वैलेंटाइन डे मना रही ये मछली कहती है ILU

लखनऊ। चैकिये मत यह कोई कोरी कल्पना नही है बल्कि हकीकत है। एक्वेरियम में पाली जाने वाली चिकलेट (सिचलेट) प्रजाति की मछली पैरेट पर दोनों तरफ आई , फिर दिल बना है और फिर यू लिखा है। यह किसी कलाकार की कलाकारी नही बल्कि विज्ञान की देन है। लखनऊ के एक्वेरिस्ट इन्द्र मणि राजा के पास यह मछली है।

इस मछली के बारे में इंद्रमणि बताते हैं कि पैरेट नाम की मछली को उसके आकार के कारण पैरेट कहते है क्योकि उसका मुंह पैरेट की तरह होता है और मुख्य बात यह है कि यह हाईब्रिड फिश है इसे प्राकृतिक तौर पर नही पाया जाता है इस कारण इसका कोई वैज्ञानिक नाम भी नही है। चिकलेट की दो प्रजातियों को मिला कर इसे बनाया गया है। इस कार्य का श्रेय ताईवान के मत्स्य उत्पादकों को जाता है जहां पर 1986 में पहली बार उक्त मछली को तैयार किया गया था। जिसका रंग लाल था और मुंह तोते की तरह। ताइवान के उत्पादकों ने उक्त मछली को सजावटी मछली की श्रेणी में रखा और उसको पूरी दुनियां में निर्यात कर मछली के शौकीन लोगों के एक्वेरियम तक पहुंचाया।

इंद्रमणि ने बताया कि चीन अब उक्त मछली का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और उसने जो किया वह चैकानें वाला है। अब पैरेट को चीन में काफी विकसित किया गया है और जो भी पैरेट नाम की मछली भारत आ रही है व चीन की है। चीन ने एक अभिनव प्रयोग कर पैरेट नाम की इस मछली में उसके हारमोन में परिर्वतन कर कई रंग दिये है और यही तकनीक का इस्तेमाल कर उसमें लिखने की पहल भी की है जो आप के सामने है।

उन्होंने बताया कि जो मछली उनके पास है उसके दोनों तरफ आई लिखा है फिर दिल बना है और फिर यू लिखा है। हल्के पीले रंग की मछली के उपर लाल रंग से यह लिखा गया है। लिखने के लिए मत्स्य उत्पादक इस प्रकार से डाई को इंजेक्ट करते है कि मछली पर वह शब्द उभर जाते है। इस मछली की कीमत भी अन्य कीमतों से ज्यादा होती है। जो मछली श्री राजा के पास है उसकी कीमत 11 हजार रुपया है।

पैरेट मछली की औसत आयू दस वर्ष होती है और अच्छे रख रखाव व भोजन से उनका रंग बना रहता है। इनको खिलाने के लिए सबसे ज्यादा वैज्ञानिक भोजन जर्मनी से आता है लेकिन अगर पैरेट को उबाल कर कलेजी खिलाई जाये तो उसका रंग चटक रहता है। पैरेट पालने वालों की सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि उसके रंग को बरकरार नही रख पाते है। मत्स्य उत्पादक इस प्रकार की मछली को विकसित करने में काफी समय लगाते है क्योकि इन मछलियों पर लिखना और सफल हो जाना कहीं एक हजार मछली में एक बार ही संभव हो पाता है। उक्त मछली की औसत आयू दस वर्ष होती है।

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