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सबसे यादगार दीवाली है यह मेरे लिए...

By पाणिनी आनंद
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अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया भारत ने.
श्रीहरिकोटा में चंद्रयान के प्रक्षेपण का नज़ारा हमारे संवाददाता के लिए एक अनोखा अनुभव रहा.

श्रीहरिकोटा में अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण के लिए तैयार था. हम लोग चंद्रयान से क़रीब नौ किलोमीटर दूरी के फासले पर स्थित इसरो के एक केंद्र से आसमान की ओर लगातार ताक रहे थे.

फिर छह बजकर 21 मिनट हुए. लाउडस्पीकर पर ज़ोर-ज़ोर से सेकेंडों की उल्टी गिनती शुरू हो गई. एक मिनट बीता और तभी बादलों और पेड़ों के बीच दिन के सूरज के बराबर में एक और सूरज पैदा होता दिखाई दिया.

काले बादलों और हरे पेड़ों वाला क्षितिज तेज़ रौशनी से भर गया और कुछ क्षणों के लिए पीएसएलवी पर सवार चंद्रयान हमें दिखाई दिया.

अभी कुछ कैमरे संभलते और कुछ लोग उस दृश्य को आंखों में समा पाते कि तभी गहरे बादलों में खो गया चंद्रयान. पर इस खोने में पाना भी निहित था. अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया भारत ने.

पत्रकार, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और न जाने कितने ही और लोगों की हथेलियाँ बज उठीं. हर एक की आंखों में चंद्रयान की चमक दिख रही थी.

अगले कुछ क्षणों तक चंद्रयान के बादलों में छिपने के बाद भी कान सबकुछ देख पा रहे थे. ज़ोरदार गर्जना के साथ आगे बढ़ता चंद्रयान कैसे क़ामयाबी की बुलंदियों की ओर बढ़ रहा होगा, इसे कानों से साफ़ महसूस किया जा रहा था.

सुरक्षा में तैनात कुछ सिपाही, कई छायाकार, कुछ टीवी चैनलों को कुछ प्रिंट मीडिया के पत्रकार और इसरो के अधिकारी, कर्मचारी... सबके हाथ या तो उठ गए थे या ताली बजा रहे थे.

कुछ ज़रूर लाइव करवेज के लिए अपने दर्शकों को हर बात बता देने की कोशिश में लगे थे पर चंद्रयान के छूटने के बाद शब्दों का संयोजन और आगे कुछ कह-बता पाना कइयों के लिए मुश्किल था.

चंद्रयान के प्रक्षेपण से कुछ मिनट पहले ही थमी थी बारिश और प्रक्षेपण को 10-15 मिनट ही बीते थे कि बारिश फिर शुरू हो गई. लगा, मानो बारिश प्रक्षेपण के लिए ही थमी थी शायद.

मैं आज बचपन की एक कविता याद कर रहा था. सोच रहा था कि जॉनी की बात मानने वाली ‘रेन आज मेरे कहने पर ‘गो अवे... क्यों नहीं हो रही है. पर चांद की ओर बढ़ता तकनीक का यह खेल बादलों और बरखा की सीमा को पलक झपकते ही लांघ चुका था.

इसरो के अध्यक्ष माधवन नायर ने प्रक्षेपण के कुछ मिनट बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले चरण का उद्देश्य था कि चंद्रयान सफलता से छोड़ा जा सके और अपनी पहली कक्षा में स्थापित हो. ऐसा हो गया है और हम अपने पहले और सबसे कठिन उद्देश्य में सफल हो गए है.

चंद्रयान-1 अब अंतरिक्ष में बढ़ रहा है. नौ नवंबर को चंद्रयान चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करेगा और तबतक पृथ्वी के ही चक्कर लगाएगा. बहुत वेग से, बहुत बड़ी और निरंतर विस्तार पाती कक्षा में. वैज्ञानिक हर क्षण इसकी शक्ति और सामर्थ्य की परीक्षा लेते रहेंगे.

पहले लग रहा था कि शायद मौसम साथ न दे

पर मेरे लिए 22 अक्टूबर की सुबह ख़ास और यादगार है. बचपन में कई दीवालियों पर आकाश में जाने वाली आतिशबाज़ी और उसके डिब्बे पर बने अपोलो अंतरिक्ष यान को हमने देखा है.

विज्ञान की कॉपियों के कवर और किताब के पन्नों पर चंद्रयानों को देखकर सवाल उठता था कि भारत का झंडा चांद तक कब पहुँचेगा. कब अपोलो की जगह, चंद्रयान या अपनों जैसा नाम लिए कोई यान चंद्रमा की ओर बढ़ेगा, हम उसे किताबों के कवर पर देखेंगे. टेढ़े मुंह वाला चांद तब हमें मुंह चिढ़ाता था.

पर इस प्रक्षेपण के बाद इसरो अध्यक्ष ने बताया कि चंद्रमा पर जो चीज़ें यह चंद्रयान लेकर जा रहा है, उसमें कई ऐसी जिज्ञासाओं का भी ध्यान रखा गया है. भारत का झंडा भी चांद पर उतरेगा.

हाँ, मगर दीवाली के ठीक पहले मेरी आंखों में वो आतिशबाज़ी सदा के लिए बस गई है जो मेरे आंखों देखे अनुभव में सबसे लंबा फ़ासला तय करेगी. आतिशबाज़ी, उत्साह, विकास, त्योहार-पर्व, उत्सव और तकनीक की पहुँच इस बार चांद तक है.

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