कहां गया राहुल गांधी का बुंदेलखंड-प्रेम?

झांसी। लगता है कि बुंदेलखंड और कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी रिश्ते गुजरे जमाने की बात हो चली है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अपेक्षा के अनुरूप नतीजे न आने पर राहुल ने मुड़कर इस इलाके का रुख करना मुनासिब नहीं समझा।

पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले वर्षो से समस्याओं का पर्याय बन चुके बुंदेलखंड के हालात ने राहुल गांधी को अंदर तक हिलाकर रख दिया था। चुनाव से पहले वह यहां की समस्याओं को देखकर इतने विचलित हुए कि इस इलाके की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठा लिया। उन्हीं की कोशिशों का नतीजा था कि केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले बुंदेलखंड के 13 जिलों के लिए विशेष पैकेज मंजूर किया।

केंद्र सरकार द्वारा मंजूर किए गए पैकेज से यहां के आम-आदमी को फायदा हुआ हो या नहीं, सरकारी अमले और राजनेता जरूर मालामाल हुए हैं। जो नहरें बनी हैं वे अपना हाल खुद बयां कर रही हैं। नलजल योजना लोगों का गला तर नहीं कर पा रही है और अन्य योजनाओं का भी कमोबेश यही हाल है।

राहुल गांधी ने कभी इस इलाके के हालात से रूबरू होने के लिए गड्ढ़ों में बदल चुकी सड़कों पर हिचकोले खाते हुए सैकड़ों किलोमीटर का रास्ता तय किया था और एक गरीब के घर में मच्छरों के हमलों के बीच रात गुजारी थी। उन्होंने गरीब के घर की रोटी खाकर उनके पेट भरने के तरीके को जाना था।

राहुल ने लगभग पांच वर्षो (वर्ष 2008 से 2012) में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के सात जिलों झांसी, ललितपुर, जालौन, बांदा, हमीरपुर, महोबा और कर्वी के कई दौरे किए थे। इतना ही नहीं, इस अवधि में राहुल कहीं भी रहे हों मगर उन्होंने बुंदेलखंड को नहीं भूला। वह मौके-बेमौके इस इलाके की चर्चा भी करते रहे, मगर वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उन्हें निराश कर दिया।

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बुंदेलखंड की 19 सीटों में से सिर्फ चार स्थानों पर ही कांग्रेस के उम्मीदवार जीत हासिल कर पाए और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) व समाजवादी पार्टी (सपा) की बढ़त बरकरार रही। यह बात अलग है कि वर्ष 2007 के मुकाबले कांग्रेस की एक सीट में इजाफा हुआ था।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड के नतीजे कांग्रेस के हक में न आने पर राहुल की प्राथमिकता में यह इलाका कहीं नीचे चला गया जान पड़ता है। बीते पांच वर्षो में कम ही ऐसे अवसर आए, जब इस इलाके का उनके प्रवास में एक वर्ष का अंतराल रहा हो, मगर चुनावी नतीजे के बाद से अब तक राहुल का कोई दौरा बुंदेलखंड में नहीं हुआ है। यही कारण है कि कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।

बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा का कहना है कि राहुल गांधी ने बुंदेलखंड को राजनीतिक क्षितिज पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी कोशिशों के चलते पैकेज मिला, मगर उनके प्रवास पर लगे अचानक ब्रेक से लोगों के बीच यह संदेश तो जाने ही लगा है कि उन्हें इस इलाके के पिछड़ेपन से नहीं, वोट से मतलब था। राहुल की बुंदेलखंड से बढ़ी दूरी के चलते कांग्रेस नेताओं को लगने लगा है कि अगर बेरुखी का यही दौर आगे जारी रहा तो लोकसभा चुनाव में उनकी नैया कैसे पार लगेगी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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