• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

दुकानें बेचने को मजबूर क्यों हो रहे भारतीय दुकानदार?

|
Google Oneindia News

नई दिल्ली, 21 जून। अन्य देशों के मुकाबले कोरोना ने भारत की अर्थव्यवस्था को ज्यादा नुकसान पहुंचाया. भारतीय मध्यवर्ग इससे बहुत प्रभावित रहा. एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां मिडिल क्लास आबादी में 3.2 करोड़ लोग घट गए. इन आंकड़ों का असल रूप ऑनलाइन मार्केटप्लेस OLX पर बेचे जा रहे सामान में भी दिख रहा है. कानपुर, लखनऊ, नोएडा और गाजियाबाद जैसे उत्तर प्रदेश के लगभग हर बड़े शहर में छोटे व्यापारी दुकान बंद कर उसका पूरा सामान OLX पर बेचने की कोशिश कर रहे हैं.

कानपुर और गाजियाबाद में जहां पिछले एक महीने में करीब आधा दर्जन लोगों ने अपनी दुकानों को बिक्री के लिए OLX पर लिस्ट किया, लखनऊ में ऐसा करने वालों की संख्या करीब एक दर्जन रही. OLX पर जिन दुकानों को बेचने के लिए लिस्ट किया जा रहा है, उनमें से ज्यादातर गैर-जरूरी सामान की हैं, जैसे- गिफ्ट, स्टेशनरी, क्रॉकरी, कॉस्मेटिक, ब्यूटी पार्लर, सैलून, कैफे, मोबाइल शॉप और रेस्टोरेंट.ऐसी ही एक दुकान के मालिक हैं, कानपुर के विशू भाटिया. होटल सेक्टर में काम करने वाले विशू की पिछले साल कोरोना लॉकडाउन में नौकरी गई तो उन्होंने घर बैठने के बजाए दुकान खोलकर घर चलाने का फैसला किया.

उन्होंने पिछले साल जून में लॉकडाउन खुलते ही गिफ्ट और कॉस्मेटिक्स की दुकान खोली, उन्हें उम्मीद थी कि लॉकडाउन खुलने के बाद स्थितियां सामान्य हो जाएंगी और उनकी दुकान चल निकलेगी. उन्होंने यह भी सोच रखा था कि अगर हालात सामान्य होने के बाद उनकी नौकरी वापस मिल जाती है तो उनकी पत्नी इस दुकान को संभाला करेंगीं. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बल्कि साल की शुरुआत में पिता की मौत और कोरोना की दूसरी लहर के बाद स्थितियां और खराब हो गईं. अब वे OLX पर 1.4 लाख रुपये में अपनी दुकान बेचने की कोशिश कर रहे हैं.

Provided by Deutsche Welle

सालों की कमाई खोने वालों का क्या?

बिजनेस जर्नलिस्ट शिशिर सिन्हा कहते हैं, "लोग फिलहाल गैर-जरूरी सामान नहीं खरीद रहे. इसलिए ऐसा सामान बेचने वाले दुकानदारों की कमाई में भारी गिरावट आई है." लेकिन दुकानदारों के खर्चे कम नहीं हुए हैं. दुकान का किराया, बिजली का बिल और स्थानीय टैक्स उन्हें चुकाना पड़ रहा है. जब दुकान चलाने का खर्च कमाई से ज्यादा हो तो उनके पास दुकान बेचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता. सिन्हा कहते हैं, "सरकार की ओर से कहा जा सकता है कि ये दुकानदार, छोटे उद्योगों को दिया जाने वाला मुद्रा लोन लेकर अपनी स्थिति सुधार सकते हैं लेकिन जब अभी उनकी कोई कमाई नहीं है और निकट भविष्य में इसके बढ़ने का विश्वास भी नहीं है तो वे किस आधार पर लोन लेंगे?"

इनमें ऐसे भी कई लोग हैं, जो उम्मीदों के साथ बड़े शहरों में आए थे ताकि यहां व्यवसाय करके अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार सकेंगे. नोएडा के शिवम पाठक की कहानी भी ऐसी ही है. 12 साल पहले शिवम के पिता जब बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए परिवार सहित झांसी से नोएडा आए थे तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि सालों मेहनत कर सुधारी गई उनकी आर्थिक स्थिति को कोरोना एक झटके में बिगाड़ देगा. शिवम ने बताया कि उनके पिता कुछ साल पहले ही मजदूरी करने ग्वालियर चले गए लेकिन परिवार ने कुछ बचत करके नोएडा में एक छोटी किराना दुकान खोल ली, जिसे मां चलाती थीं. शिवम कहते हैं, "कोरोना के चलते उसे बंद करना पड़ रहा है, इसलिए हम सारा सामान OLX पर बेच रहे हैं. हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, इसलिए मुझे इस साल पढ़ाई छोड़नी पड़ी है."

