कसाब के बाद अफजल, यूपीए इतनी तत्पर क्यों?
नयी दिल्ली। 13 दिसंबर 2001 में संसद हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरु को कल बड़े ही गोपनय तरीके से मौत दे दी गई। किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई लेकिन अफजल की मौत के बाद सरकार के इस कदम की जमकर लोचना हो रही है। विपक्षी पार्टी बीजेपी समेत कई जानकार इसे कांग्रेस की सियासी ऐजेंडा बता रहे है। देश की गिरती अर्थव्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार से निपटने में नाकामयाब यूपीए सरकार पल से ही परेशान और लोगों ची आलोचनाएं झेल रही थी, ऊपर से अन्ना का आंदोलन और समाजसेवी अरविंद केजरीवाल का हररोज किसी ना किसी कांग्रेसमंत्री या कांग्रेस परिवार के दामाद को लेकर किया जा रहा खुलासा सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गया थी। वहीं एफडीआई के मुद्दे पर सरकार से नाराज ममता ने भी अपना हाथ खींच लिया है।
कांग्रेस सरकार की स्थिति जल बिन मछली की भांति हो गई है। ऐसे में कई जानकारों को मानना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और कई राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों के लिए कांग्रेस के पास कोई चुनावी मुद्दा ही नहीं बचा है। मंहगाई हो या फिर करप्शन सरकार हर तरफ से बैकफुट पर है। ऊपर से नरेन्द्र मोदी की गाथा उसके सिर का दर्द बनती जा रही है।

मोदी का इमेज पीएम उम्मीदवारी के लिए बढ़ना यूपीए सरकार के लिए खतरे की घंटी बजने के बराबर है। ऐसे में आंतकवाद को मुद्दा बनाकर सरकर आने वाले चुनावों में अपनी डुबती नैया को पार लगाने की कोशिश करना चाहती है। कांग्रेस आंतकवाद के खिलाफ अपने उठाए गए कदमों को ही अपनी बैसाखी बनाकर अपनी पीठ थपथपाने की जुगत में है। तभी तो केवल तीन महिनें के अंतराल में सरकार अंतक के खिलाफ जीरो टॉलरेंश दिखाने की कोशिश की है।
कुछ महिनों पहले चुपचाप तरीके मुबंई हमले में पकड़े गए आंतकी अजमल आमिर कसाब को फांसी दी गई और अब संसद हमले के मास्टमांइड अफजल गुरु को मौत दे दी गई। बीजेपी को बैठे बिठाए मुद्दा मिल गया तो उसने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने अपने बयान में कहा कि अगर सरकार आंतकवाद को लेकर इतनी गंभीर है तो अफजल को फांसी देने में 12 साल कैसे लग गए। अगर सरकार आंतक को लेकर गंभीर है तो पोटा कानून क्यों नहीं लगा रही है। बीजेपी क सवालों को जबाव देने के बजाय कांग्रेसी अपनी पीठ ही थपथपा रहे है। कांग्रेस की ओर से मनीष तिवारी ने विपक्ष पर जोरदार हमला करते हुए कहा कि आज देश की राष्ट्रीय सुरक्षा एनडीए सरकार से बेहतर है।
उन्होंने बताया कि अफजल को राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। सरकार के फैसले पर विवाद उचित नहीं है। जहां बीजेपी यूपीए सरकार पर आतंक पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है तो वही कंग्रेस इसे राष्ट्र हित का नाम देकर अपनी छवि बचाने की कोशिश कर रही है। देश के दोनों प्रमुख पार्टियां भले ही एक-दूसरे पर बयानबाजी कर रही हो लेकिन आंतकवनाद को मुद्दा बना कर वौटबैंक की राजनीति करना कांग्रेस को कितना महंगा पड़ता है ये तो आने वाला चुनाव ही बताएंगा।












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