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माँसपेशियों की मज़बूती के लिए स्वास्तिकासन

By Staff
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स्वास्तिकासन एक सरल ध्यानात्मक आसन है. बडे-बुजुर्गों के लिए यह उत्तम आसन है
स्वास्तिकासन और शैथिल्य आसन के नियमित अभ्यास से रीढ और पीठ की माँसपेशियाँ शिथिल होती हैं और उनकी शक्ति भी बढती है.

नियमित अभ्यास से रीढ और पीठ की माँसपेशियाँ शिथिल होती हैं और उनकी शक्ति भी बढती है.

स्वास्तिकासन एक सरल ध्यानात्मक आसन है. यह ख़ासतौर से उनके लिए है जिन्हें पद्मासन में बैठने में मुश्किल होती है या जिनके घुटनों में अकडन रहती है. स्वास्तिकासन का अभ्यास करके आप पद्मासन के लिए अपने आप को तैयार कर सकते हैं.

इस आसन के अभ्यास से कुछ महीने बाद आप पाएंगे कि एकाग्रता बढती जा रही है और आप मानसिक रूप से शाँत एवं तनावरहित हो रहे हैं. योग का लक्ष्य भी यही है.

दोहरा कम्बल बिछाकर बैठें, दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर रखिए. पहले बाएँ पैर को मोडें और बाएँ पैर के तलवे को दाएँ पैर की जँघा के साथ अंदर की ओर मिलाकर रखिए.

तत्पश्चात दाएँ पैर को भी मोडिए और दाएँ पैर के तलवे को बाएँ पैर की पिण्डली और जाँघ के बीच रखिए. पैर के अँगूठे को पिण्डली और जाँघ के बीच छुपा दीजिए.

इसी प्रकार बाएँ पैर के अँगूठे को दाएँ पैर की पिण्डली और जाँघ के बीच छुपाना है. इसके लिए आपको बाँए हथेली का सहारा लेना पडेगा.

अब आप इस आसन को और व्यवस्थित कर लीजिए. रीढ को सीधा रखें और दोनों पैरों के घुटनों को जमीन से लगा दें. दोनों हथेलियों को ज्ञान या चिन्न मुद्रा में घुटनों पर रखें. दृष्टि सामने की ओर होनी चाहिए.

शरीर और मन को शांत एवं तनावरहित करने का प्रयास करे. जब तक संभव हो, इस आसन को कर सकते हैं.

लाभ

जो पालथी मारकर नहीं बैठ सकते हो, वे स्वास्तिकासन में अधिक आनंद प्राप्त करेंगे. ख़ासकर जिन्हें वेरीकोज़ विन्स की समस्या हो, पैरों की पेशियों में दर्द रहता हो या थकावट हो, वे इस आसन में लंबे समय तक बैठ सकते हैं.

स्वास्तिकासन भी ध्यानात्मक आसन है जो आपको पद्मासन में बैठने के लिए तैयार करता है. जो पद्मासन नहीं कर सकते हैं, उन्हें स्वास्तिकासन का अभ्यास करना चाहिए. बडे-बुजुर्ग और जिनके घुटनों में कडापन हो, उनके लिए स्वास्तिकासन उत्तम है. जो बैठकर ध्यान करना चाहते हैं, उन्हें भी स्वास्तिकासन का चुनाव करना चाहिए. जिन्हें श्याटिका या कमर के निचले भाग में दर्द है, उन्हें शैथिल्य आसन नहीं करना चाहिए.

शैथिल्य आसन

शैथिल्य आसन अपने शरीर को शिथिल करने का आसन है. इसके अभ्यास से मानसिक शाँति मिलती है और समर्पण का भाव आता है.

शैथिल्य आसन शारीरिक तनाव को कम करता है और तंत्रिका तंत्र का संतुलन बेहतर बनाता है.

दोहरा कम्बल बिछाकर बैठें. दोनों पैर सामने की ओर फैलाकर रखें. पैर मिलाकर रखें. शरीर को सीधा और तनावमुक्त रखें.

पहले दाएँ पैर को घुटने से मोडें और दाएँ पैर के तलवे को बाएँ पैर की जाँघ के साथ अंदर की ओर मिलाकर रखें. अब बाएँ पैर के घुटने को बाहर की ओर अर्थात् बाएँ ओर से इस प्रकार मोडें कि बाएँ पैर की एडी बाएँ नितम्ब को स्पर्श करे.

अपने शरीर को दाएँ ओर मोडिए और दोनों हाथों को दाएँ घुटने पर रखिए. साँस भरते हुए अपनी बाजू को सिर के ऊपर लाएँ, बाजू सीधा रखिए और साँस छोडते हुए बाजू और शरीर को दाएँ घुटने की सीध में आगे झुकाएं.

दोनों हाथों को जमीन पर टिका दें और माथे को भी ज़मीन से लगाने का प्रयास करें. इस स्थिति में कुछ देर विश्राम करें. साँस को सामान्य कर लीजिए. इसी प्रकार वापस आने के लिए बाजू को सीधा कर लीजिए. बाजू और शरीर को एक साथ एक ही सीध में साँस भरते हुए प्रारंभिक स्थिति में वापस आ जाएँ.

तत्पश्चात साँस छोड़ते हुए दोनों बाजू को दाएँ घुटने की सीध में नीचे लाएंगे और दोनों हाथों को फिर से दाएँ घुटने पर टिका दें. इस प्रकार 2-3 बार दाएँ पैर को मोडकर शैथिल्य आसन का अभ्यास करें. फिर पैरों की स्थिति को बदलकर यानी बाएँ घुटने को मोडकर भी 2-3 बारइस आसन को दोहराएं.

लाभ

इस आसन से रीढ और पीठ की माँसपेशियों में हल्का खिंचाव आता है, नियमित अभ्यास से वे शिथिल होती हैं और उनकी शक्ति भी बढती है. जाँघ की पेशियाँ भी ढीली होती हैं, कूल्हे के जोड में भी शिथिलता आती है. इस स्थान की अतिरिक्त चर्बी भी घटती है. शैथिल्य आसन शारीरिक तनाव को कम करता है और तंत्रिका तंत्र का संतुलन बेहतर बनाता है. जिन्हें कमर, पीठ या रीढ में दर्द हो, उन्हें इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.

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