मोदी के हिंदुत्व से नहीं उनकी जाति से भयभीत नीतीश-नवीन
आखिर रातों-रात ऐसा क्या हो गया कि बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और उनके जैसे ही कई अन्य नेताओं को लोकसभा के लिए जल्द से जल्द एक फ्रंट बनाने की जरुरत महसूस होने लगी। क्योंकि नीतीश कुमार, नवीन पटनायक हो या ममता बनर्जी सभी नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व से नहीं उनकी जाति से डर रहे हैं। क्योंकि हिंदुत्व के रथ पर सवार नरेंद्र मोदी गुजरात में पिछड़े वर्ग के उस समुदाय से आते हैं, जिसे अति पिछड़ा माना जाता है। हालांकि मोदी ने कभी इसे प्रचारित नहीं किया और न ही भुनाया। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा में उनके समर्थक उन्हें पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता के तौर पर पेश कर सकते हैं और यही वो कारण है जिसकी वजह से पिछड़े वर्ग से आने वाले नेता उन्हें आगे बढ़ता नहीं देख सकते।
भाजपा शहरों की खासतौर पर सवर्णों की पार्टी के रूप में जानी जाती है। इसे हिंदुत्व के नाम से तो वोट हासिल हो जाते है लेकिन पिछड़ों, दलितों में यह अपनी पैठ नहीं बना पाती। उत्तर प्रदेश में जनाधार के हिसाब से भाजपा का एक ही नेता आजतक सफल रहा और वह नेता हैं कल्याण सिंह। कल्याण पिछड़ी जाति लोध से आते है और हिंदुत्व के नाम पर सवर्ण हिंदू भी उन्हें अपनी सर आंखों पर बैठाता था। जब तक कल्याण सिंह का भाजपा में वर्चस्व रहा भाजपा उप्र में एक और दो नंबर की खिलाड़ी रही, लेकिन कल्याण के अटल से मनमुटाव के बाद कल्याण जैसे ही भाजपा से अलग हुए भाजपा फिर से सिर्फ सवर्ण हिंदुओं की पार्टी बनकर रह गई।
सोचिए उप्र भाजपा में पिछड़ी जाति के नेता की कितनी मांग रही होगी कि इसी के चलते पहले विनय कटियार को आजमाया गया। फिर उमा भारती को मध्यप्रदेश से लाया गया और पिछले चुनाव में बसपा के दागी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में जगह दे दी गई यह अलग बात है कि कुशवाहा को जल्द की दामन बचाने के चक्कर में पार्टी से बाहर कर दिया गया। उत्तर प्रदेश में करीब 37 फीसद और बिहार में लगभग 47 प्रतिशत आबादी पिछड़े वर्ग की है। मुलायम और नीतीश कुमार दोनों ही पिछड़ी जाति से हैं उसमें नीतीश अति फिछड़ी जाति से आते है। नरेंद्र मोदी भी अति पिछड़ी जाति से हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार में यदि पिछड़ी जाति के सम्मेलन करके नरेंद्र मोदी का सम्मान किया जाने लगा और इस बात को हवा दी गई कि पिछड़ी जाति का एक नेता प्रधानमंत्री होने वाला हैं, तो पिछड़ों के नेताओं के लिए मुसीबत नहीं हो जाएंगी बिहार और यूपी में यदि मोदी पिछड़ों का वोट काटने में थोड़ा भी सफल रहे तो भाजपा की लाटरी निकल सकती हैं।
इसके अलावा पिछले कई महीनों से पिछड़ों के नेता होने के बावजूद मुलायम और नीतीश ने अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों के लिए कई लुभावने वादे किए हैं। उससे पिछड़ी जातियों के कई वर्गों में नाराजगी हैं। क्योंकि उप्र के जिन इलाकों में भी दंगे हुए उन इलाकों में मुसलमानों से हिंदुओं की जिन जातियों का झगड़ा हुआ उनमें कई पिछड़े वर्ग में आती है और जमीनी हकीकत यह हैं कि वह उन इलाकों में दंगे के बाद सरकार द्वारा एक वर्ग को पुचकारे जाने से आहत हैं। मोदी के यूपी-बिहार में उतरने से पिछड़े वोट में सें लगना तय हैं। क्योंकि नीतीश कुमार और मुलायम अपने पीएम बनने का आश्वासन उतनी मजबूती के साथ नहीं प्रतुत कर सकते है जितनी मजबूती के साथ नरेंद्र मोदी। क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी के अब वह सबसे बड़े नेता हैं।













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