Bihar Elections 2025: बिहार का बॉस कौन? 5 X-फैक्टर जो तय करेंगे नीतीश-तेजस्वी की किस्मत

Bihar Elections 2025: रणनीति और समीकरणों की बिसात पर बिछे बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही पटना से दिल्ली तक राजनीतिक पारा चढ़ गया है। चुनाव आयोग ने 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान की घोषणा कर दी है, और सबकी निगाहें 14 नवंबर को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं।

इस हाई-वोल्टेज वाले राजनीतिक मुकाबले में कौन बाजी मारेगा? इंडिया टुडे के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने पांच ऐसे 'X-फ़ैक्टर्स' बताए हैं जो इस निर्णायक चुनावी दंगल का रुख तय कर सकते हैं: आइए जानते हैं

nitish kumar tejashwi yadav

1. NDA को गणितीय लाभ

सरदेसाई के अनुसार, कागज पर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को राजनीतिक गणित के आधार पर स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP), जनता दल यूनाइटेड (JDU), जीतन राम मांझी की पार्टी, चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को मिलाकर यह गठबंधन एक व्यापक मोर्चे के रूप में खड़ा है, जो राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और वाम दलों वाले विपक्षी गठबंधन (महागठबंधन) की तुलना में संख्यात्मक रूप से अधिक मजबूत है।

2. जमीनी समीकरण की चुनौती

भले ही गणित NDA के पक्ष में हो, लेकिन जमीन पर राजनीतिक समीकरण इस मुकाबले को दिलचस्प बना रहे हैं। अधिकांश सर्वेक्षणों में RJD के तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री के लिए पसंदीदा चेहरे के रूप में दिखाया गया है। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी चुनौती RJD के पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) वोट आधार से परे अपने अपील का विस्तार करना है।

3. नीतीश कुमार फैक्टर

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 20 साल की सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकम्बेंसी) का सामना कर रहे हैं और हाल के वर्षों में कुछ लोगों द्वारा उन्हें 'कमजोर' नेता के रूप में देखा गया है। वह अपनी पार्टी के लिए एक संपत्ति और एक दायित्व दोनों हैं। वह एक संपत्ति इसलिए हैं क्योंकि वह लगभग 15% वोट शेयर सुरक्षित करते हैं, लेकिन एक दायित्व इसलिए हैं क्योंकि वह एंटी-इनकम्बेंसी का चेहरा हैं। इसलिए, प्रमुख सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपनी ज़मीन बचा पाएंगे या अब उनका स्थायी पतन हो रहा है।

4. कल्याणकारी योजनाएं बनाम एंटी-इनकम्बेंसी

मतदाताओं की थकान (वोटर फटीग) को दूर करने के लिए, NDA सरकार ने हाल के महीनों में महिलाओं और युवाओं को लक्षित करते हुए डायरेक्ट कैश बेनिफ़िट (सीधे नकद लाभ) योजनाओं की एक सीरीज शुरू की है। मतदाताओं के हाथों में सीधे पैसा डालने की यह रणनीति मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों में प्रभावी साबित हुई है। इस तरह के प्रत्यक्ष कल्याणकारी लाभों में पारंपरिक जातिगत समीकरणों को भेदने की क्षमता है और यह बिहार में एंटी-इनकम्बेंसी को दूर करने का एक शक्तिशाली उपकरण हो सकता है।

5. वाइल्डकार्ड प्रशांत किशोर

इस चुनाव का अंतिम और सबसे अप्रत्याशित फैक्टर हैं राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर। उनके हाई-प्रोफ़ाइल अभियान ने ज़बरदस्त चर्चा बटोरी है, लेकिन असली चुनौती इस चर्चा को वोटों में बदलना है। सरदेसाई का मानना है कि यदि उनकी पार्टी 10 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर लेती है, तो मुकाबला पूरी तरह से खुला हो सकता है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2020 का चुनाव महज़ 12,000 वोटों के बेहद कम अंतर से तय हुआ था। ऐसे में, किशोर द्वारा डाले गए छोटे से वोट कट से भी दोनों प्रमुख गठबंधनों के अंतिम परिणाम पर बड़ा असर पड़ सकता है।

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