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मस्तिष्क संतुलन के लिए अनुलोम विलोम

By सिद्धार्थ प्रसाद
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अनुलोम-विलोम सभी उम्र के लोग कर सकते हैं और सुविधानुसार इसकी अवधि तय की जा सकती है
अनुलोम विलोम प्राणायाम मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध में संतुलन लाता है. यह हमारी विचार करने की शक्ति और भावनाओं में समन्वय लाता है.

प्राणायाम के दौरान जब हम गहरी साँस भरते हैं तो शुद्ध वायु हमारे खून के दूषित पदार्थों को बाहर निकाल देती है. शुद्ध रक्त शरीर के सभी अंगों में जाकर उन्हें पोषण प्रदान करता है.

अनुलोम-विलोम प्राणायाम सभी आयु वर्ग के लोग कर सकते हैं और सुविधानुसार इसकी अवधि तय की जा सकती है. यह अनुलोम-विलोम प्राणायाम की प्रारंभिक तैयारी है.

प्राणायाम करने के लिए ध्यानात्मक आसन जैसे पदमासन का चुनाव करना चाहिए. जो पालथी मारकर नहीं बैठ सकते, वो कुर्सी पर बैठ सकते हैं बशर्ते अपनी रीढ़, कमर और गर्दन को सीधा रखें.

नसाग्र मुद्रा

अनुलोम विलोम प्राणायाम के लिए दाहिने हाथ की नसाग्र मुद्रा बनाते हैं. नसाग्र मुद्रा बनाने के लिए दाएँ अंगूठे से दाईं नासिका को बंद रखें और बाईं नासिका से इस प्राणायाम की शुरुआत करें. पहली दो उंगलियों को बिंदी वाले स्थान पर यानी भू-मध्य पर रखें.

बाईं हथेली को बाएँ घुटने पर रखें. ज्ञान या चिन्न मुद्रा में अर्थात अंगूठे और पहली उंगली के अग्रभाग को मिलाकर रखें और बाकी की तीन उंगलियां खुली रखें.

विधि

आसन शुरू करने से पहले बची हुई साँस को बाहर निकाल दें. इसके बाद बाईं नाक से गहरी साँस भरें और इसी नाक से पूरी साँस धीरे-धीरे बाहर निकाल दें.

इसके बाद अनामिका यानी तीसरी उंगली से बाईं नासिका को बंद कर दीजिए. पाँच बार दाईं नासिका से गहरी साँस भरिए और दाईं नासिका से ही नियंत्रणपूर्वक सांस को बाहर निकाल दीजिए.

साँस लेने और छोड़ने की आवाज़ नहीं होनी चाहिए. अभ्यास के दौरान साँस नहीं रोकनी चाहिए
अंत में दाईं हथेली को भी घुटने पर ले आइए. इस बार दोनों नासिका से पाँच बार साँस भरकर पूरी साँस बाहर निकाल दीजिए.

साँस लेने और छोड़ने की आवाज़ नहीं होनी चाहिए. अभ्यास के दौरान साँस नहीं रोकनी चाहिए. साँस लेने और छोड़ने का समय बराबर होना चाहिए.

इसके लिए साँस भरते हुए पाँच बार मन ही मन गिनती गिनें और मन ही मन साँस छोड़ते हुए भी पाँच बार गिनती गिनें. ऐसा धीरे-धीरे नियंत्रणपूर्वक करना चाहिए.

15 दिन तक इस क्रिया का अभ्यास करें और उसके बाद ही अनुलोम-विलोम प्राणायाम का पूर्णतया अभ्यास किया जा सकता है.

अनुलोम-विलोम प्राणायाम-2

पदमासन में बैठिए. बाईं हथेली को बाएँ घुटने पर रखिए. ज्ञान या चिन्न मुद्रा में और दाहिने हाथ की नसाग्र मुद्रा बनाइए.

शुरुआत में बची हुई साँस को बाहर निकाल दें. इसके बाद बाईं नासिका से साँस भरिए. साँस भरते हुए पहले पेट फुलाएँ और फिर छाती फुलाएँ.

बाईं नासिका से साँस लेने के बाद अनामिका से बाईं नासिका को बंद कर दीजिए और दाईं नासिका से अंगूठे को हटा लीजिए और पूरी साँस को बाहर निकाल दीजिए. साँस छोड़ते हुए पहले छाती से साँस बाहर आएगी, फिर पेट अंदर की ओर जाएगा.

अनुलोम विलोम का अभ्यास दस मिनट तक सुबह या शाम खाली पेट कर सकते हैं
इसी प्रकार दाईं नासिका से ही साँस भरिए और बाईं नासिका से साँस निकाल दीजिए. साँस निकालते वक़्त दाईं नासिका को अंगूठे से बंद रखेंगे.यह अनुलोम विलोम प्राणायाम का पहला राउंड है.

आप दस मिनट तक इसका अभ्यास सुबह या शाम खाली पेट कर सकते हैं. सुबह पाँच-दस बार इसका अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए.

लाभ

अनुलोम-विलोम प्राणायाम के अभ्यास से हम अतिरिक्त शुद्ध वायु भीतर लेते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड यानी दूषित वायु बाहर निकाल देते हैं. इससे रक्त की शुद्धि होती है.

शुद्ध रक्त हृदय के माध्यम से शरीर के सभी अंगों तक पहुँच जाता है और उन्हें पोषण प्रदान करता है. फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है और प्राणशक्ति का स्तर बढ़ता है.

मस्तिष्क की विचार क्षमता गहरी होती है और एकाग्रता बढ़ती है. मानसिक तनाव का स्तर घटता है. इसलिए हृदय रोगी और जिनका रक्तचाप बढ़ा हुआ है और उन्हें अनुलोम-विलोम का अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए.

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