OI Exclusive: बिहर में बढ़ रहा अपराध,सिस्टम की नाकामी या राजनीतिक शह, पूर्व IPS अमिताभ ने बताया जिम्मेदार कौन?
OI Exclusive Interview, Ex IPS Amitabh Das: बिहार में आए दिन हत्या, लूट और महिला अपराधों में बढ़ोतरी हो रही है। पक्ष विपक्ष के बीच ज़ुबानी जंग जारगी है, वहीं सियासी गलियारों में यह चर्चा हो रही है कि यह सिस्टम की नाकामी या राजनीतिक शह?
वनइंडिया हिंदी से ख़ास बातचीत में पूर्व IPS अमिताभ दास ने कहा कि यह बढ़ोतरी सिर्फ सिस्टम की नाकामी नहीं है, बल्कि राजनीतिक शह और प्रशासनिक असंवेदनशीलता का भी परिणाम है। जब अपराधियों को पता होता है कि उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी, तब वे निडर होकर अपराध करते हैं।

क्या पुलिसिंग और खुफिया तंत्र निष्क्रिय होते जा रहे हैं?
अमिताभ दास ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी, पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल, और बाहुबलियों का संरक्षण इस बढ़ोतरी के मूल कारण हैं। निष्क्रियता अब एक ढांचा बन चुकी है। खुफिया तंत्र का काम केवल सूचना जुटाना नहीं, बल्कि समय पर कार्रवाई कराना भी होता है।
IPS अफसरों को स्वतंत्रता मिल रही है?
जब प्रशासनिक नेतृत्व कमजोर होता है, तो तंत्र केवल कागज़ी रिपोर्टिंग तक सीमित रह जाता है। तकनीकी संसाधनों और ट्रेनिंग की कमी भी इस निष्क्रियता को बढ़ावा देती है। आज की परिस्थिति में, स्वतंत्रता सैद्धांतिक है, व्यावहारिक नहीं।
राजनीतिक नेतृत्व यदि अफसरों की ईमानदारी और निष्ठा को ताकत मानता है, तो वे स्वतंत्रता से कार्य कर सकते हैं। लेकिन जहां नियुक्तियां राजनीतिक नज़दीकियों पर हों, वहां अफसर केवल आदेशपाल बन जाते हैं।
क्या बदलने की ज़रूरत है?
अमिताभ दास ने कहा कि मैं होता तो "राजनीतिक दखल" पर अंकुश लगाता और जिम्मेदार अफसरों की स्वतंत्र तैनाती करता। साथ ही "लॉ एंड ऑर्डर स्पेशल टास्क फोर्स" का गठन करता जो सिर्फ अपराध नियंत्रण पर केंद्रित होती। अफसरों की जवाबदेही तय करना और जनता के साथ सीधा संवाद बहाल करना मेरी प्राथमिकता होती।
क्या राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ गया है?
यह हस्तक्षेप अब नीति से ज्यादा नीयत पर निर्भर करता है। अपराधियों पर कार्रवाई करने वाले अफसरों का तबादला कर देना, या दबाव में जांच प्रभावित करना, ये घटनाएं अब आम हो गई हैं। इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और पुलिस व्यवस्था कमजोर होती है।
बिहार में सुधार की सूरत है या नहीं?
अमिताभ दास ने कहा कि बिहार में सूरत जरूर है, लेकिन इच्छाशक्ति नहीं। प्रशासनिक सुधार, पुलिस सुधार और शिक्षा में निवेश के बिना बदलाव असंभव है। जब तक नीतियों में पारदर्शिता और जनभागीदारी नहीं आएगी, तब तक वास्तविक सुधार एक सपना ही रहेगा।
पुलिस-जन संवाद कैसे बेहतर हो?
पुलिस थानों को जन सहयोग केंद्र के रूप में स्थापित करना होगा। बीट कांस्टेबल व्यवस्था को फिर से मजबूत करना होगा। साथ ही सोशल मीडिया, स्थानीय पंचायत और स्कूल-कॉलेजों के साथ "लोक संवाद अभियान" चलाना बेहद जरूरी है।
युवा अफसरों को क्या सलाह देंगे?
सिद्धांतों से समझौता मत करो। राजनीति और अपराध दोनों का दबाव रहेगा, लेकिन ईमानदारी और जनता के हितों को प्राथमिकता देने वाला अफसर ही लंबी दौड़ का घोड़ा होता है। अफसर को सिर्फ सरकार का नहीं, संविधान और समाज का सेवक होना चाहिए।
संख्यात्मक और तकनीकी कमजोरी पर आपकी राय?
बिहार में प्रति व्यक्ति पुलिसबल की संख्या राष्ट्रीय औसत से नीचे है। तकनीकी तौर पर CCTV, forensic labs और cyber cells की बड़ी कमी है। इसलिए सिर्फ नई बहाली नहीं, प्रशिक्षण, संसाधन और मनोबल तीनों को सुधारना जरूरी है।
क्या जनांदोलन की ज़रूरत है?
बिलकुल। जब जनता चुप रहती है, तो सत्ता बेलगाम हो जाती है। एक जन जागरूकता अभियान जरूरी है, जहां लोग सिर्फ विरोध नहीं, नीतिगत सुधार की मांग करें। RTI, लोक अदालत और जन सुनवाई को सशक्त करने से यह आंदोलन दिशा पा सकता है।
बदलते राजनीतिक गठबंधन - विचारधारा या सत्ता की राजनीति?
बिहार की राजनीति में आज विचारधारा से ज़्यादा सत्ता की जोड़-तोड़ दिखाई देती है। गठबंधन अक्सर जातीय आंकड़ों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के आधार पर बनते-बिगड़ते हैं। ऐसे गठबंधन सत्ता तो दिला सकते हैं, लेकिन जनता का भरोसा नहीं।
क्या विपक्ष की कमजोरी और NDA की एकजुटता 2025 को बदल सकती है?
बिलकुल। विपक्ष में नेतृत्व और रणनीति की कमी और एनडीए की संघटनात्मक मजबूती 2025 के चुनाव को निर्णायक बना सकती है। पर यदि विपक्ष स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे विषयों पर केंद्रित हुआ, तो समीकरण पलट भी सकते हैं।
जातीय समीकरण बनाम विकास की राजनीति - कौन हावी है?
जातीय समीकरण अभी भी 70% राजनीति को प्रभावित करते हैं, लेकिन शहरी और युवा वोटर अब रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने लगा है। इसलिए पार्टियों को अब जाति + विकास दोनों का संतुलन बनाना होगा।
कानून व्यवस्था पर सरकार का रवैया कितना जिम्मेदार है?
सरकार की मौन सहमति या लापरवाही, दोनों ही जिम्मेदार हैं। प्रशासन को सिर्फ चुनावी उपकरण समझना और कानून व्यवस्था को सिर्फ राजनीतिक प्रतिशोध के लिए इस्तेमाल करना, यही बिहार की सबसे बड़ी विफलता है।
बाहुबलियों की वापसी - कितना खतरा?
यह साफ तौर पर लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। जब दागी नेता फिर से चुनाव लड़ते हैं और पार्टियां उन्हें टिकट देती हैं, तो यह न्याय प्रणाली और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा हमला है। इस प्रवृत्ति को जनता ही अपने वोट से खत्म कर सकती है।
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