अंतिम चुनाव का आखिरी दांव, नीतीश बाबू इतने मजबूर और हताश कभी ना थे

पटना। किशनगंज में नीतीश कुमार भावुक अपील कर गये। चुनाव प्रचार का आखिरी दिन था। आखिरी चरण भी। अब यह नीतीश कुमार के लिए आखिरी चुनाव भी हो गया। इसका मतलब यह है कि अब वे आगे कभी मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर भी वोट मांगते नज़र नहीं आएंगे। नीतीश कुमार को आखिरी विधानसभा चुनाव लड़े हुए 35 साल हो गये। इसी तरह लोकसभा का चुनाव लड़े हुए उन्हें 16 साल हो गये। चुनाव लड़ना तो नीतीश कुमार ने बहुत पहले से छोड़ दिया था। विधान परिषद में रहते हुए नीतीश ने 15 साल मुख्यमंत्री का कार्यकाल बिता दिया। सच यह है कि नीतीश ने आखिरी चुनाव कहकर राजनीति से विदाई का संकेत दे दिया है। चुनावी राजनीति से तो वे बहुत पहले ही दूर हो चुके थे।

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    How CM Nitish Kumar reached to the point to announce his last election speech

    आखिरी चुनाव, आखिरी दांव
    नीतीश कुमार को अब यह साफ महसूस हो रहा है कि बिहार की सियासत में संभावित पराजय के बाद अब उनका सियासी भविष्य गर्त में है। न तो बीजेपी में उनका सम्मान रहने वाला है और न ही महागठबंधन में। स्वतंत्र सियासत के लिए जो जज्बा चाहिए, वो अब ढलती उम्र में उनसे हो न सकेगा। जब पूरी जिन्दगी वे अकेले जेडीयू को सत्ता के लायक नहीं बना पाए तो अब आगे ऐसी सोच रखना बेमानी होगी। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए सियासत में बने रहने के लिए इस चुनाव में अच्छे प्रदर्शन का रास्ता ही शेष रह जाता है। यही कोशिश नीतीश ने आखिरी क्षण तक की है। आखिरी चुनाव का दांव भी इसी लिहाज से खेला है। जब अगला विधानसभा चुनाव हो रहा होगा तब नीतीश 75वें साल में प्रवेश कर रहे होंगे। लिहाजा उनकी घोषणा वाकई गंभीर है और वोटरों को भावनात्मक रूप से लुभा सकती है। प्रश्न है कि कितनी कारगर होगी उनकी यह घोषणा? मतलब ये कि क्या 74 सीटों वाले अंतिम चरण में जेडीयू अपना पिछला प्रदर्शन 25 सीट जीतने का कारनामा दोहरा पाएगी?

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    किशनगंज में ही घोषणा क्यों?
    किशनगंज में ही एक दिन पहले नीतीश कुमार ने मुसलमानों को आश्वस्त किया था कि कोई किसी को बाहर नहीं करेगा। योगी आदित्यनाथ की घोषणा के बाद वे स्थिति स्पष्ट कर रहे थे जिन्होंने सारे घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात कही थी। एनडीए में रहकर भी नीतीश कुमार को एनडीए से ही लड़ना पड़ रहा है। मतदाताओं के सामने अपनी बेबसी वो रख नहीं पा रहे हैं। ऐसे में मतदाताओं को समझदार मानते हुए यह अपील कर देना कि यह उनका आखिरी चुनाव है वाकई 'अपना सबकुछ झोंक देना' इसी को कहते हैं। नीतीश कुमार ने किशनगंज में ही यह घोषणा की है यह भी अहम है।

