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मेघा मेघा रे, स्टेडियम मत जा रे

By आकाश सोनी
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बादलों को कहीं और बरसने पर मजबूर किया गया, स्टेडियम पर एक बूंद भी नहीं बरसा
बादलों को कहीं और बरसने पर मजबूर किया गया, स्टेडियम पर एक बूंद भी नहीं बरसा
बादल
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चीन ने ओलंपिक स्टेडियम पर होने वाली बारिश को टालने के लिए विज्ञान का सहारा लिया और बादलों को कहीं और बरसने पर मजबूर किया.

अगर इस कार्यक्रम के लिए बड़ी तैयारी की थी तो चीन के अधिकारियों ने ये भी तय कर लिया था कि उस दिन वो 'बर्ड्स नेस्ट स्टेडियम' पर बारिश नहीं होने देंगे.

बीजिंग के म्युनिसिपल मौसम विभाग के प्रमुख गुओ हू ने एक बयान जारी करके कहा है, "हमने 21 जगहों से 1104 रॉकेट, शाम चार बजे और रात 11 बजकर 39 मिनट के बीच छोड़े. इन रॉकेटों के ज़रिए हमने बादलों स्टेडियम तक पहुँचने से पहले ही बरसा दिया."

इसका मतलब ये हुआ कि जिस समय ओलंपिक स्टेडियम सैकड़ों नगाड़ों की थाप से गूंज रहा था और उसके बाद 33,866 पटाखे अपनी छटा आसमान में बिखेर रहे थे, इन्हीं सबके शोर के बीच एक हज़ार से ज़्यादा रॉकेट बारिश वाले बादलों से निबटने में लगे थे.

हमने 21 जगहों से 1104 रॉकेट, शाम चार बजे और रात 11 बजकर 39 मिनट के बीच छोड़े. इन रॉकेटों के ज़रिए हमने बादलों स्टेडियम तक पहुँचने से पहले ही बरसा दिया

हॉन्गकॉन्ग की सिटी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर जॉनी चैन ने बीबीसी से कहा, "ये रॉकेट आसमान में गए और उन्होंने बादलों में लाखों छोटे छोटे कण छोड़े. ये कण पानी की छोटी बूंदों को आकर्षित करते हैं और ऐसी कई छोटी बूंदें मिलकर जब बड़ी हो जाती हैं तो वो बारिश बनकर गिरने लगती है. चीन ने बादलों को स्टेडियम तक पहुँचने से पहले ही बरसने पर मजबूर कर दिया."

लेकिन क्या ये टेक्नॉलोजी सिर्फ़ चीन के पास है? लंबे समय से ये सवाल उठते रहे हैं कि क्या अमरीका शटल को लॉन्च करते समय और रूस मई दिवस की परेड के दिन साफ़ आसमान के लिए ये तरीका अपनाते रहे हैं, लेकिन इसकी कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई.

चीन के मौसम विभाग के वरिष्ठ सदस्य प्रोफ़ेसर जॉनी चैंग कहते हैं, "अमरीका और रूस 50 और 60 के दशक में इस टेक्नॉलोजी पर काम कर चुके हैं. लेकिन दिक्कत ये है कि कोई भी दो बादल एक जैसे नहीं होते इसीलिए ये तरीका भी हमेशा कारगर नहीं होता."

भारत में शोध

भारत में भी बादलों से बारिश कराने के इन तरीकों पर शोध किए जा रहे हैं और भारत इस शोध में बड़ा पैसा लगा रहा है. जो संस्थान इस पर शोध कर रहा है वो है पूना स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मिट्रियलॉजी यानी आईआईटीएम.

भारत में बड़े पैमाने पर शोध हो रहे हैं

आईआईटीएम के वैज्ञानिक डॉक्टर महेश कुमार कहते हैं कि चीन को सौ किलोमीटर दूर से ही पता चल गया होगा कि ये बादल स्टेडियम पर बारिश कर सकते हैं.

डॉक्टर कुमार कहते हैं, "आमतौर पर डॉपलर रेडार आपको बता देता है कि किस गति से ये बादल किस ओर जा रहे हैं. ये देखने के बाद चीन ने सिल्वर आयोडाइड या ऐसे किसी रसायन से भरे रॉकेट उन बादलों की ओर मारे होंगे. ये रॉकेट बादल के अंदर जब फटते हैं तो लाखों छोटे-छोटे कण बादल में फँस जाते हैं. ये कण पानी की बेहद छोटी बूंदों को सोखते हैं और ऐसी कई छोटी बूंदें जब मिलकर बड़ी हो जाती हैं तो बारिश हो जाती है."

वे कहते हैं, "लेकिन मेरी राय में चीन ने ये नहीं किया. इसको कहते हैं क्लाउड सीडिंग. चीन ने किया है क्लाउड डिसीपेशन, उन्होंने बादल में ज़रूरत से ज़्यादा कण डाले जिससे कि बादल को पूरी तरह ख़त्म ही कर दिया."

डॉक्टर महेश कुमार कहते हैं कि इस समय मानसून के समय आँध्र प्रदेश के कुछ इलाक़ों में बारिश कराने के लिए क्लाउड सीडिंग के प्रयोग किये गए हैं. हमारा संस्थान उसमें मदद कर रहा है. इस तरह अपने प्रदेश को सूखे से बचाने के लिए महाराष्ट्र और कर्नाटक भी पहले बारिश करा चुके हैं.

लेकिन यह तरीक़ा काफ़ी विवादास्पद और ख़तरनाक हो सकता है. क्या इन रॉकेटों के इस्तेमाल से आप किसी पड़ोसी देश के बादल और उनकी बारिश नहीं चुरा सकते?

चीन के वैज्ञानिक जॉनी चैन कहते हैं, "हाँ, इसके बारे में पहले बात हो चुकी है और शायद इसीलिए कुछ देशों ने इस पर शोध बंद कर दिया था. आप किसी देश से उसकी बारिश चुराकर बाक़ायदा युद्ध जैसी स्थिति तक पैदा कर सकते हैं."

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