Motivational Story: बहुत तकलीफ़ होती थी जब...आर्थिक तंगी की वजह से बेची और टोकरी, मधुरेंद्र के संघर्ष की कहानी
Struggling Story Of International Sand Artist: पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि के मौक़े पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके साथ ही सीएम नीतीश कुमार ने अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्य तिथि को राजकीय समारोह के रूप में मनाए जाने की घोषणा भी की।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अटल प्रेम को राजकीय समारोह मनाने की बात सुनकर अंतर्राष्ट्रीय सैंड आर्टिस्ट मधुरेंद्र ने भी सीएम नितीश कुमार को बधाई दी है और पीपल के हरे पत्तों पर अटल बिहारी वाजपेयी की अनोखी तस्वीर बनाकर खास तरीके से श्रद्धांजलि दी।

हर ख़ास मौके और ज्वलंत मुद्दे पर अपनी हुनर का परचम लहराने वाले सैंड आर्टिस्ट मधुरेंद्र की लोग सराहना तो काफी करते हैं, लेकिन इसके पीछे कितना दर्द और संघर्षपूर्ण सफर रहा है। यह बहुत ही कम लोग जानते हैं। वन इंडिया हिंदी से ख़ास बातचीत करते हुए बहुत ही बेबाक अंदाज़ में रेत कलाकार मधुरेंद्र ने अपने संघर्ष की कहानी बयां की है।
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मधुरेंद्र ने बताया कि बचपन से ही उनकी ज़िंदगी संघर्षों से जूझती रही है। परिवार के लोग चाहते थे कि कला वगैरह से किनारा कर कोई काम करें, जिससे कुछ कमाई हो सके। लेकिन कला के प्रति दीवानगी कम नहीं हुई, विभिन्न चीज़ों पर कलाकृति करते रहा। आर्थिक तंगी की वजह से सिर पर दही उठाकर बेचा। घर में जो गाय भैंस थी, उसे चराया।
जावरों के चराने जाता था तो नदी किनारे रेत पर कलाकृति करने लगते थे, गाय भैंस बकरी चरते रहती थी। बांस का कर्ची (बम्बू स्टिक) से टोकरी बनाकर किसानों के बीच बेचा। उससे कुछ कमाई होती थी। परिवार के लोगों को चाहत थी कि ज़्यादा इनकम कर के दें, जो कि नहीं हो पाता था।
पढ़ने से ज्यादा मुझे कलाकृति बनाने में मन लगता था, लेकिन कलाकृति बनाने से ज्यादा आमदनी नहीं होती थी। जिससे की परिवार के लोगों को संतुष्ट कर सकें। पैसों की तंगी कही वजह से पहले अपने सगे संबंधि मुझसे किनारा करते चले गए। एक वक्त आया कि आर्ट की पढ़ाई करने पटना गए।
कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त ज़ेहन में एक बात रहती थी कि, 30 तारीख आ गया है फ़ीस भरने का पैसे का इंतज़ाम करना है। कैसे खाएंगे, रूम का भारा कहां से देंगे, हम खाना क्या खाएंगे। परिवार से भी कोई सहायता नहीं मिल रही थी। पैसों की ज़रूरत पूरा करने के लिए पटना के विभिन्न स्कूलों और जगहों पर कला का प्रदर्शन कर कुछ आमदनी करते थे।
पैसों की ज़रूरत की वजह से काम करने की धुन में कॉलेज नागा होने लगा और एक समय ऐसा आया कि कॉलेज में 75% अटेंडेंस पूरा नहीं होने की वजह से नाम काट दिया गया। रूम पार्टनर ने भी कमरे से निकाल दिया, क्योंकि समय पर उसे किराया नहीं दे पाते थे। इन सब बातों से मेरे दिल को बहुत तकलीफ़ होती थी।
मुझे जब लोग दरकिनार करता था, तो बहुत तकलीफ होती थी। कभी-कभी हिम्मत जवाब दे देती थी, लगता था कि हार गए। इन सबके बाबजूद मन को मनाया और इस हुनर के साथ आगे बढ़ता रहा। मेहनत कर जैसे-तैसे काम करते रहे और वक्त गुज़रता गया। कलाकारी मेरी इनकम नहीं, पैशन है।
मंहगाई के इस दौर में भी मैंने कला का प्रदर्शन नहीं छोड़ा, इससे कमाई तो नहीं होती है, लेकिन यह मेरी तपस्या और साधना है। जीवन गुज़ारने के लिए मैं मूर्ति (फ़ाइबर, प्लास्टर ऑफ पेरिस) बनाता हूं। उससे जो आमदानी होती है, उससे परिवार का गुज़ारा होता है।
रेत कला, पीपल के पत्ते पर कला यह एक सेवा है इससे आमदनी नहीं है। लोग अपनी खुशी से जो देते हैं वह रख लेता हूं। बस मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे कला को दुनिया में पहचान मिल रही है। इससे लगता है कि मेरी मेहनत रंग ला रही है। जो कुर्बानी मैंने दी है, वह कामयाब हो गई है।












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