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Bihar assembly elections 2020: वक्त पर चुनाव होने से किसे दिख रहा है फायदा?

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bihar assembly elections 2020: वक्त पर चुनाव होने से किसे दिख रहा है फायदा?

चुनाव आयोग के अनौपचारिक एलान के बाद स्पष्ट हो गया है कि अब बिहार चुनाव कोरोना संकट के बीच ही होगा। नियत समय के मुताबिक चुनाव अक्टूबर नवम्बर के बीच होना है। भाजपा और जदयू तय समय पर चुनाव के लिए उत्साहित हैं लेकिन राजद और लोजपा इसके लिए राजी नहीं हैं। चूंकि बिहार चुनाव अब कोरोना संक्रमण के नये दिशानिर्देशों के तहत होगा इसलिए उसका स्वरूप पहले के इलेक्शन से बिल्कुल अलग होगा। सबसे बड़ी तब्दीली चुनाव प्रचार और मतदान केन्द्रों की व्यवस्था में होगी। संक्रमण को देखते हुए बड़ी चुनावी सभाएं संभव न होंगी। इस स्थिति में चुनाव प्रचार फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्स एप, यूट्यूब चैनल, ओटीटी लाइव स्ट्रिमिंग जैसे आधुनिक संचार माध्यमों पर निर्भर हो जाएगा। कोरोना संकट के बीच सामाजिक दूरी का पालन जरूरी होगा इसलिए पहले से अधिक मतदान केन्द्र बनाए जाएंगे ताकि भीड़ कम हो सके। चुनाव आयोग ने बिहार में करीब 34 हजार नये मतदान केन्द्र बनाने की बात कही भी है। नये बूथ बनने से पुरानी व्यवस्था बदल जाएगी। चुनाव प्रचार और मतदान केन्दों में बदलाव और कोरोना संक्रमण को राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिये से देख रहे हैं। किसी को फायदा दिख रहा है तो किसी को नुकसान।

फायदा और नुकसान का गणित

फायदा और नुकसान का गणित

कोरोना संक्रमण बढ़ने के दौरान अप्रैल-मई में ही भाजपा और जदयू ने अनुमान लगा लिया था कि इस बार चुनाव, फील्ड के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लड़ा जाएगा। इसलिए उसने चुनाव की डिजिटल तैयारी पहले से शुरू कर दी थी। भाजपा की वर्चुअल रैली और जदयू की साप्ताहिक वर्चुअल मीटिंग इसी तैयारी का हिस्सा हैं। भाजपा और जदयू ने समय की मांग को देखते हुए साइंटिफिक इलेक्शन कैंपेन की तैयारी पहले शुरू कर दी थी। लोजपा ने भी वर्चुअल मीटिंग पर अमल तो शुरू किया था लेकिन इसी बीच उसकी चुनावी रणनीति कश्मकश में फंस गयी। नीतीश और चिराग पासवान की बढ़ती दूरियों के बीच एक मोड़ वो आ गया जब लोजपा सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने के बारे में सोचने लगी। तब चिराग को लगा कि अगर अभी चुनाव हों और लोजपा को एनडीए से अलग चुनाव लड़ना पड़ा तो सभी सीटों पर तैयारी मुमकिन नहीं हो पाएगी।। रामविलास पासवान की सहमति से चिराग पासवान बिहार चुनाव को समय से आगे बढ़ाने की मांग करने लगे। चुनाव टालने के लिए उन्होंने कोरोना संक्रमण को आधार बनाया। राजद की अपनी समस्याएं हैं। राजद खुद को गरीब-गुरबों की पार्टी मानता है। उसका मानना है कि चूंकि उसके समर्थक गांव-देहात में रहते हैं इसलिए वह फील्ड में उतर कर ही बेहतर तैयारी कर सकता है। वैसे भी राजद इलेक्शन कैंपेन में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर अन्य दलों की अपेक्षा कम जोर देता है। एक महीना पहले तेजस्वी ने कहा था कि अगर चुनाव में परम्परागत प्रचार की इजाजत नहीं मिली तो उनकी पार्टी चुनाव से दूर रहेगी।

