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कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे 'आप'

By Ishwar
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अन्‍ना हजारे के साथ मिलकर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले अरविंद केजरीवाल ने अपनी आम आदमी पार्टी (आप) की घोषणा कर लोगों को राजनीतिक विकल्‍प तो दे दिया। केजरीवाल के समर्थन में उमड़े जनसैलाब को देख लोगों को लगने लगा कि 'आप' कांग्रेस को सत्‍ता से बेदखल जरूर कर देगी। अगर आप भी यही सोच रहे हैं, तो आप गलत हैं, क्‍योंकि 'आप' कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे।

जिस तरह से देश की आम जनता महंगाई, कुशासन और हर रोज नये घोटालों को देख रही है, उससे तो यही लगता है कि वह एक सच्‍चे नेतृत्‍व की तलाश में हैं। अगर भ्रष्‍टाचार की बात की जाये तो इस पर दोनों ही राष्‍ट्रीय पार्टियों की स्थिति एक जैसी है। जहां कांग्रेस के शासन काल में राष्‍ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, किसानों को आवंटित किये गये धन में घोटाले और टू जी घोटाले सामने आये हैं वही भाजपा के कुछ बड़े नेताओं पर घोटाले के आरोप लगे हैं साथ ही पार्टी भी प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के नाम को लेकर कश्‍मकश में है। इन हालात को देखते हुए जिस तरह देश का युवा अन्‍ना हजारे के आंदोलन से जुड़ा उससे अगर केजरीवाल को लोकसभा में कुछ सींटें मिल जाये तो आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि आप को कितनी सीटें मिलेंगी। और यह निर्भर करता है अरविंद केजरीवाल की दिशा और दशा पर।

Arvind Kejriwal

ग्रामीण वोटरों से कोसो दूर

केजरीवाल ने अपनी दिशा निर्धारित की, लेकिन संसद तक का मार्ग शहरों से होते हुए जाता है। अपनी 'आम आदमी पार्टी' के नाम की घोषणा करने के बाद अभी तक ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को जोड़ने के लिए कुछ खास कदम नहीं उठाये है। उनके आंदोलन में ज्‍यादातर शहरों के लोग ही सम्मिलित हुए है। जबकि गांव का वोटर ही चुनाव में सबसे ज्‍यादा असर डालता है।

युवाओं को वोट बैंक में बदलना

अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों से लोकपाल बिल पर संसद में सुनवाई हो सकती है, निर्भया को न्‍याय मिल सकता है, लेकिन एक बेरोजगार को नौकरी नहीं। लिहाजा अगले कुछ ही महीनों में युवाओं को इस बात के लिये आश्‍वस्‍त करना कि 'आप' की सरकार में उनका भविष्‍य सुरक्षित होगा, बेहद मुश्किल है। खास बात यह है कि केजरीवाल ने अब तक दिल्‍ली में बिजली, पानी के मुद्दे तो उठाये, लेकिन युवाओं से जुड़ी समस्‍याओं जैसे रोजगार और शिक्षा आदि पर फोकस नहीं किया है।

सोच को बदलना

केजरीवाल और उनकी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सोच को बदलने की भी है, आज के राजनीतिक हालात से युवाओं का राजनीति से मोहभंग हो गया है। अत: युवाओं को पार्टी से जोड़ना उनके लिए एक बड़ी चुनौती होगी। लेकिन उन्‍हें यह नहीं भूलना चाहिये कि हर गली-मोहल्‍ले में राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, मायावती, मुलायम और अखिलेश यादव जैसे दिग्‍गजों के भक्‍त मौजूद हैं। केजरीवाल के लिये इन लोगों के वोट खींचना आसान नहीं होगा।

वैसे राजनीति विदों का यह भी कहना है कि आने वाले दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल और उनकी पार्टी की वास्‍तविक स्थिति का अंदाजा हो जाएगा कि वह कितने प्रतिशत वोट पा सकेंगे क्‍योंकि घोटालों और आरोपों के बावजूद कई राज्‍यों में हुए चुनावों में आम जनता ने इस बार भी कांग्रेस और भाजपा को ही चुना है और अगर परिणाम कर्नाटक निकाय चुनाव जैसे आये, तब तो 'आप' क्‍या भाजपा भी कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी।

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English summary
The current political equations are directly indicating that Arvind kejriwal's Aam Aadmi Party (AAP) is incapable to unthrone Congress in Loksabha election 2014.
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