शरीर के टुकड़े सड़क पर बिखरे रहे, वो अपनी आंखें दान कर रहा था
बैंगलुरु। 20 मिनट तक उसके शरीर के टुकड़े सड़क पर पड़े रहे। उसकी सांसें जाती रही, मदद की गुहार करता रहा वो, लेकिन लोग तमाशबीन बने रहे। 23 साल के हरीश नंजप्पा के शरीर को दो टुकड़े हो गए। नीचे का हिस्सा सड़क के दूसरे किनारे पर पड़ा था, ऊपरी हिस्से में जान थी। वो अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर हाथ उटा-उठाकर लोगों से मदद मांग रहा था, लेकिन असंवेदनशील लोग उसकी मदद के बजाए फोटो और वीडियो बनाने में व्यस्त थे। लोगों की संवेदना भले ही मर गई हो लेकिन हरीश ने मरते-मरते भी इंसानियत की ऐसी मिशाल कायम की जो लोग जीते-जी भी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। बेटे का गम दूर करने के लिए सड़क के गड्ढ़ों को भरता है ये सब्जीवाला

हादसा बैंगलुरु से सटे एनएच 4 पर हुआ, जब हरीश अपने गांव नेलमंगला से वापस बैंगलुरु जा रहा था। वो पंचायत चुनाव में वोट डालने के लिए अपने गांव गया था, जहां से वो सुबह करीब साढ़े 8 बजे अपनी पल्सर बाइक से लौट रहा था, लेकिन हाईवे पर तेज रफ्तार कंटेनर ने उसकी बाइक को टक्कर मार दी। हादसे में हरीश के शरीर के दो टुकड़े हो गए। शरीर में जान बची थी तो वो अपना हाथ उठा-उठाकर लोगों से मदद मांग रहा था, लेकिन कोई मदद को आगे नहीं आया।
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थोड़ी देर बाद कुछ लोगों ने पुलिस को फोन कर इसकी सूचना दी, जिसके बाद पुलिस फौरन उसे एंबुलेंस में लांदकर अस्पताल ले गई, लेकिन रास्ते में अपनी जान बचाने के बजाए हरीश अपने अंग को जरुरतमंद को दान करने की बात करता रहा। हरीश की जान तो नहीं बच पाई, लेकिन मरते-मरते भी वो किसी के अंधेरे जीवन को रौशन कर गया। हरीश ने अपनी आंखें किसी जरिरमद को दान करने की बात कही और हमेशा-हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर ली। हरीश की मौत के बाद अस्पताल में उसकी आंखों को संरक्षित कर लिया गया है।
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डॉक्टरों की माने तो ऐसे हादसों में भी घायलों की जान बचाई जा सकती है अगर उसे वक्त पर डॉक्टरी सहायता मिले। सुप्रीम कोर्ट ने भी सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले लोगों को हर संभव मदद का आश्वासन दिया है, बावजूद इसके भी लोग हादसों के शिकार लोगों की मदद नहीं करते।












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