लोजपा का नजरिया

लोजपा का नजरिया

एनडीए की भागीगार होते हुए भी लोजपा ने चुनाव आयोग से इलेक्शन टालने का आग्रह किया था लेकिन आयोग ने इसे दरकिनार कर दिया। लोजपा के आग्रह को ठुकराये जाने के बाद पहली बार केन्द्रीय मंत्री रामविलास पसवान ने मुंह खोला है। केन्द्र सरकार का हिस्सा रहते हुए उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाया है। अब लोजपा की कमान चिराग पासवान के हाथों में है। उन्होंने बिहार में अपनी राजनीति पारी जमाने के लिए नीतीश के खिलाफ आक्रामक नीति अपना रखी थी। राम विलास पासवान खामोशी से सब देख रहे थे। लेकिन अब बिहार चुनाव के मुद्दे पर उन्होंने खुल कर मैदान में आने का फैसला कर लिया। रामविलास पासवान ने भले अभी अध्यक्ष पद से अवकाश ले लिया है लेकिन लोजपा के आधार स्तंभ वही हैं। उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव को अभी नहीं कराने के लिए बेबाक राय रखी है। पासवान का कहना है कि बिहार में कोरोना का संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। यह महामारी कब तक बढ़ेगी और कितनी बढ़ेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। चुनाव सम्पन्न कराने के लिए लाखों कर्मचारियों और सुरक्षबलों की जरूरत होगी। बड़ी संख्या में लोग घरों से बाहर निकलेंगे। इन सभी लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा एक बड़ी जिम्मेवारी होगी। ऐसे में बेहतर होता कि चुनाव को टाल दिया जाता। अगर जरूरत पड़े तो बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा कर भी चुनाव का इंतजार किया जाना चाहिए। जब तक कोरोना का कहर कम नहीं होता तब तक चुनाव नहीं कराया जाना चाहिए। गरीबों की जान जोखिम में डाल कर चुनाव नहीं कराया जाना चाहिए। लोजपा को इस बात का अंदेशा है कि अगर कोरोना गाइडलाइंस के बीच चुनाव होगा तो गरीब और वंचित तबके के लोग शायद वोट के लिए बाहर न निकलें। या वोट करें भी तो कम करें। चुनाव के संबंध में चिराग पासवान का कहना है कि वैसे तो हम सभी 243 सीटों पर चुनाव के लिए तैयार हैं लेकिन राजनीतिक पार्टी के मतलब सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं है। हमारी भी कुछ जिम्मेवारियां हैं। हम लोगों को जानबूझ कर जोखिम में नहीं डाल सकते। दरअसल चिराग दूर की सोच रहे हैं। नये परिवेश में वे अधिक से अधिक सीटों पर चुनावी तैयारी के लिए कुछ और समय चाहते हैं।

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भाजपा-जदयू से राजद के सुर अलग क्यों ?

भाजपा-जदयू से राजद के सुर अलग क्यों ?

भाजपा और जदयू ने वर्चुअल मीटिंग और लाइव स्ट्रिमिंग के जरिये दूरदराज के गांवों तक कार्यकर्ताओं से संवाद किया है। ये दोनों दल चुनाव की डिजिटल तैयारियों में अन्य दलों से आगे हैं। नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के काम पर भी दोनों दलों को भरोसा है। भाजपा-जदयू को लगता है कि अगर तय समय पर चुनाव होंगे तो एक बार फिर उनकी गोटी लाल हो सकती है। इसलिए वे नियत समय पर चुनाव का समर्थन कर रहे हैं। जदयू पहले कहता था कि जब सिंगापुर और दक्षिण कोरिया में कोरोना संकट के बीच चुनाव हो सकता है तो बिहार में क्यों नहीं। अब जदयू का कहना है कि कोरोना महासंकट के बीच भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका ने भी चुनाव करा लिया। इसलिए अगर बिहार में चुनाव होता है तो इसमें आश्चर्य क्या ? वैसे तो तेजस्वी यादव ने भी कहा है कि अगर चुनाव आयोग समय पर चुनाव कराएगा तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं। लेकिन तेजस्वी चुनाव स्थगित किये जाने के ही पक्ष में रहे हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने कहा था कि अगर चुनाव आयोग परम्परागत प्रचार की मंजूरी नहीं देता है तो उनकी पार्टी चुनाव में शामिल नहीं होगी। राजनीतिक दलों के सामने चुनौती है कि वे जनता के बीच कैसे जाएंगे । डिजिटल प्रचार माध्यम से जुड़ने के लिए न सबके पास साधन है और न सब लोग उससे वाकिफ हैं। परम्परागत प्रचार के बिना यह चुनाव, चुनाव नहीं रह जाएगा बल्कि वह फेक इलेक्शन बन जाएगा। हम बिहार में फेक इलेक्शन नहीं होने नहीं देंगे। दरअसल तेजस्वी चुनाव की डिजिटल तैयारी में पीछे हैं इसलिए वे या तो चुनाव को टालना चाहते हैं या फिर जनता से सीधे जुड़ने के लिए जनसभा की इजाजत चाहते हैं।

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English summary
Bihar assembly elections 2020: BJP, JDU, RJD, LJP, Who is benefiting from timely elections
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