Esophagus Surgery Success: भोपाल के छगनलाल की कैंसर से जंग, AIIMS नागपुर में जटिल सर्जरी ने दी नई जिंदगी
"AIIMS Nagpur Esophagus Surgery Success: कैंसर-यह शब्द सुनते ही दिल में खौफ की ठंडी सिहरन दौड़ जाती है। लेकिन भोपाल के 58 वर्षीय छगनलाल मालवीय ने इस जानलेवा बीमारी को न केवल हौसले से ललकारा, बल्कि AIIMS नागपुर के डॉक्टरों की मेहनत और 18 घंटे की जटिल सर्जरी के बाद एक नई जिंदगी हासिल की।
आहार नली (एसोफैगस) के कैंसर से जूझ रहे छगनलाल की यह कहानी हिम्मत, विश्वास, और चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार का एक जीवंत उदाहरण है। यह उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है, जो कैंसर की खबर सुनकर हताश हो जाते हैं। आइए, छगनलाल की इस प्रेरक जंग की पूरी कहानी को रोमांचक अंदाज में जानते हैं।

एक साधारण शुरुआत, जो बनी जानलेवा चुनौती
छगनलाल मालवीय, भोपाल के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले मेहनती इंसान, अपनी जिंदगी में बेटी की शादी की तैयारियों में मशगूल थे। 2024 में, 57 साल की उम्र में, उन्हें अचानक खाना निगलने में तकलीफ शुरू हुई। छगनलाल ने वन इंडिया हिंदी को बताया, "मुझे लगता था कि खाना गले में अटक रहा है। सीने में जलन थी, और धीरे-धीरे पानी पीना भी मुश्किल हो गया। नींद गायब थी, और मैं रात-रात भर करवटें बदलता रहता।"
शुरुआत में, छगनलाल ने इसे बेटी की शादी के तनाव का नतीजा समझकर नजरअंदाज कर दिया। लेकिन हालात बद से बदतर होते गए। तरल पदार्थ लेने में भी दिक्कत होने लगी, और उनका शरीर कमजोर पड़ने लगा। बेटी की शादी के बाद, परिवार के आग्रह पर उन्होंने एक निजी डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने एंडोस्कोपी की सलाह दी, और इस जाँच ने एक डरावना सच उजागर किया-आहार नली में कैंसर की संभावना। इसके बाद, छगनलाल भोपाल AIIMS पहुंचे, जहां बायोप्सी ने पुष्टि की कि उन्हें एसोफैगल कार्सिनोमा (आहार नली का कैंसर) है, जो दूसरी स्टेज तक पहुंच चुका था।
पहला कदम: कीमोथेरेपी और रेडिएशन का सहारा
भोपाल AIIMS में उस समय कार्यरत ऑन्को सर्जन डॉ नीलेश श्रीवास्तव ने छगनलाल का केस संभाला। कैंसर के सेकंड स्टेज की ओर बढ़ने की आशंका के कारण तुरंत सर्जरी संभव नहीं थी। डॉ नीलेश ने उन्हें रेडियोलॉजी विभाग में रेफर किया, जहां डॉ राजेश पसरिचा और उनकी टीम ने छह महीने तक कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी दी। इस इलाज का असर हुआ, और छगनलाल धीरे-धीरे फिर से खाना निगलने में सक्षम हो गए।
छगनलाल ने उत्साह से कहा, "मुझे लगा कि अब मैं पूरी तरह ठीक हो गया हूं। खाना निगलने की दिक्कत खत्म हो गई थी।" लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी। डॉ नीलेश ने उन्हें चेतावनी दी थी कि सर्जरी सहित पूरा इलाज जरूरी है, वरना कैंसर वापस आ सकता है। लेकिन छगनलाल ने इसे हल्के में लिया और सर्जरी को टाल दिया। इस बीच, डॉ नीलेश भोपाल AIIMS से AIIMS नागपुर में शामिल हो गए।

