जिंदगी में सुकून चाहिए तो आइए कतर्नियाघाट, बाघों का दीदार करना हो तो आइए कतर्नियाघाट !
Katarnia Wildlife Sanctuary : कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं। एक बात यह भी कही जाती है कि अगर प्रकृति को पास से निहारना है तो चले आइए कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग।

कतर्नियाघाट में दुर्लभ ही है सुलभ, घने जंगल, नदी-तालाबों के बीच उड़ान भरते पक्षी, मदमस्त होकर नाचता मोर और विचरण करते दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव, इस पूरे वन्य क्षेत्र को दुनिया के सबसे सुन्दर ईको टूरिज्म वाले इलाकों में शुमार किया जाता हैं। कतर्निया वन्यजीव अभयारण्य उत्तर प्रदेश, भारत में ऊपरी गंगा के मैदान में एक संरक्षित क्षेत्र है और बहराइच जिले के तेराई में 400.6 किमी (154.7 वर्ग मील) के क्षेत्र में फैला हैं। 1987 में इसे 'प्रोजेक्ट टाइगर' के दायरे के तहत लाया गया था और किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान के साथ यह दुधवा टाइगर रिजर्व का निर्माण करता है। यह 1975 में स्थापित किया गया था।

अनुकूल वातावरण बाघों की तादाद बढ़ाने में कारगर
अगर आप जंगल में स्वच्छंद विचरण करते बाघों का दीदार करना चाहते हैं तो कतर्निया वन्य जीव विहार चले आइए। यहां का अनुकूल वातावरण बाघों की तादाद बढ़ाने में कारगर साबित हो रहा है। हालांकि विभिन्न कारणों से बीते दस माह में चार बाघों को यह वन क्षेत्र गंवा चुका है। 551 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग को 1975 में अभ्यारण का दर्जा दिया गया। तब से यहां बाघों के संरक्षण को लेकर निरंतर प्रयास किए गए। इसका नतीजा रहा कि बाघों की संख्या बढ़कर 30 तक पहुंच गई।

5 से ज्यादा गेंडे और जंगली हाथी भी पाए जाते हैं
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग सात रेंज में विभक्त है। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में मोतीपुर रेंज, ककरहा रेंज, कतरनिया घाट रेंज, मुर्तिहा रेंज, धर्मापुर व सुजौली रेंज पाई जाती है। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाव में काफी संख्या में जंगली हाथी भी पाए जाते हैं। यहां पर 5 से ज्यादा गेंडे भी मौजूद हैं। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के प्राकृतिक संतुलन हेतु 200 से ज्यादा गिद्ध भी पाए जाते हैं। जंगल में विशालकाय अजगर और कई दुर्लभ सांप भी हिमालय की तलहटी के इस जंगल में मिलते हैं। चीतल की संख्या कई में हजार हैं,लेकिन जाना यह घड़ियालों की वजह से जाता है जो कि विलुप्त होते जीवो के दर्जे में हैं, पूरी नदी में कभी यहां बुलुक से सिर और थूथन निकालते हैं तो कभी मझधार में और वहां दूर फैले गहरे जल में डूबे अकेले काले ठूठ पर।

रेल की छुक-छुक और जंगल का सन्नाटा
आपको बता दें कि कतर्निया घाट कभी रेलवे स्टेशन भी था। जब गोंडा की ओर से छोटी लाइन की गाड़ी गेरुआ नदी के किनारे अंतिम सीटी देती थी। वहीं अब गिरिजापुरी के पास नदी पर सड़क और रेलपुल बन जाने से इसका नक्शा बदल गया। लेकिन पटरी रहित स्टेशन की वीरान उजड़ी इमारत अब भी ठोस इतिहास की तरह सन्नाटे में बोलती खड़ी है, मानो भरे गले से कह रही हो अब यहां कोई टिकट नहीं कटाता।
नहीं आते फ़ोन में सिग्नल
इस जंगल का सबसे सुकून वाला पहलू है इसका किसी भी मोबाइल के सिग्नल से परे होना। दूसरा अखबार भी यहां नहीं आता, सुबह चार बजे आसमान छूते सागौन के चौड़े पत्तों पर ओस की मीठी सुरीली ‘टप्प टप्प' आपकी नींद खोल सकती है। थोड़ी देर बाद झीने-झुटपुटे में परिंदे छोटी-छोटी उड़ाने भरने लगेंगे। 6 बजते-बजते हलदू के बुजुर्ग वृक्ष पर कम उम्र के लाल बंदरों के जोड़े मैथुन शुरू कर चुके होंगे। सागौन के एक दूसरे झुरमुट में शीर्ष पर तोतों के गुच्छे कुतरने से पत्तों पर नीचे तक ‘तड़तड़ तड़तड़' का शब्द सिलसिला चल पड़ता है।

