बिहार: बिना ईंट और बालू के 14 साल में तैयार हुआ मंदिर, निर्माण में लकड़ी की कील और गोंद का हुआ है इस्तेमाल

छपरा-महम्मदपुर एनएच-722 के बगल में जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर की दूरी पर द्वारिकाधीश मंदिर स्थित है। स्थानीय लोगों की मानें तो 14 साल की कड़ी मेहनते के बाद गुजरात के कारीगरों ने मंदिर का निर्माण किया है।

छपरा, 22 अगस्त 2022। बिहार के मंदिरों में कृष्ण जन्मोत्सव की धूम चल रही है। प्रदेश के भी जिले में कृष्ण जन्मोत्सव का त्यौहार धूमधाम से मनाया जा रहा है। द्वारिकाधीश मंदिर (नैनी गांव) में भी जन्मोत्सव पर काफ़ी भीड़ उमड़ रही है। जानकार बताते हैं कि इस मंदिर के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। क्योंकि यह मंदिर अपने आप में बेहतरीन कला को प्रदर्शित करती है। बताया जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में ईंट, सीमेंट, सरिया और बालू का इस्तेमाल नहीं किया गया है। उत्तर भारत का यह इकलौता मंदिर है जिसका निर्माण गुजरात के द्वारिकाधीश मंदिर की तर्ज पर किया गया है। छपरा के प्रमुख स्थलों में इस मंदिर का भी नाम शुमार किया जाता है।

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    14 साल की मेहनत से बना उत्तर भारत का इकलौता मंदिर
    8 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुआ है भव्य मंदिर

    8 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुआ है भव्य मंदिर

    छपरा-मुहम्मदपुर एनएच-722 के बगल में जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर की दूरी पर द्वारिकाधीश मंदिर स्थित है। स्थानीय लोगों की मानें तो 14 साल की कड़ी मेहनते के बाद गुजरात के कारीगरों ने मंदिर का निर्माण किया है। ग़ौरतलब है कि पूरे मंदिर में कहीं भी लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यहां तक कि चौखट और दरवाज़ा भी लकड़ी की कील और गोंद से बनाया गया है। इस मंदिर का निर्माण गांव के ही राजीव कुमार (सिंटू सिंह) ने अपने निजी रुपयों से करवाया है। मंदिर के निर्माण में 8 करोड़ रुपये की लागत है आई है।

    11 मई 2005 को किया गया था मंदिर का शिलान्यास

    11 मई 2005 को किया गया था मंदिर का शिलान्यास

    ग्रामीणों ने बताया कि निजी पैसे से बनाने के बावजूद राजीव सिंह ने मंदिर को आम लोगों के लिए खोल दिया है। वह अंबानी ग्रुप के सिम्पलेक्स कंपनी के डायरेक्टर बै। छपरा के प्रमुख पर्यटन स्थल के तौर पर नैनी द्वारिकाधीश मंदिर विकसित हो गया है। मंदिर में हुई शानदार कारीगरी को देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। प्रबंधन समिति के सदस्य अखिलेख कुमार ने मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए 11 मई 2005 को मंदिर का शिलान्यास हुआ था। वहीं मंदिर का उद्घाटन साल 2019 में हुआ।

    मंदिर के निर्माण में हुआ है लाल पत्थर का इस्तेमाल

    मंदिर के निर्माण में हुआ है लाल पत्थर का इस्तेमाल

    गुजरात में मिलने वाले खास किस्म का लाल पत्थर (धागगरा) से पूरे मंदिर का निर्माण हुआ है। गुजरात के संवेदक मफत भाई पटेल (एमबी पटेल) के कारीगरों ने मंदिर का निर्माण किया है। ग़ौरतलब है कि मंदिर के निर्माँण में ईंट, सीमेंट, सरिया और बालू का उपयोग नहीं हुआ है। मंदिर के निर्माण में पत्थर को जोड़ने के लिए खास केमिल का इस्तेमाल हुआ है। इसके साथ ही क्लिप कट पद्धति का इस्तेमाल करते हुए पत्थर को एक दूसरे से जोड़ा गया है। घुमावदार जगह पर तांबे और पीतल के क्लिप का इस्तेमाल कर दो पत्थरों को जोड़ा गया है। मंदिर के निर्माण में खास बता यह भी है कि पूरे मंदिर में कहीं भी एक छोटा सा भी लोहे का इस्तेमाल नहीं हुआ है। लकड़ी की कील और गोंद का इस्तेमाल दरवाजे और चौखट के निर्माण में हुआ है।

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