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Bhopal News: SC-ST में क्रीमी लेयर न हो, वरना हम इसका विरोध करेंगे- RPI के राष्ट्रीय सचिव डॉ मोहनलाल पाटिल

MP News: एससी एसटी आरक्षण से क्रिमी लेयर को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई राजनीतिक दलों के दलित नेता कोर्ट के इस फैसले से खुश नजर नहीं आ रहे हैं और उन्होंने इसमें संशोधन की मांग की है।

केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि एससी एसटी वर्ग की जातियों का उप वर्गीकरण किया जाना चाहिए। इससे समूह में पिछड़ी जातियों को लाभ मिलेगा। लेकिन एससी एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान न लाया। अगर ऐसा किया गया तो हमारी पार्टी इसका विरोध करेगी।

Creamy layer in SC-ST reservation RPI Mohanlal Patil statement on Supreme Court s decision

इधर मध्य प्रदेश में भी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय सचिव डॉ मोहनलाल पाटिल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा कि एससी एसटी वर्ग की जातियों का उप वर्गीकरण तो ठीक है, इससे पिछड़ी जातियों को ऊपर आने का मौका मिलेगा। लेकिन आरक्षण में क्रिमी लेयर का प्रावधान लागू न हो। अगर ऐसा होता है तो हम इसके खिलाफ है।

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    SC-ST में क्रीमी लेयर न हो,वरना हम इसका विरोध करेंगे- RPI के राष्ट्रीय सचिव डॉ मोहनलाल पाटिल

    एससी-एसटी में जाति के उप वर्गीकरण से काम नहीं चलेगा

    डॉ मोहन लाल पाटील का कहना है कि सिर्फ एससी एसटी के आरक्षण में उप वर्गीकरण करने से उसमें पिछड़ी जातियों को लाभ तब तक नहीं मिलेगा, जब तक उनका एजुकेशन स्तर अच्छा नहीं हो जाता। क्योंकि आरक्षण नौकरी एजुकेशन में ही दिया जाता है। जब तक अनुसूचित जाति व जनजाति की जो पिछड़ी जातियां उन तक एजुकेशन ही नहीं पहुंचेगा तो वह ऊपर कैसे आएंगी? सुप्रीम कोर्ट को उनके एजुकेशन को लेकर भी सोचना चाहिए कि उन्हें कैसे निशुल्क शिक्षा मिले।

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला तो दे दिया, लेकिन सरकार को इसे लागू करने में लग जाएंगे कई साल

    RPI के राष्ट्रीय सचिव डॉ मोहनलाल पाटिल का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसे लागू करने में सरकार को कई साल लग जाएंगे। जातियों में वर्गीकरण के कारण जनजातियों को अब तक आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया उन्हें लाभ मिलना चाहिए, लेकिन हम इसमें क्रीमी लेयर के खिलाफ है। उन्होंने यह भी बताया कि इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले आ चुके हैं, लेकिन सरकार अब तक उन फैसलों को लागू नहीं करा सकी है।

    जानिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एससी-एसटी के आरक्षण में क्या बदलाव होगा

    राज्य सरकारें अब अनुसूचित जातियों (SC) के रिजर्वेशन में "कोटे में कोटा" लागू कर सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 1 अगस्त को इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने 20 साल पुराना अपना ही फैसला पलटा, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियां एक समूह हैं और इसमें शामिल जातियों के बीच और बंटवारा नहीं किया जा सकता।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फैसले में राज्यों के लिए कुछ महत्वपूर्ण हिदायतें दी हैं। इसके तहत राज्य सरकारें अब मनमर्जी से निर्णय नहीं ले सकतीं। इसके लिए दो मुख्य शर्तें रखी गई हैं:

    अनुसूचित जाति के भीतर किसी एक जाति को 100% कोटा नहीं दिया जा सकता।
    अनुसूचित जाति में किसी जाति का कोटा तय करने से पहले उसकी हिस्सेदारी का ठोस डेटा उपलब्ध होना चाहिए।
    यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने सुनाया है। पीठ ने कहा कि अनुसूचित जातियों को उनकी जातियों के आधार पर बांटना संविधान के अनुच्छेद-341 के खिलाफ नहीं है।

    अदालत ने ऐसा फैसला क्यों सुनाया

    अदालत ने यह निर्णय उन याचिकाओं के आधार पर सुनाया है जिनमें आरोप लगाया गया था कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण का लाभ सिर्फ कुछ ही जातियों को मिल रहा है, जबकि कई जातियां पिछड़ गई हैं। इन जातियों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए "कोटे में कोटा" की आवश्यकता जताई गई थी। यह दलील 2004 के फैसले से टकरा रही थी, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों को उप-श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता।

    अब भारत में राज्य सरकारें अनुसूचित जाति जन जातियों के भीतर अन्य जातियों को भी विशेष कोटा दे सकेंगी। इसका मतलब है कि जो अनुसूचित जातियाँ वंचित रह गई हैं, उन्हें आरक्षण के अंतर्गत विशेष कोटा प्रदान किया जा सकेगा। 2006 में पंजाब ने अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित कोटे के तहत वाल्मीकि और मजहबी सिखों को सार्वजनिक नौकरियों में 50% कोटा और प्राथमिकता दी थी।

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