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क्रशर में पिस रही हैं धरोहर

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राजमहल की पहाड़ियों में जीवाश्म बिखरे पड़े हैं
इसका यह नाम इसे इसलिए दिया गया क्योंकि यह सड़क साहेबगंज के मंद्रो प्रखंड से उस तारा गाँव को जोड़ती है जहाँ जुरासिक काल के जीवाश्म ज़मीन की सतह पर यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े हुए हैं.

जीवाश्म को उनकी प्राकृतिक अवस्था में देखने की ललक मुझे यहाँ तक खींच लाई और फिर मैं उस गाँव में जा पहुँचा जहाँ प्रकृति का यह अनमोल ख़ज़ाना अरबों वर्षों से धरती की गोद में संरक्षित है.

साहेबगंज के मंद्रो प्रखंड मुख्यालय से आधा किलोमीटर दक्षिण की ओर बढ़ते ही तारा गाँव का रास्ता मुड़ता है. इस इलाक़े में कई एक भूगर्भशास्त्रियों ने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शोध कार्यों में गुज़ारा है और यहाँ पर किए गए काम की वजह से उन्हें पूरे विश्व में ख्याति मिली है.

साहेबगंज और पाकुड़ ज़िलों में फैली राजमहल पहाड़ियों की ख़ूबसूरत शृंखलाओं ने एक ऐसे काल की विरासत को अपने में संजोएँ रखा है जो काल 20 करोड़ वर्षों पहले इस धरती से गुज़रा है.

मुश्किल

आज इस इलाक़े में 20 करोड़ वर्षों पहले जुरासिक, ट्राईआसिक और लोअर क्रिटेसियस काल के जीवाश्म बड़े पैमाने पर मिलते हैं. यह जीवाश्म पेड़ पौधों के हैं.

सरकार ने पूरे इलाक़े में पत्थर के खनन की लीज़ दे दी है और सैकड़ों क्रशर मशीनों में अब इन जीवाश्म भरे पत्थरों को तोड़-तोड़ कर छोटे-छोटे चिप्स बनाए जा रहे हैं जिनका इस्तेमाल सड़क बनाने में किया जा रहा है

मगर मेरे पैरों तले की ज़मीन तब खिसक गई जब मैंने देखा की फॉसिल रोड जिन पत्थरों से बन रही है असल में वो पेड़-पौधों के ही जीवाश्म हैं जो इस पूरे इलाक़े में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.

मेरे क़दम रुक गए और मैंने स्थानीय लोगों से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है तो सबका एक ही जवाब था- हम क्या कर सकते हैं.

मंद्रो के मोहम्मद शाहजहाँ कहते हैं, "सरकार ने पूरे इलाक़े में पत्थर के खनन की लीज़ दे दी है और सैकड़ों क्रशर मशीनों में अब इन जीवाश्म भरे पत्थरों को तोड़-तोड़ कर छोटे-छोटे चिप्स बनाए जा रहे हैं जिनका इस्तेमाल सड़क बनाने में किया जा रहा है."

न सिर्फ़ साहेबगंज, अब इन जीवाश्म से बनी गिट्टियों की आपूर्ति निकटवर्ती राज्य बिहार में भी सड़क के निर्माण के लिए की जा रही हैं.

खनन का पट्टा दिए जाने के बाद से राजमहल पहाडियों की शृंखलाएँ अब गंजी होती जा रही हैं क्योंकि यहाँ पहाडियों में डायनामाइट लगा कर विस्फोट किए जा रहे हैं और उनमें से पत्थरों को क्रशर मशीनों में तोड़ा जा रहा है.

नदी, नाले, तालाबों और कुओं के निर्माण में जिन पत्थरों का इस्तेमाल किया जा रहा है वो जीवाश्म युक्त हैं. अँधाधुंध चल रहे पत्थरों के खनन में महत्वपूर्ण धरोहर रेत में तब्दील होती जा रही हैं.

कारण

मैंने मंद्रो प्रखंड में तैनात वन विभाग के अधिकारी पूजन सिंह से पूछा कि आख़िर माज़रा क्या है, तो उन्होंने कहा, "इस पूरे इलाक़े में जीवाश्म ही जीवाश्म भरे पड़े हैं. जिधर देखो उधर जीवाश्म. अब खनन का पट्टा सरकार ने दिया है. लोग खनन कर रहे हैं. उन्हें तो पत्थर चाहिए. वो जीवाश्म हैं तो क्या. उन्हें इससे क्या फ़र्क पड़ता है. इसमें कोई शक नहीं कि जीवाश्म की गिट्टियाँ बन रहीं हैं और उन गिट्टियों से सड़क."

साहेबगंज में बिखरे पड़े हैं जीवाश्म

पूजन सिंह की बात से आहत मैंने साहेबगंज कॉलेज में भूगर्भ विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष सैयद रज़ा इमाम रिज़वी से संपर्क किया तो उन्होंने राजमहल पहाडियों की शृंखलाएँ की अहमियत बताई.

उन्होंने बताया, "आज से 20 करोड़ वर्ष पहले, कार्बोनिफेरोउस और पेर्मियन काल में यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, अंटार्कटिक, एशिया को मिलाकर सुपर महाद्वीप हुआ करता था जिसे भूगर्भ विज्ञान की भाषा में गोंडवाना लैंड के नाम से जाना जाता है. उस समय इस जगह का वातावरण नम और गरम था ."

