मरीज की आंख गई, डॉक्टर ने भरे 25000 रुपये

Court
नई दिल्ली। मोतियाबिंद के आपरेशन के दौरान आंख की रोशनी खो देने वाली महिला को घटना के 15 साल बाद सर्वोच्च उपभोक्ता अदालत ने 25,000 रुपये का मुआवजा दिलाया। उपभोक्ता अदालत ने पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि चिकित्सक को आपरेशन से पहले मरीज को बेहोशी का इंजेक्शन लगाते हुए इस बात का ध्यान रखना था कि मरीज के शरीर में कोई हरकत न हो। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने गुजरात के भावनगर निवासी पार्वतीबेन भीमजीभाई राठौड़ के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि डॉक्टर शिवकुमार चंद्र शेखर की लापरवाही की वजह से उन्हें मोतियाबिंद के आपरेशन के दौरान बांईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए गंवानी पड़ी।

भावनगर स्थित भजरंगदास अस्पताल में कार्यरत डॉ. शेखर ने दुर्घटना के लिए मरीज को कुसूरवार ठहराते हुए आरोप लगाया था कि सर्जरी के दौरान अंगों को शिथिल कर देने वाला इंजेक्शन लगाए जाने के बावजूद मरीज अपना सिर और हाथ को हिला रही थी। मगर आयोग ने डॉ. शेखर की याचिका खारिज कर दी। मामले की सुनवाई कर रहे आयोग के सदस्य के. एस. चौधरी और सुरेश चंद्रा ने अपने फैसले में कहा, "इलाज के दौरान मरीज को तीन बार अंगों को शिथिल कर देने वाला इंजेक्शन दिया गया था। इससे यह साबित होता है कि एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाए जाने के बाद भी यदि मरीज के शरीर में हरकत थी तो डाक्टर ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि इस स्थिति में क्या किया जाना चाहिए।"

सर्वोच्च उपभोक्ता न्यायालय ने डॉ. शेखर को 25,000 रुपये का हर्जाना भरने का आदेश दिया। यह राशि पीड़िता को मुआवजे के रूप में दी गई। पीड़िता के मुताबिक, भावनगर अस्पताल में आपरेशन असफल रहने के तुरंत बाद उन्हें अहमदाबाद के सरकारी अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टर ने कहा कि पहले आपरेशन के दौरान की गई बड़ी गलती के कारण अब उनकी आंख ठीक नहीं हो सकती। भजरंगदास अस्पताल और डॉक्टर शिवकुमार चंद्र शेखर के पास हालांकि इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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