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तबलीगी जमात: 44 विदेशियों ने वतन वापसी से किया इनकार, कहा- भारत में रहकर ही करेंगे कानूनी प्रक्रिया का सामना

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दिल्ली। दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज मामले में हिरासत में लिए गए 44 विदेशी नागरिकों ने अपने देश लौटने से इनकार कर दिया है। इन लोगों भारत में ही रहकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करने का फैसला किया है। उनका कहना है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है, इसलिए जुर्माना भरकर या फिर माफी मांगकर वापस जाने का कोई मतलब नहीं है। अमे​रिका के रहने वाले अहमद अली ने कहा कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। कोई कानून नहीं तोड़ा। अली ने बताया कि उन्होंने लॉकडाउन शुरू होने से पहले मरकज छोड़ दिया था। उन्होंने कहा कि वह भारत में ही रहकर कानूनी लड़ाई लड़ेंगे, क्योंकि वो नहीं चाहते कि उन्हें ऐसे अमेरिकी नागरिक के रूप में जाना जाए जिसने विदेशी धरती पर कानून तोड़ा हो।

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    Nizamuddi Tabligi Jamaat: माफी के बजाए कानूनी लड़ाई की तैयारी में 44 विदेशी जमाती | वनइंडिया हिंदी
    'मुश्किल विकल्प है, लेकिन सही है'

    'मुश्किल विकल्प है, लेकिन सही है'

    भारत में ही रहकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करने का फैसला करने वाले 44 विदेशियों में न्यूयॉर्क के फ़ार्मेसी टेक्नीशियन अहमद अली भी शामिल हैं। अली ने बताया कि दो दशक पहले, म्यांमार में सैन्य शासन के खिलाफ "भूमिगत आंदोलन" का नेतृत्व करने वाले युवा विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में उन्होंने "सही और गलत के बीच अंतर करना" सीखा। 2005 में यांगून से भागना पड़ा और अपने माता-पिता को पीछे छोड़ते हुए थाईलैंड के एक शरणार्थी शिविर में शरण लेनी पड़ी। "यह एक मुश्किल विकल्प था, लेकिन सही है।" अली ने कहा कि उन्होंने एक और मुश्किल विकल्प चुना है, जो उन्हें सही लगता है।

    करीब 250 लोगों ने जुर्माना भरने के बाद छोड़ा देश

    करीब 250 लोगों ने जुर्माना भरने के बाद छोड़ा देश

    बता दें, दिल्ली में हिरासत में लिए गए 955 विदेशियों के एक समूह के लगभग 250 अन्य लोगों ने 5 से 10 रुपये का जुर्माना भरने के बाद देश छोड़ दिया है। कई और लोगों ने इस मार्ग को चुना है, लेकिन कई लंबित एफआईआर होने के कारण उन्हें वापस रखा गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि राजधानी में रहने वालों के लिए मुकदमा स्थानीय अदालत में आठ सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए। 2 अप्रैल को दिल्ली में तबलीगी जमात के इंटरनेशनल हेडक्वार्टर निजामुद्दीन मरकज से 2346 लोगों को बाहर निकाला गया था। 3 अप्रैल को भारत में 2,547 कोरोना के मामले सामने आ गए थे। अधिकारियों ने दावा किया था कि 25 प्रतिशत कोरोना के केस उन लोगों की वजह से हुए हैं जो मरकज में शामिल हुए थे और बाद में देशभर में फैल गए।

    अली ने कहा- लॉकडाउन से पहले ही ही मर्कज छोड़ा

    अली ने कहा- लॉकडाउन से पहले ही ही मर्कज छोड़ा

    अली ने बताया, 12 मार्च को अपनी पत्नी और अपने माता-पिता के साथ भारत आए, जो अभी भी उनके साथ हैं। मर्कज में लगभग पांच दिन बिताने के बाद परिवार ने पुरानी दिल्ली की एक मस्जिद में शरण ली, जहां से पुलिस उन्हें एक क्वारंटाइन सेंटर ले गई। 10 मई को दिल्ली सरकार ने सभी तब्लीगी सदस्यों को क्वारंटाइन सेंटर से मुक्त करने का आदेश दिया। 18 दिन बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें वैकल्पिक आवास में स्थानांतरित करने की अनुमति दी। कई को समुदाय द्वारा संचालित निजी स्कूलों में रखा गया, जबकि अली और उनका परिवार शाहीन बाग में एक घर में चले गए। बाद में अली की रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई और उनका एलएनजेपी अस्पताल में 20 दिन तक इलाज हुआ। अली ने कहा, ''सही के साथ खड़े होने पर मैंने पहले भी कीमत चुकाई है। मैंने आखिरी बार अपने माता-पिता को 2005 में देखा था। दो साल पहले मेरे पिता का निधन हो गया। मैं लंबे समय से अपनी मां को देखना चाहता हूं।

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    English summary
    44 tablighi members choose to face trial over plea deal
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