कैंसर का दोबारा हमला: लापरवाही पड़ी भारी
2025 की शुरुआत में, छह महीने बाद, छगनलाल को फिर से वही लक्षण महसूस होने लगे-खाना निगलने में दिक्कत, सीने में जलन, और तेजी से बढ़ती कमजोरी। वे दोबारा भोपाल AIIMS पहुँचे, जहाँ डॉ. अंकित जैन ने उनकी जाँच की। पेट-सीटी स्कैन और अन्य टेस्ट्स में पता चला कि कैंसर न केवल दोबारा उभर आया था, बल्कि इस बार फेफड़ों में इंफेक्शन भी हो गया था। डॉ. अंकित ने उन्हें तुरंत फेफड़ों के विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दी।
छगनलाल ने अपने पुराने डॉक्टर, नीलेश श्रीवास्तव, से संपर्क किया, जो अब AIIMS नागपुर में थे। नागपुर पहुँचकर उन्होंने पेट-सीटी स्कैन करवाया, जिसके परिणामों ने स्थिति की गंभीरता को उजागर किया। डॉ नीलेश ने परिवार को स्पष्ट चेतावनी दी, "इस बार लापरवाही जानलेवा हो सकती है। कैंसर तीसरे स्टेज में है, और सर्जरी अब आखिरी विकल्प है।"
डॉ नीलेश ने बताया, "आहार नली के कैंसर में कीमोथेरेपी और रेडिएशन के बाद छह महीने के अंदर सर्जरी जरूरी होती है। ज्यादातर मरीज यह गलती करते हैं कि उन्हें लगता है कि इलाज से बीमारी खत्म हो गई। लेकिन कैंसर इतनी आसानी से नहीं जाता।"
18 घंटे की जटिल सर्जरी: चिकित्सा का चमत्कार
डॉ नीलेश श्रीवास्तव के नेतृत्व में AIIMS नागपुर की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने छगनलाल की स्थिति का गहन अध्ययन किया। पेट-सीटी, एंडोस्कोपी, और फेफड़ों की स्थिति के आकलन के बाद 16 जुलाई 2025 को सर्जरी का फैसला लिया गया। यह सर्जरी बेहद जटिल थी, क्योंकि कैंसर तीसरे स्टेज में था और फेफड़ों का इंफेक्शन जोखिम को और बढ़ा रहा था।
18 घंटे तक चली इस सर्जरी में कई चुनौतियां थीं। डॉ नीलेश श्रीवास्तव, CTVS सर्जन डॉ हेमंत बोड़नकर, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ दीपाली, और डॉ नितेश की टीम ने दिन-रात एक कर दिया। सर्जरी में आहार नली के प्रभावित हिस्से को छाती (थोरैक्स) और पेट (एब्डोमेन) के माध्यम से हटाया गया। इसके बाद, पेट के एक हिस्से का उपयोग करके नई आहार नली बनाई गई, जिसे एनास्टोमोसिस कहते हैं। कैंसर के फैलाव को रोकने के लिए लिम्फ नोड्स भी हटाए गए।
डॉ नीलेश ने बताया, "यह सर्जरी कई जोखिमों से भरी थी-रक्तस्राव, इंफेक्शन, रक्त के थक्के, घाव का ठीक न होना, एनास्टोमोसिस में रिसाव, और फेफड़ों की जटिलताएँ। सबसे बड़ा खतरा जान का था। लेकिन हमारी टीम और AIIMS नागपुर के स्टाफ ने पूरी मेहनत और समन्वय के साथ इसे सफल बनाया।"
सर्जरी के बाद छगनलाल को सर्जिकल इंटेंसिव केयर यूनिट (SICU) में रखा गया, जहां डॉ सुचेता मेश्राम और उनकी टीम ने उनकी निगरानी की। 15 दिन बाद, छगनलाल को डिस्चार्ज कर दिया गया।

छगनलाल की भावनाएं: "डॉक्टर भगवान हैं"
सर्जरी के बाद छगनलाल ने अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा, "मैंने सोचा था कि अब सब खत्म हो गया। लेकिन डॉ. नीलेश और AIIMS नागपुर की पूरी टीम ने मुझे नई जिंदगी दी। मेरी बेटी की शादी के बाद मैं अपने परिवार के साथ और समय बिताना चाहता था। यह उनके बिना संभव नहीं था।" उनकी आँखों में आँसुओं के साथ-साथ आभार की चमक थी।
छगनलाल के बेटे, मोनू मालवीय, ने कहा, "हमने अपने पिताजी को खोने का डर महसूस किया था। लेकिन डॉ. नीलेश और उनकी टीम ने हमें हर कदम पर हिम्मत दी। हम उनके तहे दिल से आभारी हैं।"
AIIMS नागपुर की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम का योगदान
इस सर्जरी की सफलता में डॉ नीलेश श्रीवास्तव के नेतृत्व के साथ-साथ AIIMS नागपुर की पूरी टीम का योगदान था। डॉ हेमंत बोड़नकर (CTVS सर्जन), डॉ दीपाली (एनेस्थीसिया विशेषज्ञ) और डॉ नितेश ने सर्जरी को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों ने भी रात-दिन मेहनत की। AIIMS नागपुर के कार्यकारी निदेशक डॉ प्रवीण जोशी ने कहा, "यह सर्जरी हमारी प्रतिबद्धता और टीमवर्क का प्रतीक है। हमारी ऑन्को सर्जरी यूनिट जटिल मामलों को संभालने में सक्षम है।"
जागरूकता की जरूरत
इस सर्जरी की सफलता ने AIIMS नागपुर को सुर्खियों में ला दिया। सामाजिक कार्यकर्ता शबाना खान ने कहा, "छगनलाल की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो कैंसर से डरते हैं। AIIMS जैसे संस्थान और उनके समर्पित डॉक्टर साबित करते हैं कि सही इलाज और हौसले से इस बीमारी को हराया जा सकता है।"
डॉ नीलेश ने कैंसर जागरूकता पर जोर देते हुए कहा, "लोग अक्सर गले में दिक्कत या खाना निगलने की समस्या को हल्के में लेते हैं। यह कैंसर का शुरुआती लक्षण हो सकता है। समय पर जाँच और इलाज से जान बचाई जा सकती है।" उन्होंने बताया कि तंबाकू, शराब, और अस्वास्थ्यकर खानपान आहार नली के कैंसर के प्रमुख कारण हैं। "लोगों को जागरूक होने की जरूरत है। अगर कोई लक्षण दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें," उन्होंने सलाह दी।
भविष्य की राह: एक प्रेरणा
छगनलाल मालवीय की यह कहानी केवल एक मरीज की जीत की नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान, डॉक्टरों की मेहनत, और परिवार के विश्वास की जीत है। यह उन तमाम लोगों के लिए एक संदेश है, जो कैंसर को जिंदगी का अंत मान लेते हैं। AIIMS नागपुर की इस उपलब्धि ने न केवल छगनलाल को नई जिंदगी दी, बल्कि यह भी साबित किया कि सही समय पर सही इलाज किसी भी जंग को जीत सकता है।
क्या छगनलाल की तरह और लोग इस बीमारी से लड़ने का हौसला जुटा पाएंगे? क्या जागरूकता और उन्नत चिकित्सा सुविधाएं भारत में कैंसर के खिलाफ जंग को और मजबूत करेंगी? छगनलाल की कहानी इन सवालों का जवाब है-हां, हिम्मत और इलाज से कैंसर को हराया जा सकता है।
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