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2018 में बिहार की राजनीति, तेजस्वी के 'जोर' से कुशवाहा के 'तोड़' तक

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दिल्ली। 2018 में बिहार की राजनीति में कई घटनाएं हुईं जिसने यहां महागठबंधन और एनडीए के स्वरूप को बदला। एक तरफ राजद में तेजस्वी तेजी से और मजबूती से उभरते चले गए और दूसरी तरफ इससे 2019 लोकसभा चुनाव को देखते हुए महागठबंधन की राजनीति को भी सहारा मिला। उधर, एनडीए से मांझी और कुशवाहा निकलकर महागठबंधन में आ गए। प्रशांत किशोर जदयू से जुड़कर सक्रिय राजनीति में कूद पड़े। कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जो नीतीश सरकार के सुशासन के दावे पर दाग लगा गईं। आइए एक नजर डालते हैं 2018 में बिहार की अहम राजनीतिक घटनाओं पर-

चारा घोटाले में लालू को सजा

चारा घोटाले में लालू को सजा

जनवरी 2018 की शुरुआत ही बिहार में एक बड़ी घटना से हुई जिसको लेकर वहां राजनीतिक हलचल होने लगी। चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को सीबीआई कोर्ट ने साढ़े तीन साल की सजा सुना दी। इस मामले में पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्र समेत 7 को कोर्ट ने बरी कर दिया। लालू को जेल की सजा होने के बाद सबसे पहले यही सवाल खड़ा हो गया कि अब आरजेडी को कौन संभालेगा, कहीं पार्टी में टूट-फूट न हो जाय। लेकिन राजद की कमान छोटे बेटे तेजस्वी ने बखूबी संभाल लिया। 2018 की शुरुआत तेजस्वी की राजनीति से हुई। लालू के जेल जाने से नीतीश कुमार को राहत मिली क्योंकि भाजपा के साथ फिर मिल जाने से लालू लगातार नीतीश पर हमलावर हो रहे थे।

उपचुनावों में आरजेडी की जीत और तेजस्वी का उत्थान

उपचुनावों में आरजेडी की जीत और तेजस्वी का उत्थान

मार्च में बिहार में हुए उपचुनाव में एक लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर जीत हासिल करने के बाद राजद में तेजस्वी के नेतृत्व पर मुहर लग गई। लालू के जेल जाने के बाद कमजोर पड़ी राजद के लिए यह जीत बहुत अहम थी। इससे तेजस्वी पार्टी में स्थापित हुए और वो बिहार की राजनीति में जगह बनाने की कवायद में सफल रहे।

जीतनराम मांझी ने एनडीए से नाता तोड़ा

जीतनराम मांझी ने एनडीए से नाता तोड़ा

जनवरी में लालू के जेल जाने के बाद महागठबंधन बनाने की राजनीति को ग्रहण लगता दिखा था लेकिन यह जल्दी ही छंट गया। बिहार में कांग्रेस को राजद का सहारा था। जीतनराम मांझी भी एनडीए का साथ छोड़ महागठबंधन में शामिल हो गए। फरवरी के आखिर में हुई यह घटना अहम थी। दिसंबर 2018 में महागठबंधन में अपनी सीटें सुनिश्चित करने के लिए जीतनराम संघर्ष करते दिखे। हाल में उन्होंने एनडीए को नागराज और महागठबंधन को सांपराज कहकर सबको चौंका दिया था।

भागलपुर हिंसा: नीतीश के सामने गठबंधन धर्मसंकट

भागलपुर हिंसा: नीतीश के सामने गठबंधन धर्मसंकट

भारतीय नववर्ष की पूर्व संध्या पर भागलपुर के नाथनगर में निकले जुलूस का नेतृत्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत चौबे कर रहे थे। इस जुलूस के साथ दूसरे समुदाय की हिंसक झड़प हुई जिसमें कई लोग घायल हो गए। इस उपद्रव केस में अर्जित की गिरफ्तारी न होने पर विपक्ष नीतीश कुमार पर हमलावर हो गया। अर्जित ने कानून-व्यवस्था को धता बताते हुए एफआईआर को रद्दी का टुकड़ा कहकर नीतीश सरकार को चुनौती दे दी। गिरफ्तारी में देरी से नीतीश की काफी आलोचना हुई और यह कहा गया कि वो भाजपा के साथ गठबंधन की वजह से ऐसा नहीं कर पा रहे थे। तेजस्वी यादव ने कहा कि नीतीश कुमार कमजोर हो गए हैं और सरकार पर से उनका कंट्रोल खत्म हो चुका है, नागपुर से सारे फैसले हो रहे हैं। काफी राजनीतिक बवाल होने के बाद आखिरकार अर्जित को सरेंडर करना पड़ा।

