पति-पत्नी के बीच सुलह कराने पहुंची पुलिस ने ये क्या किया?

नई दिल्ली। राजधानी की पुलिस पर लगातार लापरवाही बरतने और मनमाने ढंग से काम करने के आरोप लगते रहे हैं। हाल ही में हुई एक घटना से पुलिस ने यह साबित भी कर दिया है। दरअसल एक महिला ने पति से झगड़ा होने के बाद पुलिस को फोन किया था। हालांकि बाद में उनके बीच सुलह हो गई लेकिन पुलिस महिला के पति को जबरन थाने ले गई।

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महिला ने पुलिस को लिखकर बताया था कि उन दोनों के बीच अब कोई मनमुटाव नहीं है, लेकिन फिर भी पुलिस महिला के पति को थाने ले जाने पर अड़ी रही। पुलिस की जिद पर महिला का पति अपने भाई के साथ वसंत विहार थाने गया, जहां पुलिस ने दोनों के खिलाफ क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CPC) की धारा 107 के तहत मामला दर्ज कर लिया।

दोनों भाइयों से भरवाए बॉन्ड
इस एक्ट के तहत पुलिस थाने में तैनात स्पेशल एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) को यह अधिकार होता है कि वह संबंधित आरोपी से इलाके में शांति बनाए रखने के लिए एक साल का बॉन्ड भरवाए।

वेरीफिकेशन के नाम पर जेल भेजा
दोनों भाइयों की ओर से पेश हुए वकील अल्दानिश राइन ने बॉन्ड भरे। इससे दोनों की रिहाई तय हो जाती है, लेकिन SEM ने वसंत विहार थाने से बॉन्ड को वेरीफिकेशन के लिए सफरजंग थाने भेज दिया और दोनों भाइयों के दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

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हाई कोर्ट ने खारिज किया फैसला
SEM के इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई और आरोप लगाया गया कि दो लोगों को गैरकानूनी तरीके से जेल में रखा गया है। हाई कोर्ट ने दोनों के खिलाफ बनाई गई केस डायरी को खारिज कर दिया और SEM को फटकार भी लगाई।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया मामला
इस केस ने एडवोकेट राइन को भी हैरान कर दिया और उन्होंने उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी। याचिका में उन्होंने आरोप लगाया कि SEM को इलाके में शांति कायम करने के नाम पर जो शक्तियां दी गईं, उनका वह गलत और गैरकानूनी इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने यह भी मांग की कि जब तक बॉन्ड का वेरीफिकेशन होता है, तब तक संबंधित व्यक्ति को रिहा किया जाए, न कि जेल में रखा जाए।

चीफ जस्टिस ने नियुक्त किया सलाहकार
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली बेंच ने एएसजी मनिंदर सिंह को इस मामले में सलाहकार नियुक्त करते हुए कोर्ट की मदद करने को कहा। शुक्रवार को सिंह ने कहा कि अगर किसी भी शख्स को गिरफ्तार किया जाता है तो उसे 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश किया जाना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं किया गया। साथ ही SEM ने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया है।

उन्होंने इसे लेकर दिल्ली हाई कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया जिसमें SEM की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट राइन की याचिका स्वीकार कर ली है और इसे विस्तार से सुनवाई के लिए पोस्ट किया है।

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