सरकार की गलत नीतियों से गिरी जीडीपी दर!
अब यह स्पष्ट हो गया है कि केन्द्र सरकार के गलत फैसलों के कारण ही जीडीपी दर में गिरावट दर्ज हुई है। नोटबंदी वक्त ही यह आशंका जता दी दी गई थी कि इससे जीडीपी पर गलत असर होगी।
इस वर्ष मार्च के पहले हफ्ते में वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष में 7.1 प्रतिशत की दर से वृद्धि करेगी जबकि अगले दो वित्त वर्ष में यह बढ़कर 7.7 प्रतिशत तक रहेगी। हलांकि फिच ने अक्तूबर-दिसंबर तिमाही के लिये 7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर को चकित करने वाला बताया था। इससे पिछली तिमाही में यह 7.4 प्रतिशत थी। फिच ने कहा कि यह आंकड़ा थोड़ा चकित करने वाला है क्योंकि वास्तविक गतिविधियों के बारे में नोटबंदी के बाद जो आंकड़े जारी किये थे, वे खपत तथा सेवा गतिविधियों में गिरावट का संकेत देते हैं। इसका कारण इन गतिविधियों का नकदी से जुड़ा होना है। उसने कहा कि दिसंबर तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े बताते हैं कि नकदी की समस्या से आर्थिक गतिविधियों पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ा। सरकार ने नवंबर में बड़ी राशि के नोटों को चलन से हटाने का निर्णय किया जो कुल मुद्रा का 86 प्रतिशत था। इस विसंगति के बारे में फिच ने कहा कि हो सकता है कि सरकारी आंकड़ा नोटबंदी के नकारात्मक प्रभाव को शामिल करने में सक्षम नहीं हो। सबके बावजूद जीडीपी का असली चेहरा अब सामने आ गया है।

अब यह स्पष्ट हो गया है कि केन्द्र सरकार के गलत फैसलों के कारण ही जीडीपी दर में गिरावट दर्ज हुई है। नोटबंदी वक्त ही यह आशंका जता दी दी गई थी कि इससे जीडीपी पर गलत असर होगी। चौथी तिमाही में जीडीपी में केवल 6.1% की वृद्धि हुई,, जबकि बाजार का अनुमान 7.1% रहने का था। इस तिमाही में ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (जीवीए) में भी बाजार के 6.7% वृद्धि के अनुमान की तुलना में केवल 5.6% वृद्धि हुई। पूरे वित्त वर्ष के लिए जीवीए वृद्धि दर 6.6% रही, जिसका संकेत पहले ही मिल गया था।
सरकार चाहे कुछ भी कहे और आंकड़ों की बाजीगरी करती रहे, पर यह तो स्पष्ट है कि नोटबंदी का देश की आर्थिक गतिविधियों पर भारी असर हुआ है। वित्त वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर घटकर 6.1 फीसदी पर आ गई है। यह स्थिति तब है जब सरकारी खर्च और कृषि से जीडीपी को बल मिला है। असल में इसे नोटबंदी के कारण बढ़े अप्रत्यक्ष कर का भी सहारा मिला है। पिछले दिनों जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार जीवीए महज 5.6 फीसदी बढ़ा जो दो साल में सबसे कम है। जीडीपी की धीमी वृद्धि के कारण उम्मीद है कि रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक समीक्षा बैठक में दरों में कमी कर सकता है। सुस्ती का असर निजी क्षेत्र की गतिविधियों पर भी दिखने लगा है। कृषि और सरकारी खर्च को हटा दें तो औद्योगिक और सेवा क्षेत्र का जीवीए चौथी तिमाही में महज 3.8 फीसदी बढ़ा। बीते वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह आंकड़ा 8.4 फीसदी था जबकि नोटबंदी वाली तिमाही में यह 5.9 फीसदी बढ़ा था। पूरे वर्ष 2016-17 के दौरान अर्थव्यवस्था महज 7.1 फीसदी की दर से बढ़ी जो तीन साल में सबसे कम है। ये आंकड़ा उतना ही है जितना फरवरी में अग्रिम अनुमानों में बताया गया था।
हालांकि जीवीए पूरे साल के लिए 6.6 फीसदी बढ़ा, मगर वह भी तीन साल में सबसे कम है और दूसरे अग्रिम अनुमान के 6.7 फीसदी के आंकड़े से नीचे है। अगर कृषि और सरकारी खर्च हटा दें तो जीवीए में बढ़ोतरी 4.8 फीसदी तक धीमी हो गई है जो पहली छमाही में 7.6 फीसदी थी। मतलब ये कि साल की दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था को रफ्तार कृषि और सरकारी खर्च ने दी। तीसरी तिमाही में इसमें 8.2 फीसदी जबकि चौथी तिमाही में 10.2 फीसदी बढ़ा। नोटबंदी ने चौथी तिमाही में निर्माण और वित्तीय सेवा क्षेत्र पर विपरीत असर डाला।
दुखद यह है कि भारत के आर्थिक विकास की गति अब चीन से पीछे रह गयी है। 31 मार्च को खत्म हुए कारोबारी साल 2016-17 की आखिरी तिमाही यानी जनवरी से मार्च के दौरान आर्थिक विकास दर 6.1 फीसदी रही, जबकि इस दौरान चीन की आर्थिक विकास दर 6.9 फीसदी रही थी। पूरे कारोबारी साल 2016-17 की बात करें तो आर्थिक विकास दर 7.1 फीसदी रही है जबकि 2015-16 में ये दर 8 फीसदी ऱही थी। हालांकि सांख्यिकी विभाग विकास दर में आयी कमी के लिए केवल नोटबंदी को ही जिम्मेदार नहीं मानता। उसका कहना है कि गिरावट की कई वजहे हैं जिनमें से एक नोटबंदी भी है। विभाग ने ये भी माना कि अभी निवेश की रफ्तार धीमी है।
