जब तेजस्वी हैं बिहार के ट्विटर ब्वॉय तो फिर चुनाव के डिजिटल कैंपेन का क्यों कर रहे विरोध?

तेजस्वी यादव जब सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले नेता हैं तो फिर वे बिहार विधानसभा चुनाव के डिजिटिल मोड का विरोध क्यों कर रहे हैं ? ये सवाल पूछा है भाजपा के बिहार प्रभारी भूपेन्द्र यादव ने। उन्होंने कहा है कि अगर तेजस्वी यादव को डिजिटल माध्यम का विरोध करना है तो उन्हें फेसबुक, ट्वीटर का इस्तेमाल छोड़ देना चाहिए। कोरोना संकट ने परम्परागत चुनावी प्रक्रिया को अप्रासंगिक बना दिया है। ऐसे में वर्चुअल कैंपेन का विरोध वाजिब नहीं है। तेजस्वी यादव ट्वीटर पर इतने अधिक सक्रिय रहते हैं कि उन्हें भाजपा और जदयू के नेता ट्वीटर ब्वॉय कहते हैं। सोशल मीडिया पर बिहार के सबसे लोकप्रिय नेता नीतीश कुमार हैं। उसके बाद दूसरा नम्बर तेजस्वी यादव का ही है। तेजस्वी जब सोशल मीडिया में इतने लोकप्रिय हैं तो फिर वे डिजिटल इलेक्शन कैंपेन के खिलाफ क्यों हैं ? क्या उनकी तैयारी कमजोर है ? या फिर वे 'वोट टर्नआउट’ को लेकर चिंतित हैं ?

सोशल मीडिया में राजद सबसे लोकप्रिय
सोशल मीडिया पर बिहार के सबसे लोकप्रिय नेता नीतीश कुमार हैं। लेकिन बिहार के राजनीतिक दलों में पहला स्थान राजद को प्राप्त है। अगर राजनीतिक दलों के ट्वीटर अकाउंट की बात करें तो राजद भाजपा और जदयू से आगे है। ये आंकड़ा जुलाई 2020 का है। राजद के ट्वीटर फॉलोअर्स की संख्या 311 हजार है। जब कि भाजपा और जदयू के फॉलोअर्स की संख्या क्रमश: 149 हजार और 28.3 हजार है। यहां तक कि राजद फेसबुक फॉलोअर्स के मामले में भी भाजपा और जदयू से आगे है। राजद के फेसबुक फॉलोअर्स की संख्या 374 हजार है तो भाजपा के फॉलोअर्स की संख्या 341 हजार है। जदयू के 47k फॉलोअर्स हैं। इस मामले में कांग्रेस (145k) भी जदयू से आगे है। पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के भी 173k फॉलोअर्स हैं। जहां तक नेताओं की व्यक्तिगत लोकप्रियता का सवाल है तो इस मामले में नीतीश कुमार अन्य नेताओं से बहुत आगे हैं। नीतीश सकुमार के फेसबुक फॉलोअर्स की संख्या 15 लाख तो ट्वीटर फॉलोअर्स की संख्या 57 लाख है। दूसरे स्थान पर तेजस्वी हैं। तेजस्वी के ट्वीटर फॉलोअर्स की संख्या 24 लाख तो फेसबुक फॉलोअर्स की संख्या 14 लाख है। तीसरे स्थान पर बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी हैं।

क्या तेजस्वी हैं ट्वीटर ब्वॉय ?
लोकसभा चुनाव में हार का समय हो, चमकी बुखार का समय हो या कोरोना संकट संकट काल हो, तेजस्वी अक्सर बिहार से बाहर रहे हैं। ऐसे में वे ट्वीटर पर टिप्पणी कर बिहार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं। वे ट्वीट कर सरकार पर तीखे हमले बोलते रहे हैं। जदयू और भाजपा के नेता तेजस्वी पर यह अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि वे फील्ड की बजाय ट्वीटर पर राजनीति करने वाले नेता हैं। वे जनता के बीच जाने में विश्वास नहीं रखते। इसको लेकर जदयू और भाजपा के नेता तेजस्वी के ट्वीटर ब्वॉय कह कर कटाक्ष भी करते रहे हैं। कोरोना और बाढ़ संकट के बीच तेजस्वी ट्वीट के जरिये सरकार पर लगातार हमला बोल रहे हैं। इससे नीतीश कुमार असहज भी हुए। कुछ दिनों पहले बिहार में एक पुल का एप्रोच रोड टूट गया था। इस पर तेजस्वी ने ट्वीट किया- 8 साल में बन कर तैयार हुआ सत्तर घाट पुल 29 दिन में बह गया। क्या मुख्यमंत्री ने 264 करोड़ के पुल का समय से पहले उद्घाटन नहीं कर दिया ? तेजस्वी के इस ट्वीट पर नीतीश कुमार बेहद खफा हो गये। उन्होंने तेजस्वी का नाम लिये बिना कहा, किसी चीज का आइडिया है तो नहीं लेकिन घर में बैठ कर सोशल मीडिया में उल्टा पुल्टा लिखता रहता है। इसका नाम तो सोशल मीडिया है लेकिन कुछ लोग इस पर अनसोशल काम कर रहे हैं।

चुनाव के डिजिटल फ्लेटफॉर्म का विरोध क्यों ?
तेजस्वी सोशल मीडिया पर सक्रिय तो हैं लेकिन इसके चुनावी उपयोग को लेकर वे बहुत आश्वास्त नहीं हैं। उनकी पार्टी का कहना है कि राजद का मूल आधार वंचित तबका है जिसके पास इंटरनेट वाला एनड्रॉइड मोबाइल नहीं है। यह तबका रोजी- रोटी के लिए मशक्कत कर रहा है तो छह - सात हजार का मोबाइल कहां से लाएगा। ऐसे लोग चुनाव के डिजिटल फ्लेटफॉर्म पर कैसे अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएंगे ? अगर ऐसे लोगों की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी नहीं रही तो फिर चुनाव का क्या मतलब रह जाएगा ? मोबाइल पर बात करना अलग बात है और इसका तकनीकी इस्तेमाल अगल बात है। सभी लोग इंटरनेट के प्रयोग से वाकिफ नहीं हैं। 9 जून को गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार चुनाव को लेकर पहली डिजिटल रैली की थी। राजद ने इस रैली का विरोध किया था। इस रैली के दो दिन पहले राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव ने कार्यकर्ताओं के साथ थाली बजा कर अमित शाह की वर्चुअल रैली का विरोध किया था। उस समय तेजस्वी ने कहा था, भाजपा वर्चुअल रैली से एक्चुअल खामियां छिपा रही है। कोरोना गाइडलाइंस के बीच चुनाव कराये जाने के फैसले पर राजद के सांसद मनोज झा ने कहा है, अगर चुनाव आयोग ने दिशा निर्देशों को स्पष्ट नहीं किया तो मतदान 30 से 32 फीसदी कम हो जाएगा। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में 56.91 फीसदी मतदान हुआ था। इस बार अनुमान लगाया जा रहा है कि कोरोना के डर की वजह से मतदान का प्रतिशत 40 से 45 के बीच रह सकता है। अगर वोटिंग प्रतिशत कम रहती है तो किस दल को कितना नुकसान होगा, इस बात का आकलन किया जा रहा है।












Click it and Unblock the Notifications