तेजस्वी-तेजप्रताप, दो भाइयों की राजनीति

तेजस्वी-तेजप्रताप, दो भाइयों की राजनीति

लालू के जेल जाने के बाद जब राजद में तेजस्वी यादव का कद बढ़ने लगा तो पार्टी में बड़े भाई तेजप्रताप यादव से मनमुटाव की खबरें भी सामने आने लगीं। जून में अचानक तेजप्रताप ने जब हस्तिनापुर की गद्दी तेजस्वी को सौंपने और खुद द्वारका जाने की बात ट्विटर पर लिखी तो यह मनमुटाव चर्चा में आ गया। तेजप्रताप का कहना था कि पार्टी में उनकी बातों को नजरअंदाज किया जा रहा है और अंदर के कुछ नेता दोनों भाइयों में फूट डालना चाहते हैं। तेजस्वी ने भी बाद में किसी भी तरह के मनमुटाव को खारिज किया। सालभर जहां तेजस्वी पार्टी का नेतृत्व करते दिखे वहीं तेजप्रताप अपनी कृष्णभक्ति, बयानों, शादी और तलाक की वजह से चर्चा में बने रहे।

उपेंद्र कुशवाहा और पासवान, एनडीए में टूट

उपेंद्र कुशवाहा और पासवान, एनडीए में टूट

बिहार में भाजपा, जदयू, लोजपा और रालोसपा के बीच सीट बंटवारे को लेकर चली तनातनी का अंजाम वही हुआ जिसका संकेत अगस्त में उपेंद्र कुशवाहा ने यादवों के दूध से खीर बनाने की बात कहकर दिया था। दिसंबर में उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए का दामन छोड़ यूपीए का हाथ थाम लिया। महागठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा के शामिल होने पर बिहार में कांग्रेस और राजद से लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर बात चल रही है। यह बिहार की बड़ी राजनीतिक घटना रही जिसमें जदयू की 17 सीटों की जिद और रामविलास पासवान के आगे भाजपा को झुकना पड़ा और उपेंद्र कुशवाहा की आहुति देनी पड़ी। यह भाजपा के लिए बड़ा झटका है क्योंकि बिहार में पिछड़ों के वोटबैंक में यादवों के बाद कुशवाहा का ही वोटबैंक सबसे ज्यादा है। नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा कभी राजनीति में साथ थे लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में खटास आ गई। 2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए में शामिल होकर उपेंद्र कुशवाहा बिहार में तीन सीटें हासिल कर केंद्र में मंत्री बन गए थे। तब नीतीश एनडीए के साथ नहीं थे। जब बिहार में एनडीए के साथ मिलकर नीतीश फिर सत्ता में वापस आए तभी से उनके लिए मुसीबत खड़ी हो गई थी।

मुजफ्फरपुर शेल्टर कांड और नीतीश की किरकिरी

मुजफ्फरपुर शेल्टर कांड और नीतीश की किरकिरी

मुजफ्फरपुर में बेसहारा बच्चियों के साथ आश्रय गृह में चल रहे रेप और अमानवीय कामों का खुलासा हुआ तो देश सन्न रह गया। इस कांड के सामने आने के बाद नीतीश सरकार की काफी किरकिरी हुई क्योंकि आश्रय गृह चलाने के लिए समाज कल्याण मंत्रालय की तरफ से आरोपी ब्रजेश ठाकुर को लाखों रुपए दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने नीतीश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। विपक्ष ने नीतीश सरकार की काफी आलोचना की। नीतीश खुद भी बोले कि इस घटना की वजह से उनको शर्मसार होना पड़ा है। राजद ने नीतीश सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। भले ही इस मामले में मंत्री के इस्तीफे से लेकर ब्रजेश ठाकुर को जेल भेजने तक की कार्रवाई हुई लेकिन इस घटना से नीतीश सरकार के सुशासन और भाजपा के बेटी बचाओ के नारे की साख गिरी।

प्रशांत किशोर की जदयू में एंट्री

प्रशांत किशोर की जदयू में एंट्री

इस साल सितंबर में चुनावी रणनीति बनाने के लिए चर्चित प्रशांत किशोर जदयू में शामिल हो गए और उन्होंने राजनीतिक सफर की शुरुआत कर दी। 2014 लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी को ऐतिहासिक जीत दिलाने और 2015 में बिहार में महागठबंधन को जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार के बाद नंबर दो की जगह देकर जदयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में वे जदयू और एनडीए के लिए रणनीति बनाने में जुटे हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी और कन्हैया कुमार

कम्युनिस्ट पार्टी और कन्हैया कुमार

जेएनयू के चर्चित छात्र नेता कन्हैया कुमार को इस साल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राष्ट्रीय परिषद में जगह दी गई। बिहार की राजनीति में इस साल तेजस्वी के साथ कन्हैया कुमार भी युवा चेहरा बनकर उभरे हैं। सीपीआई उनको बेगूसराय से लोकसभा चुनाव लड़ाना चाहती है। फिलहाल महागठबंधन में सीटों का बंटवारा नहीं हुआ है। बताया जा रहा है कि राजद यह सीट चाहती है। अगर सबकुठ ठीक रहा तो कन्हैया कुमार 2019 में लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर चुनावी पारी खेलते दिखेंगे। सीपीआई ने ही इस साल गांधी मैदान में भाजपा हराओ देश बचाओ रैली की जिसमें विपक्षी दलों ने एकजुटता का प्रदर्शन किया।

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English summary
Year Ender 2018 important events of 2018 in Bihar Politics
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