Kishanganj Election 2025: मुस्लिम बहुल सीट पर 79.88% बंपर वोटिंग, भाजपा की हिंदू महिला नेता का पलड़ा भारी
Kishanganj Assembly Election 2025 Phase 2 Voting: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण में सबसे ज्यादा चर्चा जिस सीट की हो रही है, वह है सीमांचल की किशनगंज विधानसभा सीट। 11 नवंवर को किशनगंज में शाम 6 बजे तक 79.88% वोटिंग हुई। इस सीट पर कांटे की टक्कर भाजपा की स्वीटी सिंह और कांग्रेस उम्मीदवार कमरूल होदा के बीच है। कांग्रेस ने अपने विधायक का टिकट काट कर AIMIM से विधायक रहे कमरूल होदा को टिकट दिया है
किशनगंज सीट इसलिए खास है क्योंकि यह बिहार की कुछ मुस्लिम बहुल सीटों में से एक है, जहां हर बार मुकाबला दिलचस्प और अप्रत्याशित रहा है। कांग्रेस और एआईएमआईएम के बीच की यह पारंपरिक जंग इस बार बीजेपी की स्वीटी सिंह की मौजूदगी से और भी रोमांचक हो गई है। सवाल अब यही है-क्या इस बार किशनगंज में कमल खिल पाएगा?

स्वीटी सिंह: तीन बार हारकर भी बनीं बीजेपी का चेहरा
46 वर्षीय स्वीटी सिंह पिछले डेढ़ दशक से किशनगंज में बीजेपी का सबसे पहचाना चेहरा हैं। पेशे से वकील और राजपूत समुदाय से आने वाली स्वीटी सिंह 2010 से लगातार इस सीट से चुनाव लड़ रही हैं। वे 2010 में महज 264 वोटों से हारीं, जबकि 2020 में अंतर केवल 1,381 वोटों का था। वहीं 2015 में हार का अंतर 8,609 वोट था। इतनी नजदीकी हारों ने साबित किया कि स्वीटी सिंह मुस्लिम बहुल सीट पर भी बीजेपी के लिए एक मजबूत विकल्प बन चुकी हैं।
स्वीटी सिंह की स्थानीय राजनीति जड़ें गहरी हैं। उनकी कुल संपत्ति करीब 36 करोड़ रुपये है, जबकि उन पर लगभग 4.8 करोड़ रुपये की देनदारी है। दिलचस्प बात यह है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।
कांग्रेस और AIMIM के बीच जंग, बीजेपी को मिल सकता है फायदा
इस बार कांग्रेस ने अपने मौजूदा विधायक का टिकट काटकर कमरूल होदा को उम्मीदवार बनाया है, जो पहले एआईएमआईएम से विधायक रह चुके हैं। वहीं एआईएमआईएम ने इस बार शम्स अघाज को मैदान में उतारा है।
अगर एआईएमआईएम ने फिर से मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है। किशनगंज में लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, और ऐसे में मुस्लिम वोटों का विभाजन बीजेपी के लिए जीत की उम्मीद जगा सकता है।
हालांकि, कांग्रेस यहां पारंपरिक रूप से मजबूत रही है और उसका ग्राउंड नेटवर्क एआईएमआईएम से कहीं अधिक व्यापक है। इसलिए मुकाबला इस बार भी त्रिकोणीय रहने के आसार हैं।
किशनगंज की सियासत: धर्म बनाम विकास का पुराना संघर्ष
किशनगंज बिहार का वह इलाका है, जहां सियासत अक्सर मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम रेखा पर बंटी दिखाई देती है। रोजगार, उद्योग और विकास जैसे मुद्दे यहां हमेशा पीछे छूट जाते हैं। सीमांचल के इस जिले की जनता की सबसे बड़ी मांग है-रोजगार और उद्योग धंधे का विकास।
दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी से सटे इस इलाके की जलवायु चाय की खेती के लिए आदर्श मानी जाती है, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक यह अब भी लाभकारी व्यवसाय नहीं बन पाया है।
किशनगंज विधानसभा सीट का इतिहास
किशनगंज विधानसभा क्षेत्र में अब तक 19 बार चुनाव हो चुके हैं। इनमें कांग्रेस ने 10 बार, राजद ने 3 बार, जबकि एआईएमआईएम, लोकदल और जनता दल जैसे दलों ने एक-एक बार जीत दर्ज की है।
यहां से आखिरी बार कोई हिंदू उम्मीदवार 1967 में जीता था-प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की सुशीला कपूर। स्वीटी सिंह ने इस धारणा को तोड़ने की कोशिश जरूर की है और हर बार अपनी पकड़ बढ़ाई है।
2020 में कांग्रेस के इजहाऱुल हुसैन ने 61,078 वोटों से जीत हासिल की थी, जबकि स्वीटी सिंह को 59,697 वोट और एआईएमआईएम के कमरुल होदा को 41,904 वोट मिले थे। 2024 लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के मोहम्मद जावेद को इसी क्षेत्र से करीब 19 हजार वोटों की बढ़त मिली थी।
2025 में क्या होगा फैसला?
2025 के चुनाव में स्वीटी सिंह के सामने फिर वही चुनौती है-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण और हिंदू वोटों की एकजुटता। अगर एआईएमआईएम इस बार भी मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा पाती है, तो बीजेपी के लिए यह सीट जीत की दहलीज पर पहुंच सकती है। हालांकि, कांग्रेस के मजबूत संगठन और एआईएमआईएम के युवा प्रभाव को देखते हुए मुकाबला कड़ा और त्रिकोणीय रहेगा।
स्वीटी सिंह की सक्रियता, साफ छवि और पिछले चुनावों में दी गई मजबूत चुनौती उन्हें एक बार फिर किशनगंज की सियासी लड़ाई का केंद्र बिंदु बना रही है। अब देखना यह है कि क्या वह इस बार इतिहास बदल पाती हैं या किशनगंज में परंपरा एक बार फिर कायम रहती है।












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