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आज होगा दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग

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सतह से देखने पर अनुमान ही नहीं होता कि इतनी बड़ी परियोजना ज़मीन के भीतर चल रही है
बुधवार को वैज्ञानिक दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग करने जा रहे हैं. इस प्रयोग का उद्देश्य है ब्रह्मांड के निर्माण की परिस्थितियों को समझना.इस प्रयोग का उद्देश्य है ब्रह्मांड के निर्माण की परिस्थितियों को समझना. इसके लिए स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सीमा पर अरबों डॉलर लगाकर पिछले 20 साल में दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला स्थापित की गई है.

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस प्रयोग से मिलने वाले आंकड़ों का अध्ययन भी आगे बरसों बरस चलता रहेगा. इस प्रयोग को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में कहा गया कि इससे ब्लैक होल का निर्माण होगा और इससे पृथ्वी को ख़तरा हो सकता है लेकिन इससे जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह प्रयोग पूरी तरह से सुरक्षित है और ऐसा कुछ भी होने के आसार नहीं हैं.

अपने तरह के अनूठे इस प्रयोग पर पूरी दुनिया की नज़र लगी हुई है.

प्रयोगशाला

इस प्रयोग के लिए जो ढाँचा खड़ा किया गया है उसे प्रयोगशाला कहने से उसके आकार का अंदाज़ा लगाना कठिन है. इन्हीं पाइपलाइनों से गुज़रेंगे प्रोटॉन इसे तैयार किया है परमाणु मामलों पर शोध करने वाली यूरोपीय संस्था सर्न ने. स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सीमा पर जहाँ इसे स्थापित किया गया है, सतह को देखकर कुछ अनुमान नहीं लगता क्योंकि यह ज़मीन से 175 मीटर नीचे स्थित है.

इसमें 27 किलोमीटर लंबी एक सुरंग तैयार की गई है जिसमें विशालकाय पाइपलाइन बिछाई गई है. सैकड़ों मीटर लंबे केबल लगे हुए हैं. इसमें एक हज़ार से अधिक बेलनाकार चुंबकों को जोड़ा गया है. यह पूरा ढाँचा तीन अलग-अलग आकार के गोलों में बनाया गया है.

इसमें बीच में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) लगाए गए हैं जिसके अलग-अलग हिस्से प्रयोग के अलग-अलग परिणामों का विश्लेषण करेंगे. प्रयोग के दौरान घट रही भौतिकीय घटनाओं को दर्ज करने के लिए विशालकाय कंप्यूटर ढाँचा तैयार किया गया है और एक नए नेटवर्क से इसे पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के कंप्यूटरों से जोड़ा गया है.

दुनिया भर के कोई सौ देशों के हज़ारों वैज्ञानिक इस प्रयोग में हिस्सा ले रहे हैं.

कैसे होगा प्रयोग

इस प्रयोग के लिए प्रोटॉनों को इस गोलाकार सुरंगों में दो विपरित दिशाओं से भेजा जाएगा. इनकी गति प्रकाश की गति के लगभग बराबर होगी और जैसा कि वैज्ञानिक बता रहे हैं प्रोटान एक सेकेंड में 11,000 से भी अधिक परिक्रमा पूरी करेंगे.

इसी प्रक्रिया के दौरान प्रोटॉन कुछ विशेष स्थानों पर आपस में टकराएँगे. अनुमान लगाया गया है कि प्रोटॉनों के टकराने की 60 करोड़ से भी ज़्यादा घटनाएँ होंगी और इन्हीं घटनाओं को एलएचसी के विभिन्न हिस्सों में दर्ज किया जाएगा.

द्रव्य और अद्रव्य के बीच रिश्तों की पड़ताल करना चाहते हैं वैज्ञानिक वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दौरान प्रति सेकेंड सौ मेगाबाइट से भी ज़्यादा आँकड़े एकत्रित किए जा सकेंगे.

उनका कहना है कि प्रोटॉनों के टकराने की घटना सबसे दिसचस्प घटना होगी और इसी से ब्रह्मांड के बनने के रहस्य खुलने का अनुमान है. वैज्ञानिक कहते हैं कि इस प्रयोग से यह रहस्य खुलने का अनुमान है कि आख़िर द्रव्य क्या है? और उनमें द्रव्यमान कहाँ से आता है?

लीवरपूल यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री डॉ तारा शियर्स का कहना है, "हम द्रव्य को उस तरह से देख सकेंगे जैसा पहले कभी नहीं देखा गया." उनका कहना है, "वह एक सेकेंड का एक अरबवाँ हिस्सा रहा होगा जब ब्रह्मांड का निर्माण हुआ होगा और संभावना है कि हम उस क्षण को देख सकेंगे."

लंबी तैयारी

इस लार्ज हैड्रन कोलाइड की परिकल्पना 1980 में की गई थी और वर्ष 1996 में इस परियोजना को मंज़ूरी मिली. तब इसकी लागत 2.6 अरब यूरो होने का अनुमान लगाया गया था. बाद में पता चला कि सर्न ने ग़लत अनुमान लगाया था और तब एलएचसी को पूरा करने के लिए बैंकों से कर्ज़ भी लेना पड़ा.

परियोजना को पूरा करने में शुरुआती अनुमान की तुलना में चार गुना अधिक पैसा लग गया. इसके निर्माण के दौरान उपकरणों ने धोखा दिया, निर्माण की समस्याएँ सामने आईं और नतीजा यह हुआ कि पूरी परियोजना में दो साल की देरी हो गई.

सर्न में कार्यरत अकेली भारतीय वैज्ञानिक अर्चना शर्मा ने बीबीसी को बताया कि इस परियोजना में मूल रूप से यूरोपीय संघ के 20 देश और छह ग़ैर सदस्य देश मिलकर काम कर रहे हैं.

वैसे इस पूरे प्रयोग से कोई सौ देशों के हज़ारों वैज्ञानिक जुड़े हुए हैं. इस प्रयोग के बारे में वे कहती हैं कि इनके परिणामों से क्या-क्या निकलेगा यह बताना कठिन है क्योंकि बहुत से नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता.

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