोसिस पर सवाल उठाये हैं। सेंट्रल टीम का कहना है कि इलाज और रोग निदान का तरीक दिशा निर्देशों के मुताबिक नहीं है। केन्द्रीय टीम ने इस संबंध में बि्हार सरकार के स्वास्थ्य विभाग को एक चिट्ठी लिखी है।

 इलाज के तरीके पर गंभीर सवाल

इलाज के तरीके पर गंभीर सवाल

इंसेफेलाइटिस के प्रकोप के बाद 12 जून को सात सदस्यीय सेंट्रल टीम ने मुजफ्फरपुर का दौरा किया था। एसकेएमसीच और बिहार के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक में रोग निदान के लिए जरूरी दिशा निर्देश तय किये थे। अब कहा जा रहा है कि इन दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। केन्द्रीय टीम के मुताबिक मुजफ्फरपुर के डॉक्टरों ने रोग प्रभावित बच्चों में इंसेफेलोपैथी या इंसेपेलाइटिस के विभिन्न कारणों को शुरू में ही खत्म करने की कोशिश नहीं की। इसकी शुरुआत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से होनी थी।

अनिवार्य टेस्ट ही नदारद

अनिवार्य टेस्ट ही नदारद

सेंट्रल टीम ने हिदायत थी कि हर पीएचसी में मलेरिया परजीवी की पहचान के लिए एंटीजेन आधारित रैपिड डाइग्नोस्टिक टेस्ट या माइक्रोस्लाइड अनिवार्य रूप से किया जाएगा। बुखार आने के बाद ऐसा करना जरूरी था। लेकिन ये जांच चमकी प्रभावित किसी भी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में नहीं हुई। हैरानी की बात ये है कि मरीज के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पहुंचने के बाद भी इस जांच को जरूरी नहीं समझा गया, जब कि इसे मैंडेटरी बनाया गया था। जिन मरीजों की जांच की गयी उनमें से किसी की सेरेब्रल स्पिनल फ्लूइड जांच रिपोर्ट पेश नहीं की गयी। इतना ही नहीं एसकेएमसीएच का पेड्रियाटिक इंटेन्सिव केयर यूनिट भी मापदंड के मुताबिक नहीं पाया गया है। यहां ड़ॉक्टरों और नर्सों की कमी है। नर्सिंग स्टाफ की ट्रेनिंग और दक्षता इस बीमारी से निबटने के लायक नहीं है। इस मामले में बिहार के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव का है कि हमने सेंट्रल टीम के फीडबैक के मुताबिक जरूरी उपाये किये हैं। पीआइसीयू को अपग्रेड करने की प्रक्रिया जारी है। डॉक्टरों और नर्सों के लिए लगातार ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

15 जिलों में चमकी का प्रकोप

15 जिलों में चमकी का प्रकोप

सरकारी आंकड़े के मुताबिक 20 जून तक बिहार में इंसेफेलाइटिस से प्रभावित 623 रोगियों की पहचान हुई। मौत का आंकड़ा 135 को पार कर गया है। बिहार के 15 जिलों में इस रोग ने दस्तक दे दी है। सबसे अधिक मुजफ्फरपुर में 417 रोगी चिन्हित किये गये हैं। दूसरे स्थान पर पूर्वी चम्पारण है जहां इंसेफेलाइटिस के 68 रोगी मिले हैं। तीसरे स्थान पर वैशाली है जहां 59 मरीज पाये गये हैं। अगर मरीज को जल्द इलाज मिल जाए तो उसकी जान बतायी जा सकती है। इस लिए बिहार सरकार ने प्रभावित जिलों में जागरुकता और बीमारी से जुड़ी जानकारी के लिए एक गहन कार्यक्रम चलाया है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कर्मचारियों की कई टीम बनायी गयी है। यह टीम गांव-गांव जा कर यह पता लगा रही है कि मरीज की किस तरह और कैसे तबीयत खराब हुई। इन सूचनाओं का डाटा तैयार किया जा रहा है जिसके आधार पर डॉक्टर निष्कर्ष निकालेंगे। यह मेडिकल टीम तुरंत इलाज के लिए अस्पताल जाने की भी सलाह दे रही है। बिहार सरकार ने अस्पताल पहुंचने के लिए किराया का पैसा देने की भी घोषणा की है। लेकिन आम लोगों का कहना है कि अगर सरकार ने ये उपाय पहले किये होते तो शायद कुछ बच्चों की जान बच सकती थी।

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