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भारत की अंतरिक्ष यात्रा

By पाणिनी आनंद
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भारत की अंतरिक्ष अभियान की महत्वाकांक्षा काफ़ी पुरानी है
चंद्रमा पर पहले मानव निर्मित अंतरिक्षयान के क़दम रखने के पहले 1963 में भारत ने अंतरिक्ष में अपनी पहली दस्तक दी थी.

इससे पहले 1962 में विक्रम साराभाई की देखरेख में भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति का गठन होता है.

यह दस्तक एक रॉकेट के रूप में अंतरिक्ष में जाती है. अंतरिक्षविज्ञानी विक्रम साराभाई के नेतृत्व में भारत की यह शुरुआत 2008 में चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेजने तक आ पहुँची है.

भारत के अंतरिक्ष में अहम पड़ावों पर नज़र डालें तो कुछ तारीख याद आती हैं और साथ ही कुछ उपलब्धियाँ भी.

1965 में थुम्बा में अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनीकी संस्थान (एसएसटीसी) की स्थापना होती है.

1968 में सेटेलाइट कम्युनिकेशन अर्थ स्टेशन की स्थापना की जाती है. इसे परीक्षण के लिहाज से तैयार किया जाता है.

1969 में 15 अगस्त के दिन इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन होता है और यहां से एक नई नींव पड़ती है अंतरिक्ष अनुसंधान की.

जिस श्रीहरिकोटा नाम की जगह से चंद्रयान भेजा जा रहा है उसका अस्तित्व भी अक्टूबर, 1971 में सामने आया. बाद में 2003 में इसका नाम सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र कर दिया गया.

1972 में सरकार ने केंद्रीय स्तर पर एक अंतरिक्ष विभाग का गठन किया. इस दौरान भारत के कुछ अन्य शहरों में अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े केंद्रों का निर्माण और कामकाज की शुरुआत जारी रहती है.

एक अप्रैल, 1975 को केंद्र सरकार इसरो को सरकारी संगठन के तौर पर मान्यता देती है. इसी वर्ष अमरीकी उपग्रह एटीएस-6 की मदद से टेलीविज़न प्रसारण के लिए भारत रास्ता खोलता है.

आर्यभट्ट की यात्रा

पर सबसे ऐतिहासिक है 19 अप्रैल, 1975 का दिन क्योंकि इसी दिन भारत का पहला उपग्रह- आर्यभट्ट अंतरिक्ष में भेजा जाता है.

आर्यभट्ट के छोड़े जाने के बाद कुछ यूरोपीय देशों की मदद से 1977 में भारत की सेटेलाइट टेलीकम्युनिकेशन परियोजना की शुरुआत होती है.

1979 भी इसी दिशा में कम महत्वपूर्ण नहीं रहा. सात जून, 1979 को पृथ्वी के अध्ययन के लिए भारत का उपग्रह भास्कर-1 पृथ्वी की कक्षा में छोड़ा जाता है.

चंद्रयान-1 चंद्रमा की सतह से सौ किलोमीटर ऊपर स्थित रहेगा

इसी वर्ष यानी 10 अगस्त, 1979 को एसएलवी-3 नाम के लॉन्चर का प्रयोगात्मक तौर पर भारत परीक्षण करता है.

यह क्रम 18 जुलाई, 1980 को फिर दोहराया जाता है जब एसएलवी-3 और रोहिणी आरएस-1 उपग्रह को भारत अंतरिक्ष में छोड़ता है. रोहिणी को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित भी किया जाता है.

पहला विकसित एसएलवी-3 1981 में भेजा जाता है. 31 मई, 1981 को आरएस-डी1 भी पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाता है. इसी वर्ष 19 जून को एपेल नाम की सेटेलाइट भी प्रक्षेपित होती है. 20, नवंबर, 1981 को भास्कर-2 का प्रक्षेपण होता है.

