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महाप्रयोग में भारत की अहम भूमिका

By वंदना
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सर्न के इस प्रयोग को मानव इतिहास का सबसे बड़ा प्रयोग बताया जा रहा है
बुधवार को वैज्ञानिकों ने दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग शुरु कर दिया है, कणों को 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में सफलतापूर्वक छोड़ा गया है.

इस महाप्रयोग में दुनिया भर के दस हज़ार वैज्ञानिकों की प्रतिभाओं का योगदान रहा है और भारत ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है.

इसका अंदाज़ा शायद इसी बात से चल जाएगा कि सर्न में घुसते ही सामने आपको नटराज की भव्य मूर्ति देखने को मिलेगी.

इस पूरे प्रयोग में करीब 140 से 150 भारतीय वैज्ञानिक किसी न किसी रुप से जुड़े रहे हैं. भारत की डॉक्टर अर्चना शर्मा एकमात्र भारतीय वैज्ञानिक हैं जो सर्न की स्टाफ़ वैज्ञानिक हैं.

बुधवार को प्रयोग के समय डॉक्टर अर्चना भी वहीं थी. सर्न यानी यूरोपीयन सेंटर फ़ॉर न्यूक्लियर रिसर्च में मौजूद डॉक्टर अर्चना ने बताया, "उस समय बहुत उत्साह था, सुबह थोड़ी घबराहट भी थी. कई लोगों की आशाओं की विपरीत 55 मिनट के अंदर जब प्रोटोन ने पूरा एक चक्र लगा लिया तो समझिए कि धमाका हो गया, हॉल तालियों से गूँजने लगा."

इस प्रयोग में कई महत्वपूर्ण उपकरण ऐसे हैं जिन्हें भारतीय संस्थानों ने बनाया है.

कई महत्वपूर्ण उपकरण ऐसे हैं जिन्हें भारतीय संस्थानों ने बनाया है, इंदौर के सेंटर ऑफ़ एडवांस टेकनॉलिज़ी ने इस प्रयोग के लिए चुंबक बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने विशालकाय कंप्यूटिंग प्रणाली बनाने में भी मदद की है. भारत सरकार ने लभगभ ढाई करोड़ रुपए प्रयोग पर खर्च किए हैं

डॉक्टर अर्चना शर्मा के मुताबिक इंदौर के सेंटर ऑफ़ एडवांस टेकनॉलिज़ी ने इस प्रयोग के लिए चुंबक बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने एक्सलरेटर तो बनाए ही हैं साथ ही विशालकाय कंप्यूटिंग प्रणाली बनाने में भी मदद की है जिसे एक नए नेटवर्क से पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के कंप्यूटरों से जोड़ा गया है.

प्रयोग में इस्तेमाल हो रहा इलेक्ट्रॉनिक चिप (मानस चिप) कोलकाता में विकसित होकर यहाँ आया है.

इसके अलावा भारत का टाटा संस्थान, पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत कई संस्थान प्रयोग से जुड़े रहे हैं.

भारत का योगदान

डॉक्टर अर्चना शर्मा सर्न से जुड़ी हुई हैं

इस प्रयोग में भारतीय वैज्ञानिकों ने तो अपना लोहा मनवाया ही है, सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में भी योगदान दिया है लेकिन भारत सरकार ने बड़ी धनराशि भी इसमें लगाई है.

डाक्टर अर्चना के मुताबिक भारत सरकार ने लभगभ ढाई करोड़ रुपए प्रयोग पर खर्च किए हैं. उम्मीद जताई है कि जब प्रयोग के नतीजों का अध्ययन होगा तो दूसरे देशों समेत भारत को इसके अध्ययन से फ़ायदा मिलेगा.

इस महाप्रयोग से भारत का नाता सिर्फ़ तकनीक, वित्तीय और वैज्ञानिक स्तर पर ही नहीं है. सर्न में जो चंद धार्मिक प्रतिमाएँ लगी हैं उमसें एक नटराज की मूर्ति है.

भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग ने नटराज की एक मूर्ति सर्न को तोहफ़े में दी थी और उसका बड़ा सांकेतिक महत्व है.

डॉक्टर अर्चना बताती हैं, "दरअसल नटराज की मूर्ति में आलौकिक नृत्य या कॉस्मिक डांस दिखाया गया है और हम लोग भी कॉस्मिक ऊर्जा का ही अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं. ज़ाहिर ही ये मूर्ति प्रयोग के लिए बहुत प्रासंगिक है."

डॉक्टर अर्चना ये तो मानती हैं कि इस मूर्ति का वहाँ होना किसी भी भारतीय के लिए गर्व की बात है. लेकिन वे इसे विज्ञान को धर्म से जोड़ने की कोशिश नहीं मानतीं. उनके लिए ये मात्र अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक प्रतीक मात्र है.

वाकई ये प्रयोग एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय योजना है जिसमें 70-80 देशों के संसाधन, पैसा और हुनर लगा हुआ है और मकसद सबका एक ही है.

नतीजे क्या और कब तक निकलेंगे ठीक से कोई नहीं जानता, रास्ता आसान नहीं है. लेकिन जैसे डॉक्टर अर्चना कहती हैं कि नामुमकिन कुछ भी नहीं...

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