जिंदगी और सुकून का संगीत
इस जंगल में इतनी शांति होती है कि दूर एक परिंदे की आवाज जैसे पूरे जंगल को भेदे जा रही है। ऐसा लगता है कि जैसे इस परिंदे ने तो आसमान ही सर पर उठा लिया है। ऐसे परिवेश में आपकी हल्की-सी पदचाप भी कितनी कृत्रिम, आक्रामक और अतिक्रामक लगती है, खुद ही महसूस करें। कभी-कभी दूर गुजरती ट्रेन और उसके इंजन की मर्दाना आवाज जंगल के जिंदा-जीवंत जनानेपन को रौंदते हुए निकल जाती है।
ट्री हट का लें आनंद
गेरुआ के किनारे ऊंट से दोगुने ऊंचे सेमल पर बने ट्री हट पर एक रात वीराने में बिताना आपकी जिंदगी के सबसे खूबसूरत लमहों में से हो सकता है, लेकिन फिलहाल किसी कारणों से यह बंद है, कई कोणों से गेरुआ के किनारे 70-80 पेड़ों को देखने-परखने के बाद बोटिंग प्वाइंट के पास सेमल के इस ऊंचे दरख्त पर यह अत्याधुनिक हट बनवाया गया है।

घड़ियाल, मगरमच्छ, डॉल्फिन और गिद्ध
सामने दूर तक जल ही जल, अगल-बगल जंगल और नीचे शाम को जुटती सैकड़ों चीतलों की महफिल। सब जगह जिन्हें दुर्लभ माना जाता है, ऐसे चार प्राणी कतर्निया घाट वन प्रदेश के प्रमुख नागरिक हैं। घड़ियाल, मगरमच्छ, डॉल्फिन और गिद्ध, शायद तभी डीएफओ ने इसकी टैगलाइन गढ़ी है 'व्हेयर रेयर इज कॉमन'
हट से उतरकर आप जाने लगें तो नर्सरी में पलते नन्हे शरारती घड़ियालों में से कोई भी आपको आंख मारते हुए जैसे कह उठेगा ‘अच्छा लगा हमारा आशियाना तो कतर्नियाघाट फिर आना ! लेकिन जंगल की इस खला की असल अहमियत मितव्ययी शब्दों वाले डीएफओ ही बताते हैं। उनसे पूछिए कि यहां थक जाने पर आप मनोरंजन कैसे करते हैं? और जवाब सुनिए,‘हम जंगल के भीतर चले जाते हैं, हमारे लिए शांति से बड़ा कोई मनोरंजन नहीं है।
लगातार बढ़ रही है वन्यजीवों की संख्या

2024 तक शावकों की संख्या में दस की बढ़ोतरी हो सकती है
आपको बता दें कि जंगल क्षेत्र में प्रजनन में सक्षम मादा बाघ की संख्या दस के ऊपर है। इसमें पांच के दस से अधिक बच्चों को जन्म देने की संभावना सामने आई है। कुछ बाघिन बच्चों के साथ देखी गईं हैं। इससे उम्मीद जताई जा रही है कि 2024 तक शावकों की संख्या में दस की बढ़ोतरी हो सकती है। उपलब्ध प्राकृतिक वास -बाघों के रहने एवं प्रजनन के लिए उपयुक्त जलवायु। गेरुआ का कछार और बेंत की झाड़ियां बाघों की पसंदीदा आरामगाह हैं। गेरुआ एवं कौड़ियाला के साथ दो दर्जन तालाबों में पर्याप्त जल, शिकार के लिए हिरन, नीलगाय, जंगली सुअर की अच्छी तादाद है।

आइए जानते हैं कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में पर्यटकों के लिए क्या हैं सुविधा
कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ सेंचुरी दो जिला मुख्यालय बहराइच और लखीमपुर खीरी पूरब और पश्चिम में 70 से 100 किमी की दूरी पर है और राह भी थोड़ी कठिन है। नेपाल उत्तर की ओर से सटा लगा हुआ है।
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में पर्यटकों के लिए जंगल सफारी व बोटिंग की सुविधा उपलब्ध है। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं। एक बात यह भी कही जाती है कि अगर प्रकृति को पास से निहारना है तो चले आइए कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग।
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में पर्यटकों के रहने के लिए कई होम स्टे मौजूद हैं, जिनकी ऑनलाइन बुकिंग भी की जा सकती है व कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के जंगल से सटे क्षेत्रों में कई प्राइवेट होम स्टे निर्माण कार्य भी हो चुका है, जिनकी बुकिंग भी की जा रही है।
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क्या कहते हैं प्रभागीय वनाधिकारी आकाशदीप बधावन
कोट दुधवा से संबद्ध कतर्निया वन्य जीव विहार बाघों के प्राकृतिक वास के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। यही कारण है कि यहां निरंतर विचरण करते बाघों को पर्यटक एवं स्थानीय ग्रामीण देख रहे हैं। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में पर्यटकों के लिए होमस्टे थारू थाली, थारू लोकनृत्य के साथ-साथ जंगल सफारी, बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध है।
क्या कहते हैं अध्यक्ष कतर्नियाघाट फ्रेंड्स क्लब भगवानदास लखमानी
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में प्रकृति का वह रूप दिखता है जो कहीं नहीं दिखता। इसलिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में पर्यटक यहां पर जंगली जीवो का दीदार करने आते हैं। हर वर्ष यहां पर पर्यटकों की संख्या बढ़ भी रही है। कतर्नियाघाट फ्रेंड्स क्लब के द्वारा लगातार यहां पर वन्य जीव संरक्षण व वन्यजीवों के हमलों से बचाव हेतु कार्य किए जा रहे हैं और लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है।
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