सरकारी संस्थाओं से छिपी नहीं यह बात

छोटे दुकानदारों और व्यापारियों की समस्याओं से सरकारी संस्थाएं अनजान हों, ऐसा भी नहीं है. भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कोरोना की दूसरी लहर से अर्थव्यवस्था को 20 खरब रुपये का घाटा होने का अनुमान लगाया है और इसकी वजह स्थानीय लॉकडाउन के चलते घटी मांग को बताया है. इस रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है, "जीवन और काम के तरीकों में बदलाव आए हैं. और घर से काम करना या ऑनलाइन शॉपिंग जैसे ये बदलाव आगे भी बने रह सकते हैं. जब मांग के पैटर्न में बदलाव आ रहा है तो कुछ कंपनियां बंद हो सकती हैं. कुछ व्यवसाय हमेशा के लिए छोटे भी हो सकते हैं." लेकिन रिपोर्ट में यह उम्मीद भी जताई गई है, "पहले से मौजूद जिन कंपनियों के उत्पादों की मांग बढ़ रही है, उनका विस्तार हो सकता है और कुछ नई कंपनिया उभर सकती हैं."

भारतीय रिजर्व बैंक की इस टिप्पणी की जमीनी हकीकत हाल की एक मीडिया रिपोर्ट में देखी जा सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल के दौरान पूरे भारत में 10 हजार मोबाइल दुकानें बंद हो गई हैं. यानी भारत में मौजूद कुल 1.2 लाख मोबाइल दुकानों में से 8% पिछले एक साल में बंद हो चुकी हैं. लॉकडाउन के चलते इन दुकानों के बंद होने से सबसे ज्यादा फायदा अमेजन-फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों को हुआ है. इसलिए अर्थनीति के मुद्दों पर लिखने वाले विवेक कौल आरबीआई की टिप्पणी पर कहते हैं, "हमें यह समझना होगा कि एक ओर अवसर पैदा हो रहे हैं तो दूसरी ओर जिंदगियां भी बर्बाद हो रही हैं." वहीं शिशिर सिन्हा का कहना है कि मास्क, पीपीई किट, फेस शील्ड, सैनिटाइजर जैसे उत्पादों की जिन कंपनियों के उभरने पर गर्व किया जा रहा है, क्या उनकी मांग कोरोना के बाद भी बनी रहेगी?

स्किल आधारित मनरेगा है उपाय?

आशाभरी बातों के बावजूद इन व्यापारियों और दुकानदारों के लिए भारत सरकार ने कोई ठोस प्रयास नहीं किया है. जानकार जोर दे रहे हैं कि बिना किसी सीधी सरकारी मदद के भारी आर्थिक झटका झेलने वाले इन छोटे व्यापारियों और दुकानदारों की स्थिति सुधारना मुश्किल है. शिशिर सिन्हा कहते हैं, "हम जान चुके हैं कि लोन इस समस्या का हल नहीं हैं. अब विचार करना होगा कि क्या इन्हें आर्थिक मदद दी जा सकती है." हालांकि फिलहाल ऐसा कोई भी विचार केंद्र और राज्यों के बीच लड़ाई को आमंत्रित करने वाला है क्योंकि दोनों नहीं चाहेंगे कि इस समय उनके राजस्व पर बोझ पड़े. शिशिर सिन्हा का सुझाव है, "दुकानों और व्यापार के बंद होने से बेरोजगार हुए लोगों के लिए शहरी मनरेगा शुरू कर सकते हैं. लेकिन इसे ग्रामीण मनरेगा से अलग स्किल आधारित बनाना होगा. जिससे न सिर्फ लोगों की आर्थिक गतिविधियां जारी रहें बल्कि उन्हें कुछ स्किल भी सिखाए जा सकें."

हालांकि अर्थशास्त्री विवेक कौल इस विचार के प्रति डर जताते हैं. वे कहते हैं, "भले ही यह सुझाव सुनने में अच्छा लगे लेकिन इसमें कई परेशानियां आ सकती हैं. देश में असंगठित क्षेत्र में करोड़ों लोगों की नौकरी गई है. इसमें काम करने वालों के पास कॉन्ट्रैक्ट और सैलरी स्लिप जैसे दस्तावेज भी नहीं होते, ऐसे में वे कैसे साबित कर सकेंगे कि उनकी नौकरी कोरोना के चलते गई." दूसरी ओर सरकारों के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बना सकें. ऐसे में पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार का डर बना रहेगा. कौल कहते हैं, "बेरोजगारी दर से ज्यादा चिंता लेबर पार्टिसिपेशन रेट (LPR) की होनी चाहिए. कम से कम पांच सालों से यह भी लगातार गिर रहा है." यानी बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कुछ समय तक नौकरी नहीं मिलने के बाद नौकरी की तलाश ही छोड़ दे रहे हैं. ऐसे में भारत सरकार का डर बेरोजगार हुए लोगों को जल्दी काम पर लौटने पर होना चाहिए वरना न सिर्फ भारत में कई परिवारों की अगली पीढ़ियां गरीबी में जिंदगी गुजारेंगीं बल्कि अगले कई सालों तक सरकार को भी गरीबी, कुपोषण और भुखमरी पर भारी खर्च करना पड़ेगा.

Source: DW

English summary
economy why small shopkeepers are selling their shops in uttar pradesh ?
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X