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Bihar Politics: 'तेज' की 'तेजस्वी' को नसीहत, जयचंदों से सावधान हो जाओ’, भाई की चिंता असली, या एक राजनीतिक चाल?

Bihar Politics: राजनीति में रिश्तों का रंग अक्सर बदल जाता है। कभी खून का रिश्ता सबसे बड़ा होता है, तो कभी सत्ता की भूख उस रिश्ते को दरारों में बदल देती है। राजद के भीतर आज यही सवाल गूंज रहा है, क्या तेज प्रताप यादव सचमुच अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव की चिंता कर रहे हैं, या फिर यह सब एक चुनावी चाल है?

तेजस्वी यादव आज राजद की कमान संभाल रहे हैं। पार्टी का भविष्य, संगठन की मजबूती और चुनावी रणनीति, सब उनकी जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, बड़े भाई तेज प्रताप यादव, जिन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, बार-बार यह संदेश देते दिख रहे हैं कि उन्हें अपने छोटे भाई की फिक्र है। लेकिन इस फिक्र के पीछे छिपे इरादों पर सवाल उठना लाजिमी है।

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क्या यह चिंता भाईचारे की सच्ची झलक है? या फिर यह एक कोशिश है यह साबित करने की कि तेजस्वी अभी राजनीति की बारीकियों को समझने लायक परिपक्व नहीं हैं, और राजद की कमान गलत हाथों में है? तेज प्रताप यादव का राजनीतिक सफर हमेशा अनिश्चितता, बाग़ी स्वभाव और विवादित बयानों से भरा रहा है।

अब जब पार्टी उनसे दूरी बना चुकी है, तो उनका हर कदम और हर बयान एक रणनीति की तरह देखा जाएगा। वे चाहे सचमुच भाई की चिंता कर रहे हों, या फिर अपने लिए जमीन तैयार कर रहे हों, दोनों ही सूरतों में इसका असर राजद की राजनीति और चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा।

तेजस्वी यादव के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष या एनडीए नहीं है, बल्कि अपने ही घर और परिवार की राजनीति है। अगर वे इस पारिवारिक राजनीति को साधने में विफल रहे, तो राजद की छवि पर चोट लगेगी और जनता यह मान बैठेगी कि पार्टी की कमान सही हाथों में नहीं है।

राजनीति में भाई का हाथ थामना और भाई से सावधान रहना, दोनों ही ज़रूरी होते हैं। अब यह चुनाव ही तय करेगा कि तेजस्वी की समझदारी उन पर भारी पड़ती है, या तेज प्रताप की चालाकी। लोकतंत्र बचाने का दावा करना आसान है, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों को निभाना कहीं अधिक कठिन।

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव लोकतंत्र बचाने के नारे के साथ यात्रा पर निकले हैं। लेकिन जब इसी यात्रा के दौरान नबीनगर विधानसभा से विधायक विजय कुमार सिंह उर्फ डब्लू सिंह की गाड़ी चालक और एक पत्रकार भाई के साथ कथित मारपीट और गाली-गलौज जैसी शर्मनाक घटनाएं होंगी, तो सवाल उठना स्वाभाविक है,क्या सचमुच लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ी जा रही है या लोकतंत्र को ही तार-तार किया जा रहा है?

तेज प्रताप यादव ने कहा कि मैं इसकी कड़ी आलोचना करता हूं और तेजस्वी यादव से कहना चाहता हूं कि अभी भी वक्त है, अपने आस-पास मौजूद जयचंदों से सावधान रहे। वरना चुनावी नतीजे जनता के गुस्से का आईना बनेंगे। चुनाव यह तय करेगा कि आप कितने समझदार हैं।

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