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सोयाबीन रोगियों के लिए फ़ायदेमंद

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सोयाबीन के सेवन से दिल का दौरा पड़ चुके मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है
एक शोध के अनुसार सोयाबीन में पाए जाने वाले एक रसायनिक पदार्थ का सेवन करने से ऐसे मरीज़ो को फ़ायदा हो सकता है जिन्हें दिल का दौरा पड़ चुका है.

हाँगकाँग विश्वविद्यालय की टीम का कहना है कि सोयाबीन में पाए जाने वाले आइसोफ़लेवोन नामक रसायनिक पदार्थ कॉलेस्ट्रॉल से लड़ने वाली स्टेटिन के समकक्ष है.

यूरोपीय हृदय पत्रिका के शोध के अनुसार आइसोफ़लेवोन धमनियों में ख़ून के प्रवाह को बेहतर करने में मदद करता है.

कैंसर से बचता है

पिछले अध्ययनों में संभावना व्यक्त की गई था कि सोयाबीन का सेवन छाती और प्रोस्टेट कैंसर से बचने मे मदद करता है और कॉलेस्ट्रॉल भी कम करता है.

सोयाबिन में पाया जाने वाला आइसोफ़लेवोन हृदय की बीमारी के ख़तरे को कम करता है और उस कोशिका को बढ़ने से रोकता है जो धमनियों में ख़ून के बहाव में रूकावट पैदा करती है.

शोधकर्ताओं ने ताज़ा परीक्षण में 102 मरीज़ों को शामिल किया और शामिल किए गए सभी लोगों को ख़ून का थक्का जमने के कारण दिल का दौरा पड़ चुका था और वे हृदय की बीमारी से ग्रसित थे.

शोधकर्ताओं ने इन मरीज़ों को दो समूहों में बाँटा. एक समूह को आइसोफ़लेवोन जबकि दूसरे को पलेसेबो बारह सप्ताहों तक दिया.

शोधकताओं ने पाया कि जिन मरीज़ों ने आइसोफ़लेवोन का सेवन किया था उनकी हालत में बेहतरी देखी गई.

शोधकर्ता प्रोफ़ेसर हंग फेट सी का कहना था, "शोध इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि आइसोफ़लेवोन इनडोथेलियल की ख़राबी को ख़त्म करता है."

और अध्ययन की ज़रूरत

हालाँकि उनका कहना था कि अभी यह जल्दबाज़ी होगी के मरीज़ो को आइसोफ़लेवोन के सेवन करने की सलाह दी जाए.

जिनके खाने में आइसोफ़लेवोन की मात्रा ज़्यादा होगी उन लोगों में दिल का दौरा पड़ने के ख़तरे कम होंगे.

लेकिन उनका कहना था, "जिनके खाने में आइसोफ़लेवोन की मात्रा ज़्यादा होगी उन लोगों में दिल का दौरा पड़ने के ख़तरे कम होंगे."

ग़ौरतलब है कि आइसोफ़लेवोन फ़ाइटोइस्ट्रोजीन के अंतर्गत आता है जो प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ओएस्ट्रोजन की नक़ल करता. ओएस्ट्रोजन हृदय की बीमारी के ख़तरे से रक्षा करता है.

द स्ट्रोक ऐसोसियेशन के डाक्टर पेटर कोलेमन का कहना है, "शोध से जो पता चल रहा है वो बड़ा महत्वपूर्ण और दिलचसप है कि आइसोफ़लेवोन के सेवन से दिल का दौरा पड़ चुके मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है."

उनका कहना था कि अभी ये शोध बहत कम लोगों पर किया गया है और इस सिलसिले में और अध्ययन की ज़रूरत है.

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