अब भारत विकास के क्रम में इन्सेट के विकास तक पहुँच जाता है. 10 अप्रैल, 1982 को इन्सेट-1ए का प्रक्षेपण होता है.

1983 भारत के सूचना तकनीक विकास का अहम वर्ष है. एसएलवी-3 और आरएस-डी2 का प्रक्षेपण, इन्सेट-1बी के प्रक्षेपण के साथ ही इन्सेट तकनीक को हरी झंडी मिलती है. 1984 तक इन्सेट तकनीक से दूरसंचार, टेलीविज़न जैसी सुविधाएं जुड़ती हैं.

पहले एएसएलवी लॉन्चर की मदद से 24 मार्च, 1987 को रोहिणी उपग्रह श्रंखला-1 को अंतरिक्ष में भेजा जाता है.

1988 में आईआऱएस-1ए का प्रक्षेपण होता है और इसी से भारत रिमोट सेंसिंग सिस्टम को स्थापित करता है. 22 जुलाई 1988 को एन्सेट-1सी भी प्रक्षेपित हो जाता है.

इन्सेट का प्रक्षेपण

जून, 1990 में इन्सेट-1डी का प्रक्षेपण होता है. 1डी के बाद इन्सेट श्रंखला की दूसरी पीढ़ी की शुरुआत होती है. 10 जुलाई, 1992 को इन्सेट-2ए का प्रक्षेपण होता है.

इसके बाद 1993 में इन्सेट 2बी, आईआऱएस-1ई और फिर 1994 में आईआरएस-पी2 का प्रक्षेपण होता है.

सात दिसंबर, 1995 को इन्सेट-2सी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा जाता है.

जिस लॉन्चर, पीएसएलवी से चंद्रयान को छोड़ा जाएगा, उसका विकास भी 1997 में ही होता है. इसी की मदद से आईआरएस-1डी अंतरिक्ष में स्थापित किया जाता है.

1997 में इन्सेट 2डी और 1999 में इन्सेट 2ई का प्रक्षेपण भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अब दुनिया के पटल पर लाना शुरू कर देता है. 1999 में ही भारत कोरिया और जर्मनी के उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ता है.

इन्सेट की तीसरी पीढ़ी वर्ष 2000 में इन्सेट-3 बी के साथ शुरू होती है. इसके बाद 2001 में भारत पीएसएलवी-3सी विकसित करके प्रक्षेपित करता है.2001 में ही जीएसएलवी लॉन्चर का पहली बार प्रयोग भारत करता है.

यहाँ से भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम खासी गति पकड़ लेता है. 2002 में इन्सेट-3सी, कल्पना-1 उपग्रह का प्रक्षेपण, 2003 में इन्सेट-3ए और 3ई का प्रक्षेपण और फिर 2005 में हम्सेट और कार्टोसेट जैसे उपग्रहों का प्रक्षेपण भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान को आगे लेकर जाता रहता है.

2005 में ही इन्सेट 4ए का प्रक्षेपण होता है. इसके बाद जीएसएलवी लॉन्चर की मदद से इन्सेट-4सी प्रक्षेपित होता है.

अंतरिक्ष अनुसंधान और तकनीक विकास के क्रम में भारत का आगे जाने का सिलसिला जारी रहता है. वर्ष 2007 में बेहतर तकनीक के साथ कुछ अन्य देशों के उपग्रह भारत अंतरिक्ष में भेजता है.

2007 तक एकसाथ सर्वाधिक उपग्रह छोड़ने का कीर्तिमान था रूस के पास. रूस ने एकसाथ आठ उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा था. इससे आगे जाकर 2008 में 28 अप्रैल को भारत ने एकसाथ 10 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे.

बुधवार यानी 22 अक्टूबर, 2008 को मानवरहित चंद्रयान की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत इस दिशा में एक नई कड़ी जोड़ देगी. सचमुच, भारत अंतरिक्ष अनुसंधान की नई पीढ़ी में प्रवेश कर रहा है.

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