उन्होंने कहा, "तराई आस्सिक काल में पर्यावरण में बदलाव आने लगे और ज्वालामुखी उदगार हुए. सभी महाद्वीप एक दूसरे से अलग हो गए. ज्वालामुखी के लावे ने पेड़-पौधों को ढँक दिया. ज़मीन ने इन पेड़-पौधों को परिरक्षित अवस्था में अरबों वर्षों तक रखा. वो परिरक्षित पेड़-पौधे आज जीवाश्म की शक्ल में हमें मिल रहे हैं."

रिज़वी और उनकी तरह अन्य भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि राजमहल पहाड़ियों की शृंखलाएँ न सिर्फ़ भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि पूरे विश्व में इसलिए इसकी महत्ता है क्योंकि ऊपरी गोंडवाना काल के जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के अवशेष यहाँ से मिलते रहे हैं.

दुर्गम इलाक़ा

भूगर्भ शास्त्रियों का मानना है कि 2600 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाक़े में बहुत सारी ऐसी जगहें हैं जहाँ आज तक पहुँचा नहीं जा सका है क्योंकि यह इलाक़े दुर्गम हैं.

कई साल पहले कुछ वैज्ञानिक यहाँ शोध करते हुए आए थे. उन्होंने हमें बताया कि यहाँ यह पेड़ जैसे दिखने वाले पत्थर बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसलिए हम इनकी रक्षा करते हैं. मगर कितने दिनों तक. पहले सुना था पार्क बनेगा. पता नहीं कब बनेगा. लोगों ने कहा कि हमारी ज़मीन पर जीवाश्म हैं इसलिए हमें पार्क बनने से फ़ायदा होगा. अब हम थक गए हैं. किस-किससे झगड़ा करें. लोग यहाँ से पत्थर ज़बरदस्ती ले जाते हैं

कुछ भूगर्भ शास्त्रियों का दावा है कि अगर इन इलाक़ों में नियोजित तरीक़े से खुदाई की जाए तो यहाँ पर जुरासिक काल के जीवों के भी जीवाश्म मिल सकते हैं. डायनासोर के भी. मगर उसके लिए ज़रूरी होगा कि यहाँ पर चल रहे पत्थर के खनन को फ़ौरन रोका जाए और इस इलाक़े को संरक्षित किया जाए.

जब झारखंड का निर्माण हुआ था तो उस समय एक योजना बनी थी कि राजमहल पहाडियों की शृंखलाओं के बीच एक जुरासिक पार्क बनाया जाए. मगर बात आई-गई हो गई. तारा गाँव की कुछ आदिम पहाड़िया जनजाति के लोग पीढी दर पीढी इन जीवाश्म की सुरक्षा करते आ रहे हैं.

तारा गाँव के मुखिया गंगू पहाड़िया बताते हैं, "कई साल पहले कुछ वैज्ञानिक यहाँ शोध करते हुए आए थे. उन्होंने हमें बताया कि यहाँ यह पेड़ जैसे दिखने वाले पत्थर बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसलिए हम इनकी रक्षा करते हैं. मगर कितने दिनों तक. पहले सुना था पार्क बनेगा. पता नहीं कब बनेगा. लोगों ने कहा कि हमारी ज़मीन पर जीवाश्म हैं इसलिए हमें पार्क बनने से फ़ायदा होगा. अब हम थक गए हैं. किस-किससे झगड़ा करें. लोग यहाँ से पत्थर ज़बरदस्ती ले जाते हैं. "

आश्वासन

इस बारे में जब मैंने झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का ध्यान आकर्षित किया तो उन्होंने कहा कि वे जल्द ही इन जीवाश्म को संरक्षित करने के लिए एक योजना बनाएँगे.

जीवाश्म को क्रशर से तोड़ा जा रहा है

मुख्यमंत्री कोड़ा कहते हैं, "हमारे लिए यह गर्व की बात है कि यहाँ इतने पुराने जीवाश्म हैं. हम वहाँ पार्क बनाने की बात सोच रहे हैं."

किसी को पता नहीं कि यहाँ जुरासिक पार्क बनेगा भी या नहीं. बना तो पता नहीं कब तक बनेगा. राजमहल की पहाडियों का इस तरह फ़ना होना एक ऐसा गुनाह है जो क़ानून की नज़र से बच भी जाए लेकिन आने वाली नस्लें शायद इस युग के लोगों को कभी माफ़ न कर पाएँ.

जर्मनी में भी इसी काल के जीवाश्म 65 किलोमीटर के इलाक़े में पाए जाते हैं. वहाँ की सरकार ने उस इलाक़े को संरक्षित कर रखा है और वर्ष 2002 में यूनेस्को ने इस इलाक़े को विश्व धरोहर स्थल घोषित कर दिया.

भारत के पहले और सबसे प्रसिद्ध पेलियो बोटानिस्ट बीरबल साहनी ने राजमहल फ़ॉसिल्स का अध्ययन किया था लेकिन उनके नाम का संग्रहालय खुला झारखंड में नहीं लखनऊ में.

भारत सरकार ने उनके शोध पर आधारित राजमहल फ़ॉसिल्स के पेड़-पौधों के डाक टिकिट भी जारी कर दिए लेकिन जीवाश्मों को छोड़ दिया है सड़क बनाने वाले ठेकेदारों के हवाले.

भारत ही नहीं दुनिया के अतीत की ये अनमोल धरोहर सड़क बनाने के क्रशर के नीचे टुकड़े-टुकड़े हो रही है.

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