Prashant Kishor की गिरफ्तारी थी बड़ी साज़िश, क्या होने वाली थी कुछ अनहोनी, अधिवक्ता ने खोले गहरे राज़
Prashant Kishor News Update: जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर 2 जनवरी से भूख हड़ताल पर हैं। उनकी तबीयत खराब होने के कारण उन्हें पटना के मेदांता अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया है। आज उनके अनशन का आठवां दिन है।
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इस दौरान कई नेताओं ने जन सुराज और प्रशांत किशोर की भूख हड़ताल के साथ-साथ बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) से जुड़े मुद्दों को लेकर चिंता जताई है। जन सुराज अध्यक्ष मनोज भारती की अध्यक्षता में पार्टी के विभिन्न नेताओं ने अपनी राय रखी।

नीतीश सरकार की कार्यशैली पर सवाल: इस मौक़े पर जन सुराज युवा अध्यक्ष आनंद मिश्रा, किशोर कुमार मुन्ना, अधिवक्ता अमित कुमार, पूर्व एमएलसी रामबली चंद्रवंशी आदि उपस्थित थे। उन्होंने प्रशांत किशोर की गिरफ्तारी को लेकर नीतीश सरकार पर लगाए गए आरोपों पर चर्चा की।
नीतीश सरकार पर आरोप: जन सुराज पार्टी ने नीतीश सरकार पर प्रशांत किशोर की गिरफ़्तारी को ठीक से न संभालने का आरोप लगाया। अधिवक्ता अमित कुमार ने बताया कि पुलिस ने किशोर को उचित हिरासत के कागजात के बिना बेउर जेल ले जाने का प्रयास किया।
जेल अधीक्षक ने इन दस्तावेजों के बिना प्रवेश से इनकार कर दिया। यह घटना तब हुई जब अदालती कार्रवाई जारी थी। अमित कुमार ने किशोर और बीपीएससी छात्रों के साथ विरोध प्रदर्शन करने वाले अन्य लोगों के खिलाफ आरोपों की आलोचना की।
अमित कुमार ने पूछे सवाल: PK के अधिवक्ता ने सवाल उठाया कि क्या बिहार पुलिस ने कंबल और मफलर को हथियार माना है। जिन धाराओं के तहत उन पर आरोप लगाए गए हैं, वे जमानती हैं, फिर भी उनमें दंगा करने और घातक हथियार रखने के आरोप शामिल हैं।
पुलिस के आचरण पर चिंताएं: आनंद मिश्रा ने किशोर की गिरफ़्तारी के दौरान पुलिस के आचरण पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अधिकारियों के पास पहचान पत्र या रैंक चिन्ह नहीं थे। मिश्रा ने सवाल उठाया कि क्या ये लोग असली पुलिस अधिकारी थे या झूठे बहाने से काम करने वाले नकली लोग।
मिश्रा ने डीके बसु दिशा-निर्देशों का पालन करने का आग्रह किया, जिसके अनुसार गिरफ्तारी के दौरान अधिकारियों को अपनी पहचान उजागर करनी होती है। उन्होंने कहा कि ऐसा व्यवहार तो आतंकवादियों के साथ भी नहीं किया जाता और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से जवाबदेही की मांग की।
मेडिकल जांच विवाद: किशोर कुमार मुन्ना ने खुलासा किया कि पुलिस ने उचित दस्तावेजों के बिना प्रशांत किशोर की मेडिकल जांच के लिए एम्स प्रशासन पर दबाव डाला। हालांकि, एम्स ने जरूरी कागजात के बिना ऐसा करने से इनकार कर दिया। यह घटना तब हुई जब पुलिस सुबह-सुबह किशोर को जबरन एम्स ले गई।
अधिवक्ता अमित कुमार ने प्रशांत किशोर की जमानत शर्तों का ब्यौरा साझा किया। पीआर बॉन्ड में चार बिंदु शामिल हैं: खुद को आरोपी के रूप में स्वीकार करना, पुलिस के साथ सहयोग करने और यदि आवश्यक हो तो अदालत में पेश होने के लिए सहमत होना, और यदि वह मुकदमे की कार्यवाही का पालन करने में विफल रहता है तो जुर्माना भरना।
FIR गांधी मैदान में ले जाया गया कहीं और: गांधी मैदान पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी, फिर भी किशोर को अधिकारियों द्वारा स्पष्टीकरण या दस्तावेज दिए बिना कहीं और ले जाया गया। पारदर्शिता की यह कमी प्रक्रियागत ईमानदारी पर सवाल उठाती है।
प्रशांत किशोर की भूख हड़ताल से जुड़ी घटनाओं ने बिहार में कानून प्रवर्तन प्रक्रियाओं के बारे में महत्वपूर्ण चिंताओं को उजागर किया है। उनकी गिरफ़्तारी और उसके बाद की कार्रवाइयों के दौरान अनुचित आचरण के आरोपों ने राजनीतिक नेताओं और कानूनी विशेषज्ञों का ध्यान समान रूप से आकर्षित किया है।












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