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वित्तीय संकट ने नींद उड़ाई

By Staff
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आमतौर पर एक वयस्क को हर रात सात से नौ घंटों की नींद की ज़रूरत होती है.
एक ऑनलाइन सर्वे में संकेत मिले हैं कि अर्थव्यवस्था के बारे में चिंता ने अनेक लोगों की रातों की नींद गायब कर दी है. कई लोग पाँच घंटे भी नहीं सो पा रहे.

नेटडॉक्टर का क़रीब एक हज़ार लोगों पर किया गया सर्वेक्षण बताता है कि नींद न आने की यह स्थिति पिछले साल के मुक़ाबले अब और ख़राब हो गई है.

इस सर्वेक्षण के अनुसार जनसंख्या का पाँचवा हिस्सा नियमित रूप से रातों में पाँच घंटे से भी कम समय सो रहा है और एक चौथाई लोग एक रात में तीन बार से भी ज़्यादा बार जागते हैं.

नींद न आने के पीछे तनाव ही मुख्य कारक के रूप में सामने आया है जबकि दो तिहाई लोगों ने नींद न आने की वजह पैसा और काम की चिंताओं को बताया.

क़रीब 30 फ़ीसदी लोगों ने रातों को जागने के लिए अपने साथी के खर्राटों को ज़िम्मेदार ठहराया.

सर्वेक्षण के परिणाम

नेटडॉक्टर ने यह सर्वेक्षण तब कराया जब उन्होंने अपनी वेबसाइट पर नींद न आने की बीमारी के लिए सलाह माँगने वालों की संख्या बढ़ते देखी.

ऑनलाइन सवालों के जवाब देने वालों में से आधे लोगों ने कहा कि अगर हो सके तो वे आठ घंटे से ज़्यादा नींद लेना चाहते हैं. जबकि 17 फ़ीसदी से भी कम लोग ही ऐसा कर पाते थे.

नींद की समस्याओं आजकल की वित्तीय चिंताओं की वजह से भी बढ़ती हुई दिख रही हैं. चिंता और तनाव लोगों की नींद पर असर करते हैं. ख़राब आर्थिक व्यवस्था और मंदी की डर उन लोगों में भी आतंक पैदा कर देता है जिनका अब तक इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है
हर दस लोगों में से एक ने कहा कि उन्हें हर रात नींद आने में दो घंटे लगते हैं.

और रात में जागने वालों में से 63 फ़ीसदी लोगों ने पाया कि उन्हें दोबारा नींद आना बहुत मुश्किल होता है.

नेटडॉक्टर के सलाहकार डॉ रोजर हैंडरसन ने कहा, "नींद संबंधी समस्याएं आम हैं और ऐसी हैं जिनका हम सभी कभी न कभी अनुभव करते हैं. इस सर्वेक्षण के परिणाम नींद न आने संबंधी समस्या में एक चिंताजनक वृद्धि के बारे में बताते हैं."

सलाह

उन्होंने कहा, "यह याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि ऐसे अनेक तरीक़े हैं जिनसे रात की ज़्यादा गहरी नींद सुनिश्चित हो सकती है. इसके लिए कैफ़ीन को छोड़ कर गर्म चाकलेट इत्यादि दूध के ड्रिंक का सेवन करना चाहिए."

'स्लीप काउंसिल' की जेसिका अलेक्ज़ांडर कहती हैं कि दूसरी संस्थाओं ने भी बाद में इसी तरह का चलन देखा है.

उन्होंने कहा, "नींद की समस्याएँ आजकल की वित्तीय चिंताओं की वजह से भी बढ़ती हुई दिख रही हैं. चिंता और तनाव लोगों की नींद पर असर करते हैं. ख़राब आर्थिक व्यवस्था और मंदी का डर उन लोगों में भी आतंक पैदा कर देता है जिनका अब तक इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है."

उनके अनुसार, "इसके लिए हमें ऐसे लोगों को सोने से पहले चिंता न करने और आराम करने के तरीक़े खोजने के लिए उत्साहित करना होगा."

जेसिका कहती हैं, "हर व्यक्ति के लिए यह अलग तरह से होगा लेकिन गर्म बिस्तर और किताब पढ़ने की कोशिश सभी को करनी चाहिए. इससे विचारों की गाड़ी को कुछ आराम मिलेगा. और अगर आप देखें कि आप बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं तो बेहतर यही होगा कि बिस्तर से उठकर तब तक कुछ और करें जब तक आपको नींद नहीं आती."

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