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क्या ट्रंप की तरह नरेंद्र मोदी को भी चुनाव में सबक सिखाएगी जनता?

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नई दिल्ली, 13 मई। अमेरिकी नागरिकों का मानना था कि डोनाल्ड ट्रंप की लापरवाही के कारण ही कोरोना ने उनके देश में तबाही मचायी थी। जब पिछले साल राष्ट्रपति का चुनाव हुआ तो नाराज जनता ने ट्रंप को हरा कर अपने गुस्से का इजहार कर दिया था। क्या भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी कोरोना के विकराल रूप की कीमत चुकानी होगी ?

Will the people teach a lesson to pm Narendra Modi in elections like donald trump?

पिछले साल जब अमेरिका में कोरोना का संक्रमण बढ़ रहा था तब ट्रंप महीनों तक वायरस के प्रकोप को खारिज करते रहे। यहां तक कि मास्क पहनने पर ट्रंप मजाक उड़ाने लगे थे। बाद में उन्होंने कोरोना से मौत के लिए चीन को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी नाकामी छिपा ली। लेकिन अपने परिजनों की जिंदगी खोने वाली जनता सब कुछ समझ रही थी। जब वक्त आया तो उसने ट्रंप का हिसाब कर दिया। इसी तरह कोरोना की दूसरी लहर में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशासनिक क्षमता सवालों के घेरे में है। दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑक्सीजन की कमी पर केन्द्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था, अब वह कोई बहाना नहीं सुनना चाहती। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था, अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं मिलने से कोरोना मरीजों की मौत आपराधिक कृत्य जैसा है। कोरोना मरीजों की मौत उनके लिए किसी नरसंहार से कम नहीं जिनके ऊपर ऑक्सीजन सप्लाई की जिम्मेवारी है।

अपनों की मौत से गुस्सा और गम

अपनों की मौत से गुस्सा और गम

जब सिस्टम की नाकामी से किसी अपने की मौत होती है तो मन में गुस्सा और गम लंबे समय तक रहता है। तब विचारधारा भी कोई मायने नहीं रखती। यह गुस्सा किसी रूप में सामने आ सकता है। खास कर चुनाव के समय लोग अपने गुस्से का जरूर इजहार करते हैं। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू हो गयी है। कोरोना महामारी में अस्पतालों के कुप्रबंधन और लूट-खसोट से लोगों को बहुत तकलीफ हुई है। जिनको बचाया जा सकता था उनको भी असमय जाना पड़ा। कोरोना की दूसरी लहर में सरकार की तैयारियों की पोल खुल गयी। पिछले साल कोरोना नियंत्रण पर बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार, जब परीक्षा की घड़ी आयी तो फेल हो गयी। यह सही है कि है कि करोना एक वैश्विक आपदा है। लेकिन अगर समय रहते तैयारी की गयी होती तो इसके भयावह असर को कम किया जा सकता था। जैसे-जैसे मौत की संख्या बढ़ी, लोगों का गुस्सा भी बढ़ता गया। नरेन्द्र मोदी अभी तक भाजपा और संघ के लिए चमत्कारिक नेता थे। लेकिन अब उनकी छवि को लेकर संघ में भी चिंतन-मनन शुरू हो गया है।

चुनाव होता रहा और आ गयी कोरोना की दूसरी लहर

चुनाव होता रहा और आ गयी कोरोना की दूसरी लहर

अधिकतर लोगों का मानना है कि भाजपा ने बंगाल विजय की महत्वाकांक्षा में लोगों के जीवन को संकट में डाल दिया। संक्रमण रोकने के लिए जरूरी पाबंदिया इलिए लागू नहीं की गयीं क्योंकि पांच राज्यों में चुनाव कराया जाना था। आमजन की हिफाजत के ऊपर राजनीतिक लाभ को तरजीह दिये जाने से जनता में गलत संदेश गया। देशहित और जनहित की बात करने वाले नरेन्द्र मोदी ने आखिर चुनाव को क्यों जरूरी समझा ? रैलियां होती रहीं, प्रधानमंत्री की सभा में कोरोना गाइलाइंस को तोड़ कर भीड़ जुटती रही। लेकिन किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जब कोर्ट नें फटकार लगायी तब जा कर रैलियों पर रोक लगी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कोरोना की दूसरी लहर आ गयी और सरकार चुनावों में उलझी रही। अब जब हालात काबू से बाहर हो गये हैं तो सरकार चौतरफा हमलों में घिर गयी है। इस साल जब टीकाकरण का समय आया तो यह अभियान भी कुप्रबंधन की भेंट चढ़ गया। जरूरत के हिसाब से सरकार लोगों को वैक्सीन उपलब्ध नहीं करा पायी। वैक्सीन के अलग-अलग दाम को लेकर भी सवाल उठा।

मौत के आंकड़े डराने वाले

मौत के आंकड़े डराने वाले

12 मई को 24 घंटे में 4205 लोगों की मौत हुई है। यह संख्या महामारी शुरू होने के बाद एक दिन में सबसे अधिक है। रोजाना संक्रमण के मामले में कुछ कमी तो आ रही है लेकिन मौत के आंकड़े डराने वाले हैं। जब जिंदगी और मौत में कश्मकश चल रही हो तो लोग यह जरूर देखते हैं कि देश का शासक उनके लिए क्या कर रहा है ? उनकी जान बचाने के लिए कितने सटीक फैसले ले रहा है ? अमेरिका के राष्ट्रपति रहे डोनाल्ड ट्रंप ने शेखी बघारने के चक्कर में समय रहते सुरक्षा के उपाय नहीं किये। कोरोना ने अमेरिका में लाशों के ढेर लगा दिये। ऐसे लापपरवाह और गैरजिम्मेदार राष्ट्रपति को जनता भला कहां बर्दाश्त करने वाली थी ? चुनाव आया तो सबक सीखा दिया। इसके उलट न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने पिछले साल अपने देश को कोरोना से बचाने के लिए शानदार काम किया। उन्होंने समय रहते खतरे को पहचान कर सुरक्षा के उपाय लागू किये जिससे संक्रमण का खतरा कम से कम हो गया। जब दुनिया के सारे देशों में कोरोना से हाहाकार मचा हुआ था तब न्यूजीलैंड में इसके गिनती के मामले थे। न्यूजीलैंड में आम चुनाव सितम्बर 2020 में होना था लेकिन उस समय कोरोना के मामले बढ़े हुए थे। जेसिंडा ने देश हित में चुनाव को एक महीने के लिए टाल दिया। भला ऐसे प्रधानमंत्री को लोग क्यों नहीं सिर आंखों पर बैठाएं ? अक्टूबर 2020 में जब चुनाव हुआ तो जेसिंडा आर्डर्न की लेबर पार्टी को प्रचंड जीत मिली और वे दोबारा प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हुईं। पिछले चुनाव में जेसिंडा की पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। लेकिन 2020 में जनता ने उनके काम का इनाम दिया और बहुमत के साथ फिर कुर्सी सौंप दी। भारत में अभी चुनाव दूर है। लेकिन जनता अभी जो दुख-तकलीफ भोग रही है उसका असर 2024 में जरूर दिखेगा।

English summary
coronavirus Will the people teach a lesson to pm Narendra Modi in elections like donald trump?
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