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खुद को दोहरा रहा है भाजपाई इतिहास

L K Advani
बैंगलोर। गोवा में हो रही राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वरिष्‍ठ भाजपा नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी ने न जाकर यह जता दिया है कि उन्‍हें बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्‍वीकार्य नहीं है। इस पर राजनीतिक विश्‍लेषकों का मानना है कि भाजपा के पास मोदी के अलावा कोई मजबूत व्‍यक्तित्‍व भी नहीं हैं। जिसके नेतृत्‍व में चुनाव लड़ा जाए। वहीं कांग्रेस भी लगातार घोटालों का आरोप लगने के कारण बैकफुट पर है, कांग्रेस पर बड़े घोटालों के आरोप होने के साथ ही अपने पार्टी अध्‍यक्ष के संबंधियों को लाभ पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं।

अगर दोनों पार्टियों के राजनीतिक हालातों का विश्‍लेषण किया जाय तो यही कहा जा सकता है कि देश का राजनतिक इतिहास खुद को दोहरा रहा है। नीति सेंट्रल में छपे एक लेख के अनुसार ( पढ़ें- एकमेव विकल्‍प मोदी) 1996 में यही स्थिति थी जब कांग्रेस की पी वी नरसिंहराव सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने वाली थी और घोटालों का सामना कर रही थी। वहीं भाजपा के वरिष्‍ठ नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी को संसद से इस्‍तीफा देना पड़ा था। ऐसे में अटल बिहारी बाजपेयी का व्‍यक्तित्‍व ही था जिससे भाजपा सत्‍ता में आने में सफल रही। अटल बिहारी के बारे में कहा गया था कि वही उस समय भाजपा में ऐसे नेता थे जिनकी विश्‍वसनीयता पर किसी को शक नहीं था। इसे मात्र एक संयोग ही कहा जाएगा कि जब 13 दिनों में ही अटल की सरकार गिरी थी तो उन्‍हें फ‍ासिस्‍ट और उनकी सरकार को हिटलर कहा गया था। आज नरेंद्र मोदी के बारे में भी कई कांग्रेसी नेताओ के यही विचार है।

आज भले ही अटल बिहारी बाजपेयी राजनीति से दूर हो पर आडवाणी उसी स्थिति का सामना कर रहे हैं जो उन्‍होने 1996 में किया था। लेकिन तब उन्‍होने अटल बिहारी को आगे कर राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया था। आज भी एक ऐसी ही स्थिति है जब मोदी का कद और व्‍यक्तित्‍व आडवाणी से मजबूत दिखता हैं, उन्‍हें पार्टी के ज्‍यादातर समर्थक प्रधानमंत्री पद का सही उम्‍मीदवार मानते हैं। इसके अलावा देश की जनता भी एक मजबूत नेतृत्‍व की तलाश कर रही है।

गोवा में भाजपा की राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा के वरिष्‍ठ नेता यशवंत सिंहा भी नहीं आये। उन्‍होने अपना मत स्‍पष्‍ट कर दिया कि वह मोदी को चुनाव प्रचार समिति की कमान सौंपने के पक्ष में नहीं है। वहीं कांग्रेस के नेताओं को इस पर चुटकी लेने का मौका मिल गया है। अब देखना ये हैं कि पार्टी इस मुश्किल वक्‍त में कैसे एकमत होकर आने वाले चुनावों के लिए रणनीतियां तय करती है।

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