Bihar Caste Politics: जातीय समीकरण से उलझी बिहार की सियासत, OBC–EBC की चुनौती में फंसे BJP, RJD और JDU
Bihar Caste Politics 2025: बिहार की राजनीति की असली धुरी जातीय समीकरण ही है। विधानसभा चुनाव 2025 करीब आते ही यह सवाल फिर से सबसे बड़ा हो गया है कि किस जाति का वोट किस पार्टी की तरफ झुकेगा। बीजेपी, आरजेडी और जेडीयू-तीनों दल लगातार अपनी रणनीतियां बदल रहे हैं, लेकिन ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) का असली समीकरण किसी एक पार्टी के हाथ पूरी तरह नहीं आ पा रहा है। यही वजह है कि बिहार की राजनीति हमेशा टेढ़ी और जटिल बनी रहती है।
बिहार में सत्ता की चाबी अब भी जातीय गठजोड़ के पास है। ओबीसी-ईबीसी की भूमिका जितनी बड़ी है, उतनी ही जटिल भी। और यही जटिलता तय करेगी कि 2025 में पटना की कुर्सी किसके हिस्से जाएगी। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि जातीय समीकरण से बिहार की सियासत कैसे उलझी हुई है।

🟢 बीजेपी और ऊपरी जातियों का समीकरण
बीजेपी पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वह अपने टिकट वितरण में ऊपरी (अपर कास्ट) जातियों को तरजीह देती है। 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के 74 विधायकों में से 33 ऊपरी जातियों से थे, यानी लगभग 40 फीसदी। पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे, जबकि ओबीसी वर्ग से 26 और ईबीसी वर्ग से केवल 2 विधायक चुनकर आए।
🟢 जेडीयू और नीतीश कुमार का संतुलन
जेडीयू की ताकत हमेशा से रही है कि वह जातीय समीकरण को थोड़ा संतुलन में रखने की कोशिश करती है। 2020 में पार्टी के 43 विधायकों में से सिर्फ 10 ऊपरी जाति से थे। बाकी 22 ओबीसी-ईबीसी समुदायों से आए। इनमें कुर्मी और यादव जैसे स्थानीय प्रभुत्व वाले समूहों की संख्या अधिक थी।
नीतीश कुमार का 2023 का जातीय जनगणना (Caste Census) का फैसला भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है। इससे ओबीसी और ईबीसी समुदायों की संख्या और उनका राजनीतिक महत्व एक बार फिर रेखांकित हुआ। नीतीश कुमार ने हमेशा खुद को एक सेक्युलर और सामाजिक न्याय पर आधारित राजनीति करने वाले नेता के रूप में पेश किया है, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है।
हालांकि, गैर-यादव ओबीसी तबकों को आरजेडी में उतनी जगह नहीं मिलती। यही वजह है कि दशकों से सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी अपने प्रभाव को कुछ सीमित जातीय समूहों तक ही फैला पाई है।
🟢 ईबीसी की अनदेखी और बड़ा विरोधाभास
ईबीसी यानी अति पिछड़े वर्ग बिहार की आबादी का लगभग 36-40 फीसदी हैं। लेकिन विधानसभा में उनकी हिस्सेदारी 2020 में सिर्फ 11 फीसदी रही। सभी दल चुनावी रैलियों में ईबीसी का नाम तो बार-बार लेते हैं, लेकिन टिकट वितरण और जीत की हकीकत इससे उलट है।
इससे यह भी साफ होता है कि जातीय राजनीति ने समावेशिता से ज्यादा खाई पैदा की है। बड़ी और प्रभुत्व वाली जातियों को टिकट और सत्ता में हिस्सेदारी मिलती है, लेकिन छोटे-छोटे समुदाय अब भी हाशिए पर हैं।
हिंदुत्व की राजनीति भी बिहार में सीमित असर ही दिखा पाई है। यूपी में योगी आदित्यनाथ जैसे करिश्माई हिंदुत्व चेहरे ने बीजेपी को बड़ा लाभ दिया, लेकिन बिहार में जातीय राजनीति इतनी गहराई से जमी हुई है कि हिंदुत्व का कार्ड बार-बार कमजोर पड़ जाता है।
🟢 मीडिया, समाज और बिहार की अलग तस्वीर
उत्तर प्रदेश में शहरीकरण और मीडिया का असर ज्यादा है, जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण काम करता है। लेकिन बिहार अब भी अपेक्षाकृत ग्रामीण है, यहां जातीय टकराव की परंपरा ज्यादा रही है। धार्मिक ध्रुवीकरण कभी स्थायी रणनीति नहीं बन पाया।
बिहार चुनाव 2025 में बुनियादी राजनीतिक व्याकरण में बदलाव की संभावना कम है। जातीय जनगणना ने पहले ही इस तथ्य को मजबूत कर दिया है कि बिहार की राजनीति जाति के बिना समझी ही नहीं जा सकती।
फिलहाल दो बड़े अनिश्चित कारक हैं-पहला, चुनाव आयोग का मतदाता सूची विवाद और दूसरा प्रशांत किशोर का जन सुराज अभियान। प्रशांत किशोर पंजाब की तर्ज पर एक "आउटसाइडर क्रांति" लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन बिहार का सामाजिक ढांचा पंजाब से बिल्कुल अलग है। यहां जाति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बिना जातीय गणित साधे कोई नई राजनीतिक ताकत बन पाना बहुत मुश्किल है।
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