क्या पोर्न साइटों पर प्रतिबंध रोक पायेगा बलात्कार?
नयी दिल्ली। देश की सर्वोच्य अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने देश में पोर्न साइटों के प्रसार मामले पर केन्द्र सरकार से मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले को गंभीरता से लिया है। क्या भारत की सर्वोच्य अदालत पाकिस्तान, चीन, गयाना, मिस्र और दक्षिण कोरिया के रास्ते पर चलते हुए इंटरनेट पोर्नोग्राफी को गैर कानूनी करार देगी और अश्लील सामग्री परोस रहीं वेबसाइट पर बैन लगाएगी? अगर ऐसा होता है तो कोर्ट के रास्ते में कई रुकावटें आ सकती है। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे बलात्कार रुकेंगे?
भारत में पौर्न साइटों के बढ़ते चलन को महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध से जोड़ते हुए कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डालकर देश के सामने ये सवाल खड़ा कर दिया है कि इंटरनेट पर अश्लील साम्रगी परोसने वाले साइट से क्या महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे है। कमलेश वासवानी की याचिका के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर अश्लील वेबसाइट के प्रसार को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इस बारे में नोटिस जारी कर केंद्र से जवाब मांगा है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली बेंच ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय समेत दो और विभागों को इससे संबंधित नोटिस जारी किया। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा है कि इंटरनेट पर इन पोर्न साइटों पर बच्चों से संबंधित अश्लीलता दिखाई जा रही है। इसे बहुत से बच्चे देखते हैं। इससे बच्चों की मानसिकता पर गलत असर पड़ता है और समाज में अपराध बढ़ता है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में कहा गया है कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री ने सेक्स को लेकर लोगों की बुनियादी समझ को ही हिलाकर रख दिया है। इसकी वजह से महिलाओं पर यौन अपराध भी बढ़ रहे हैं। भारत जैसे देश में जहां सेक्स पर सार्वजनिक तौर पर बात करना गलत समझा जाता है, वहां पोर्न वीडियो, तस्वीरों और सेक्स ट्वॉय का धंधा फलना-फूलना एक खतरनाक लक्षण है। याचिकाकर्ता ने दिल्ली गैंगरेप की घटना का जिक्र करते हुए अपनी याचिका में इस बात का जिक्र किया है कि महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने वाले शख्स के दिमाग पर पोर्न सामग्री का असर पड़ता है। रेप करने वाला शख्स सिर्फ सेक्शुअल रिलीज से संतुष्टि नहीं प्राप्त करता है, बल्कि महिला पर काबू पोने, ताकत और वर्चस्व स्थापित करना भी उसे सुख देता है।
लेकिन सवाल ये है कि क्या पोर्न साइटों पर बैन यौन हिंसा को रोकने की गारंटी है? अगर इस का जबाव हां तो क्या उन देशों में महिलाओं का यौन शोषण नहीं जहां पार्न साइटों पर बैन है। हिन्दी वैबसाइट दैनिक भास्कर में छपी एक खबर के मुताबिक ह्युमन राइट्स वॉच की एक स्टडी के मुताबिक पाकिस्तान में हर दो घंटे पर औसतन एक रेप और हर 8 घंटे में गैंगरेप होता है। अगर सरकार पोर्न साइटों पर बैन लगाती है तो इंटरनेट को कितना नुकसान होगा ये सरकार को सोचना होगा। इस वक्त इंटरनेट पर कई मिलियन पोर्न साइटें मौजूद है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में जून, 2012 तक 13.70 करोड़ लोग इंटरनेट यूजर थे। इनमें 9.9 करोड़ इंटरनेट यूजर शहरी इलाकों में और 3.8 करोड़ ग्रामीण इलाकों के थे। 2011-12 में भारत में इंटरनेट यूजरों की तादाद 16 फीसदी बढ़ी है। वहीं इंटरनेट पर आने वाला तकरीबन 30 फीसदी ट्रैफिक पोर्न साइटों से जुड़ा होता है। दुनिया की सबसे बड़ी पोर्न वेबसाइट 'एक्सवीडियोज' को हर महीने 4.4 अरब पेज व्यूज मिलते हैं। दुनिया भर में 30 हजार लोग हर सेकेंड पोर्न वेबसाइट्स या अश्लील सामग्री देख रहे हैं।
इंटरनेट पर ऐसी पोर्न साइटों को सौ फीसदी रोकना नामुमकिन है। इंटरनेट पर कई मिलियन पोर्न वेबसाइट्स मौजूद हैं। बैन के बावजूद तकनीकी रूप से दक्ष यूजर तो प्रॉक्सी सर्वर और वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क्स का इस्तेमाल कर अश्लील सामग्री देख सकता है।अगर भारत में इंटरनेट पर अश्लील सामग्री पर प्रतिबंध लगेगा तो ऑनलाइन कम्युनिटी की ओर से इसके जोरदार विरोध की संभावना है। अगर सुप्रीम कोर्ट भारत में अश्लील वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाता है और इसे तोड़ने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान करता है तो कानून- व्यवस्था बनाए रखने का काम करने वाली एजेंसियों पर जबर्दस्त दबाव पड़ेगा। ऑनलाइन कम्युनिटी अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकार के आधार पर ऐसे प्रतिबंध का विरोध कर सकते है। इतना ही नहीं सरकार को जबाव देना होगा कि क्या पोर्न साइट पर बैन महिलाओं को सुरक्षित कर पाएंगी।












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