2016-17 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में विकास दर 7.9 फीसदी (पहले 7.2 फीसदी थी जिसमें संशोधन किया गया है) दर्ज की गयी, जबकि दूसरी तिमाही (जुलाई-सितम्बर) में 7.5 फीसदी, तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसम्बर) में 7 फीसदी और चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में 6.1 फीसदी रही। विकास दर के ताजा आंकड़े औद्योगिक उत्पादन और थोक महंगाई दर के आंकलन में किए गए बदलाव के मुताबिक है। हाल ही में औद्योगिक उत्पादन और थोक महंगाई दर के आंकलन के लिए आधार वर्ष 2004-05 की जगह 2011-12 को अपनाया गया ताकि आंकडे ज्यादा वास्तविक लगे। इस फेरबदल को ध्यान में रखते हुए विकास दर के पुराने आंकड़ों में भी बदलाव किए गए।
इस तरह अगर मोदी सरकार के वर्षों के कार्यकाल को देखे तो 2014-15 में विकास दर 7.5 फीसदी दर्ज की गयी जो 2015-16 में बढ़कर 8 फीसदी पर पहुंची जबकि 2016-17 में 7 फीसदी रही। चौथी तिमाही में अगर अलग-अलग क्षेत्रों की विकास दर की बात करें तो बागवानी और मत्स्य पालन समेत कृषि क्षेत्र में ये दर 5.2 फीसदी रही जबकि खनन में 6.4 फीसदी और मैन्युफैक्चरिंग में 5.3 फीसदी दर्ज हुई।
अब तक सरकार यही दोहराती रही थी कि नोटबंदी से आर्थिक वृद्धि दर पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। लेकिन सरकार के इन दावों को खुद सरकारी आंकड़ों ने झुठला दिया है। साथ ही, आर्थिक मामलों के बहुत-से जानकारों की यह आशंका सही साबित हुई है कि नोटबंदी के चलते वृद्धि दर में कमी आएगी। ये आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब अपने तीन साल पूरे होने पर मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट रही है। आर्थिक वृद्धि दर में कैसी कमी आई है, सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़े गवाह हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक वित्तवर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च) में जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर घट कर 6.1 फीसद पर आ गई। यह हालत तब है जब सरकारी खर्च और कृषि से जीडीपी को सहारा मिला है।
यह दिलचस्प है कि जिस समय प्रधानमंत्री स्पेन में भारतीय अर्थव्यवस्था के और मजबूत होने का भरोसा दिला रहे थे, उसी समय ये आंकड़े आए। अपने दावों पर पानी फिरता देख सरकार के माथे पर पसीना आना ही था। लिहाजा, वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बचाव में उतरने में तनिक देर नहीं की। उन्होंने सारा ठीकरा वैश्विक आर्थिक मंदी और पिछली सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि वृद्धि दर में आई कमी का नोटबंदी से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यह सफाई गले नहीं उतरती। अगर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और पिछली सरकार से विरासत में मिली 'खराब अर्थव्यवस्था' ही वृद्धि दर में गिरावट के कारण हैं, तो सवाल है कि बीते वित्तवर्ष की पहली तिमाही और पहली छमाही में गिरावट क्यों नहीं दिखी? ताजा आंकड़े बताते हैं कि वित्तवर्ष 2016-17 में जीवीए महज 5.6 फीसद बढ़ा, जो कि दो साल में सबसे कम है।
हालात ये है कि कच्चा तेल, कोयला व सीमेंट के उत्पादन में गिरावट से आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल में घट कर ढाई फीसद रह गई। जबकि पिछले साल अप्रैल में यह आंकड़ा 8.7 फीसद था। अगर नोटबंदी के बावजूद कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र में 5.2 फीसद की खासी बढ़ोतरी हुई, तो यह अच्छे मानसून और किसानों की मेहनत के चलते हुआ। लेकिन किसानों को अपने श्रम का कैसा लाभ मिला? वे अपनी पैदावार का उचित दाम पाने के लिए तरस रहे हैं। बहुतों को लागत भर की कीमत भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में कई जगह से उपज को कचरे की तरह फेंक देने और कई जगह से किसानों के खुदकुशी करने की भी खबरें आई हैं। यह उस पार्टी के राज में हो रहा है जिसने पिछले लोकसभा चुनाव में किसानों को लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने की व्यवस्था करने का वादा किया था। बहरहाल, स्थितियां अनुकूल नहीं हैं। देखना है कि सरकार क्या करती है।












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