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    अपने कुनबे ने ही नीतीश को किया कमजोर
    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आखिरी चुनाव वाला दांव चुनाव अभियान की शुरुआत में क्यों नहीं खेला? अगर वे योजना बनाकर इस दांव को आजमाते, तो इसके अच्छे नतीजे उन्हें मिल सकते थे। चुनाव अभियान की शुरुआत में नीतीश कुमार के लिए उतनी प्रतिकूल स्थिति नहीं थी। मगर, जैसे-जैसे चुनाव अभियान परवान चढ़ा नीतीश के लिए मुश्किलें बढ़ती चली गयीं। यह बात नीतीश भी जानते हैं कि उनके विरोधी मजबूत नहीं थे। उन्हें कमजोर बनाया उनके ही कुनबे ने।

    लोकजनशक्ति पार्टी का एनडीए से बाहर आना और केवल नीतीश कुमार के खिलाफ चुनाव में लड़ना नीतीश कुमार के लिए चौंकाने वाली बात नहीं थी। चौंकाने वाली बात रही इस घटना पर बीजेपी की प्रतिक्रिया। बीजेपी ने एलजेपी को एक प्लेटफॉर्म के तौर पर इस्तेमाल किया और यह सब जेडीयू को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर किया। बेबस नीतीश अपना आखिरी चुनाव मानकर ही बीजेपी से समझौता करते चले गये। एनडीए के हॉर्डिंग से नीतीश ने अपनी तस्वीर हटाए जाने की जिल्लत भी स्वीकार की। सबकुछ इसलिए कि वे प्रतिकूल स्थितियों को अपने दम पर संभाल लेंगे।

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    आखिरी चुनाव का दांव यानी कहा-सुनी माफ करें
    यह नीतीश कुमार का अपना दमखम ही है कि आखिरी दिन भी वो अपना आखिरी अस्त्र चला गये। कोई और नेता होता तो अब तक संयम तोड़ चुका होता और शायद इस अस्त्र के इस्तेमाल की सोच भी नहीं पाता। तीसरे चरण में किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, दरभंगा जैसे जिलों में वोटिंग है जहां मुस्लिम मतदाता हमेशा से नीतीश कुमार का साथ देते रहे हैं। नीतीश को एनडीए में होने का भारी नुकसान इन सीटों पर झेलना पड़ रहा है। लोग नाराज़ हैं। इसी नाराज़गी को एक तरह से क्षमा कर देने को उन्होंने अपने वोटरों से कहा है। चूके ऐसे शब्द वे एनडीए में रहकर नहीं निकाल सकते थे इसलिए अपने आखिरी चुनाव का दांव उन्होंने खेला है। एक तरह से यह कहा-सुनी माफ कर देने का आग्रह है।

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    मोदी के आगे नीतीश का समर्पण
    नीतीश कुमार की स्वाभाविक राजनीति बीजेपी की सांप्रदायिक नीतियों के खिलाफ रही है। मोदी विरोध तो उनकी सियासत का मूल मंत्र रहा था। मगर, वक्त ने नीतीश को बदल कर रख दिया। वे समझौता करते हुए इस हद तक पहुंच गये कि उनके मुंह पर नरेंद्र मोदी उन्हें 'राम मंदिर निर्माण पर तारीख पूछने वाला' और 'राम मंदिर निर्माण पर ताली बजाने वाला' कह गये। मगर, नीतीश कुछ बोल न सके। इसी तरह कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करते रहे नीतीश कुमार पर भी मोदी ने चुटकी ली थी। तब भी वे चुप रहने को विवश थे। नीतीश की विवशता बिहार की सियासत भी मोदी के सुपुर्द करने वाली होकर सामने आयी। मोदी विरोध की सियासत तो वे बहुत पहले छोड़ चुके थे। पटना में 'बिहार को विकसित राज्य मोदी ही बना सकते हैं' कहकर नीतीश ने दरअसल मोदी के सामने समर्पण कर दिया। लिहाजा चुनाव प्रचार के आखिरी दिन आखिरी चुनाव की बात कहकर नीतीश ने हताशा का परिचय दिया है। किसी रणनीति का हिस्सा होता तो यह घोषणा पहले हुई होती। इससे उनके राजनीतिक संन्यास का ही संकेत मिलता है।

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