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देह शीतल रखने के लिए शीतली प्राणायाम

By सिद्धार्थ प्रसाद
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देह को शीतलता प्रदान करता है और रक्तचाप कम करने में मदद करता है
शीतली प्राणायाम देह को शीतलता प्रदान करता है. इससे शरीर में प्राणों का प्रवाह नियमित और नियंत्रणपूर्वक होता है. इससे मानसिक स्तर पर शाँति मिलती है और भावनात्मक संतुलन आता है.

गर्मी के दिनों में भी शीतली प्राणायाम से राहत मिलती है. इससे मानसिक शांति प्राप्त होती है. इससे शरीर में प्राणों का प्रवाह नियमित और नियंत्रणपूर्वक होता है.

शीतली प्राणायाम के लिए किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठिए. रीढ़ को सीधा रखें. दोनों हाथ घुटनों पर चिन्न मुद्रा में रहेंगे. चाहे तो आँखें भी बंद कर सकते हैं. पूरे शरीर को ढ़ीला छोड़ दें.

प्राणायाम के समय साँस लयबद्ध और गहरी होना चाहिए. प्राणायाम के प्रभाव को महसूस करने के लिए अभ्यास के बाद कुछ देर विश्राम करें.

विधि

जीभ बाहर निकाले. जीभ को दोनों ओर से इस प्रकार मोड़ें कि जीभ की आकृति ट्यूब जैसी बन जाए. इस ट्यूब की मदद से आप मुँह से साँस भरिए. हवा इस ट्यूब से गुजरकर मुँह और तालु को ठंडक प्रदान करेगी.

इसके बाद जीभ अंदर कर लीजिए और नियंत्रणपूर्वक साँस धीरे धीरे नाक के द्वारा बाहर निकालें.

साँस भरते हुए आपको आवाज़ सुनाई देगी जिस प्रकार तेज़ हवा चलने पर हमारे आसपास आवाज़ सुनाई देती है.

शीतली प्राणायाम का अभ्यास दस बार कभी भी कर सकते हैं. गर्मी के मौसम में इसकी अवधि इच्छानुसार बढ़ाई जा सकती है.

लाभ

शीतली प्राणायाम के अभ्यास से भूख-प्यास पर नियंत्रण प्राप्त होता है. शरीर को ठंडक मिलती है. गर्मियों में इसका अभ्यास करना चाहिए.

अभ्यास में किसी तरह की ज़ल्दबाज़ी नहीं करना चाहिए.

इससे मानसिक स्तर पर शाँति मिलती है और भावनात्मक संतुलन आता है. शरीर में प्राणों का प्रवाह नियमित होता है.

इससे माँसेपेशियों में स्थिरता और ढ़ीलापन आता है. रक्तचाप भी कम होता है. इसलिए उच्च रक्तचाप वालों के लिए शीतली प्राणायाम फायदेमंद है. एसिडिटी की शिकायत होने पर भी इससे लाभ होता है.

प्राणायाम से ह्रदय, फेफड़े, और तंत्रिका तंत्र मज़बूत होते हैं. उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है.

सर्दियों में शीतली प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए क्योंकि यह प्राणायाम शरीर को शीतलता प्रदान करता है. धूल भरे वातावरण में भी प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए.

ब्लड प्रेशर कम होने या जिन्हें सर्दी-खाँसी, दमा, ब्रोंकाईटिस, कफ आदि की समस्या होने पर शीतली प्राणायाम नहीं करना चाहिए.

प्राणायाम के अभ्यास से पहले योग गुरू के दिशा निर्देशों का पालन अवश्य करें और कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखें.

ख़ास बातें

प्राणायाम का अभ्यास हमेशा आसान तरीके से शुरू करना चाहिए. अभ्यास पर नियंत्रण पाने के बाद प्राणायाम की अवधि बढ़ाई जा सकती है.

प्राणायाम के अभ्यास के दौरान शुरू में हम इसके लाभों को देख नहीं पाते लेकिन सूक्ष्म और स्थूल रूप से हमारे शरीर और मन को लाभ मिलता है.

अभ्यास से पहले स्नान करना बेहतर है. सर्दी ज़्यादा होने पर हाथ, पैर और चेहरे को धोने के बाद प्राणायाम करें. आसन और प्राणायाम के बाद स्नान करना चाहें तो कम से कम आधे घंटे का अंतराल रखें ताकि इस दौरान रक्त का संचार सामान्य हो जाए.

नाक से साँस लें. नाक से ही साँस छोड़ें. प्राणायाम सूर्योदय के समय करें. सूर्यास्त के समय भी प्राणायाम कर सकते हैं. कड़ी धूप में प्राणायाम नहीं करें. प्राणायाम से पहले कोई आसन ज़रूर करें.

संतुलित आहार

योग का अभ्यास करने वालों को संतुलित आहार लेना चाहिए जिसमें प्रोटीन, कॉर्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और मिनरल हों. ताज़े फल और हरी सब्ज़ियों का प्रयोग ज़्यादा करें. भोजन हमेशा भूख के अनुसार और समय से कर लेना चाहिए.

प्राणायाम के नए साधक को यदि कब्ज़ हो और मूत्र की मात्रा कम हो जाए तो नमक और मसालेदार भोजन बंद कर दें. पानी अधिक मात्रा में पिएं. दस्त लगें तो कुछ दिन तक दही चावल का प्रयोग करें.

नए साधक को सुईयाँ चुभना, खुजली, गर्मी-सर्दी, हल्कापन-भारीपन जैसे कुछ नकारात्मक अनुभव हो सकते हैं.

इसका कारण शरीर से दूषित पदार्थों का बाहर निकलना है. इसलिए घबराना नहीं चाहिए. लंबे समय तक ऐसा ज़ारी रहे तो योग शिक्षक की सलाह लेना चाहिए.

बीमार हो तो प्राणायाम नहीं करें. प्राणायाम से पहले तनाव रहित हो जाएँ. धूम्रपान नहीं करें.

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