भारत में कोरोना महामारी बनी अफगान मरीजों के लिए बुरी खबर
70 वर्षीय अफगान नागरिक सदरुद्दीन साल 2016 में बीमार पड़ने से पहले काबुल में अच्छा जीवन बिता रहे थे. सदरुद्दीन की 25 वर्षीया बेटी मरियम बेहेश्ता डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "साल 2016 की शुरुआत में मेरे पिता को लगातार खांसी आनी शुरू हुई. काबुल में डॉक्टर उनके मर्ज को पहचान नहीं पाए." अगले कुछ महीनों में सदरुद्दीन का स्वास्थ्य बिगड़ता गया क्योंकि अफगानिस्तान में डॉक्टर उनका इलाज करने में सक्षम नहीं थे.

युद्ध-प्रभावित इस देश में जन स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर मरीजों का उपचार करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. इसी वजह से ज्यादातर अफगानी भारत आते हैं. बेहेश्ता ने भी अपने पिता को इलाज के लिए भारत ले जाने का फैसला किया. बेहेश्ता कहती हैं, "मैं साल 2018 में पहली बार अपने पिता को भारत ले आई. वहां डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें कैंसर है. लेकिन यहां एक उम्मीद थी क्योंकि भारतीय डॉक्टरों ने जो दवाइयां दी थीं और जिस तरह से उनका इलाज चल रहा था, उससे मेरे पिता को काफी आराम मिल रहा था."
महामारी की शुरुआत
भारत में परीक्षण के बाद सदरुद्दीन और बेहेश्ता इलाज के लिए हर तीसरे महीने भारत आते रहे जब तक कि साल 2020 में कोविड महामारी ने यहां अपने पांव नहीं पसारे थे. लेकिन कोविड संक्रमण की वजह से लागू हुए लॉकडाउन और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर लगे प्रतिबंध ने सदरुद्दीन के लिए बेहद जरूरी उपचार को असंभव बना दिया.
बेहेश्ता कहती हैं, "स्थिति अब और ज्यादा बिगड़ गई है क्योंकि भारत में कोविड संक्रमण की दूसरी लहर काफी खतरनाक हो गई है. अब मैं भारत में उन अस्पतालों से संपर्क भी नहीं कर पा रही हूं जहां मेरे पिता का इलाज वीडियो कॉल्स के जरिए चल रहा था. दूसरी लहर आने से पहले तक कम से कम यह सुविधा तो मिली हुई थी. भारत में अस्पताल स्थानीय नागरिकों से ही भरे पड़े हैं. मैंने अस्पताल को कई बार फोन किया लेकिन मदद के लिए किसी भी डॉक्टर से बात नहीं हो सकी."
सीमित विकल्प
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में अफगानिस्तान ने जन स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से काफी प्रगति की है लेकिन सुविधाओं की गुणवत्ता अभी भी बेहद खराब है. इसकी वजह ये है कि डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं हैं और दूसरी ओर पैसे और चिकित्सा उपकरणों की बेहद कमी है. बहुत से अफगानी नागरिक कैंसर या फिर अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए भारत, ईरान या फिर पाकिस्तान जाने को प्राथमिकता देते हैं.
इनमें भी ज्यादातर लोग भारत आना पसंद करते हैं क्योंकि यहां की स्वास्थ्य सुविधाएं अपेक्षाकृत बेहतर होने के साथ ही यहां इलाज भी सस्ता है और वीजा भी आसानी से मिल जाता है. लेकिन भारतीय अस्पताल इस समय खुद ही कोविड मरीजों की वजह से भरे पड़े हैं और उनके यहां क्षमता से ज्यादा मरीजों का इलाज हो रहा है. इस स्थिति में पड़ोसी देशों के लोगों का इलाज करना उनकी प्राथमिकता में नहीं है.
अफगानी लोगों के लिए आपदा
काबुल स्थित भारतीय दूतावास अफगानी छात्रों, मरीजों और व्यापारिक वजहों से भारत जाने वालों के लिए अभी भी वीजा जारी कर रहा है लेकिन वीजा के लिए जरूरी शर्तें कोविड आपदा की वजह से काफी कड़ी कर दी गई हैं. हालांकि अफगानी नागरिक भी ऐसे समय में भारत जाने से डर रहे हैं जबकि कोविड संक्रमण अपने शीर्ष पर है. गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीजों के लिए वायरस संक्रमण और घातक हो सकता है. सदरुद्दीन और बेहेश्ता को भी भारत में स्थिति सामान्य होने का इंतजार है लेकिन दुर्भाग्य से उनके पास ज्यादा समय नहीं है. बेहेश्ता कहती हैं, "मेरे पिता हर वक्त खांसते रहते हैं. हमारे पास ऐसी दवाइयां खत्म हो गई हैं जो कि भारत में मिलती हैं."
बेहेश्ता काबुल में डॉक्टरों से सलाह ले रही हैं लेकिन उन डॉक्टरों के पास बेहेश्ता के पिता के कैंसर के इलाज की सुविधाएं नहीं हैं. वो कहती हैं, "यदि यात्रा प्रतिबंधों को जल्दी ही वापस नहीं लिया जाता और यदि भारत में जल्दी ही वायरस पर नियंत्रण नहीं पाया जाता, मुझे डर है कि मेरे पिता का जीवन संकट में रहेगा. मेरे पिता बहुत कष्ट झेल चुके हैं. हमने भारत में उनके इलाज और आने-जाने में काफी पैसे खर्च कर दिए हैं." बेहेश्ता यह भी कहती हैं कि भारत में आई कोविड महामारी अफगानी लोगों के लिए भी आपदा बनकर आई है. रिपोर्टिंग में सहयोग जमजमा नियाजई ने किया है.
Source: DW
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