उत्तर प्रदेश में मुस्लिम सियासत ले रही करवट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा ही बदलाव की वाहक रही है। अतीत में भी यहां की राजनीति बड़े उलटफेरों का शिकार होती रही है, लेकिन इस बार मुसलमानों की सियासत करवट ले रही है। ऐसे समय में अपने आपको मुसलमानों का नेता मानने वाले लोगों ने अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव की आहट को देखते हुए विपक्षियों पर दबाव बनाने की मुहिम शुरू कर दी है।
देश की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले उप्र की सियासत में मुसलमानों की अनदेखी करके कोई चुनाव नहीं जीता जा सकता। सूबे के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी गाहे-बगाहे अक्सर अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी वफादारी का सबूत देते रहे हैं। एक दिन पहले ही अपनी घोषणाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने मुसलमानों का भरोसा जीतने की भरपूर कोशिश की, लेकिन लगता है मुसलमानों को अब उन पर और उनकी कार्यशैली पर भरोसा नहीं रहा।
सपा सरकार के एक वर्ष पूरे होने पर राजधानी में एक तरफ जहां पूरा सरकारी अमला उपलब्धियों का बखान कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े नेता और दबाव की राजनीति में माहिर कहे जाने वाले आजम खान इन समारोहों में कहीं नजर नहीं आए। पूरे कार्यक्रम के दौरान आजम की गैर-मौजूदगी ही चर्चा का विषय बनी रही।
सपा के एक बड़े नेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, "यह दबाव की राजनीति ही है। ऐसे लोग हर समय अपनी ही बातें मनवाने की जिद करते रहते हैं जो पार्टी के लिए फायदेमंद नहीं है। नेताजी को भी इस बात को समझना चाहिए।" उन्होंने बताया कि दिल्ली के शाही इमाम मौलाना बुखारी और आजम खान की आपसी खींचतान का नतीजा सपा को भुगतना पड़ रहा है। सपा को इस दबाव की राजनीति से निकलना ही होगा।
राजनीतिक जानकारों को भी यह मानने से गुरेज नहीं है कि आजम और बुखारी के बीच होड़ इस बात की है कि कौन मुसलमानों का असली नेता है। आजम को तवज्जो मिलने पर बुखारी रूठ जाते हैं तो बुखारी को तवज्जो मिलने पर आजम नाराज हो जाते हैं। बुखारी ने एक दिन पहले ही यह कहकर सपा से अपने सारे रिश्ते तोड़ने की घोषणा कर दी थी कि सपा के शासनकाल में उप्र में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए अब मुलायम को मुसलमानों का वोट नहीं मिलेगा। बुखारी ने कहा, "सपा के शासनकाल में बड़े पैमाने पर दंगे हुए, जिसमें मुसलमानों का काफी नुकसान हुआ। अब मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में अब मुलायम को मुसलमानों का वोट नहीं मिलेगा।"
उन्होंने आगे कहा, "बीते एक वर्ष में सपा अपने उस वादे पर अमल करती नहीं दिखी जिसका उसने मुसलमानों से वादा किया था।" बुखारी ने दो कदम और आगे बढ़ते हुए यह भी एलान कर दिया कि 21 अप्रैल को इटावा में आयोजित होने वाले सम्मेलन में वह नहीं जाएंगे। इस सम्मेलन में दंगे से प्रभावित हुए मुसलमानों को भी बुलाया गया है।
राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक हृदय नारायण दीक्षित ने कहा, "बुखारी की यह रणनीति आम चुनाव से पहले मुलायम पर दबाव बनाने की ही है, लेकिन इसे दूसरे नजरिये से भी देखा जा सकता है। कहीं बुखारी का सपा से मोहभंग और कांग्रेस से जुड़ाव तो नहीं हो रहा है। यह भी वजह हो सकती है।" सपा के अंदर आजम की बढ़ती शख्सियत की वजह से शायद बुखारी ने आम चुनाव में समय रहते अपना पाला बदल लिया। अब सपा की ओर से आजम मुसलमानों के सबसे बड़े नेता होंगे, लेकिन बुखारी के हटने से मुसलमानों के एक बहुत बड़े तबके के सपा से दूर जाने का भी खतरा पैदा हो गया है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा, "सरकार पूरे वर्ष अपने अंतर्विरोधों से ही जूझती रही। इसीलिए अब सपा की तुष्टीकरण की नीति उसी पर भारी पड़ रही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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