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दिल्‍ली गैंगरेप: कानून बदल कर भी नहीं दी जा सकती फांसी

By रामलाल जयन
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बांदा। राजधानी दिल्ली में चलती बस में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में पूरे देश में उबल रहा है और अभियुक्तों को चैतरफा फांसी दिए जाने की मांग उठ रही है। यहां तक कि कानून बनाने और जानने वाले भी फांसी दिए जाने के पक्षधर हैं, लेकिन सच यह है कि ‘कानून बदल कर भी अभियुक्तों को कानूनन फांसी नहीं दी जा सकती।' वजह भी साफ है कि संविधान का अनुच्छेद-20 इसकी इजाजत नहीं देता।

राजधानी दिल्ली में चलती बस में एक मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में पूरे देश में चैतरफा आन्दोलन चल रहा है और आन्दोलनकारी अभियुक्तों को फांसी दिए जाने की मांग कर रहे हैं। यहां तक कि कानून बनाने और जानने वाले भी कानून संशोधन कर फांसी दिए जाने के पक्षधर दिखाई दे रहे हैं। फांसी दिए जाने के पक्षधर राजनेता यह जानते हैं कि ‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद-20 में यह प्रावधान है कि किसी भी घटित अपराध में मौजूदा कानून के तहत ही सजा दी जा सकती है, संशोधन कर नहीं। मौजूदा कानून के अंतर्गत गैंगरेप में अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का ही प्रावधान है, यह सजा बालिग आरोपी पर ही़ लागू होगी। नाबालिग आरोपी को अधिकतम तीन साल की ही सजा हो सकती है और उसे जेल या पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता, उसे सिर्फ बाल सुधार गृह में ही रखा जाएगा।'

Delhi gang rape: Changing law is not solution

अनुच्छेद-20 को ही संशोधित कर ‘फांसी' की सजा का प्रावधान किया जा सकता है। लेकिन इस अनुच्छेद में संशोधन इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘मौलिक अधिकार' निहित हैं। शायद यही बाध्यता है कि केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे कड़ी सजा दिए जाने की बात तो करते हैं, किन्तु फांसी दिए जाने पर चुप्पी साध लेते हैं। एक तरफ संविधान यह कहता है तो दूसरी तरफ दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित आरोपियों को फांसी की सजा देने की वकालत कर चुकी हैं, शायद वह देश में उमड़े जनाक्रोश को देखते हुए ऐसा कह रही हैं या फिर जनाक्रोश को गुमराह करने का प्रयास कर रही होंगी।

कानून विद् और अधिवक्ता संघ बांदा के पूर्व अध्यक्ष रणवीर सिंह चैहान बताते हैं कि ‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद-20 के तहत ही किसी अपराध में अपराधी को सजा दिए जाने का प्रावधान है। भारतीय दण्ड़ संहिता (आईपीसी) की धारा-376 (रेप) या 376 (2) (गैंगरेप) में घटना की ग्राहता को देखते हुए अधिकतम आजीवन कारावास की सजा ही दी जा सकती है।'

वह कहते हैं कि ‘इस अनुच्छेद में स्पष्ट उल्लेख है कि घटित अपराध में मौजूदा कानून के तहत ही सजा दी जा सकती है, कानून बदल कर दी गई सजा गैर कानूनी होगी और मानावाधिर का उल्लंघन माना जाएगा।' अधिवक्ता रणवीर सिंह चैहान कहते हैं कि ‘मौजूदा कानून में बलात्कार की शिकार पीडि़ता की मौत होने पर आरोपी या आरोपियों को ‘मौत' की सजा दी जा सकती है, बशर्ते पुलिस को अदालत में यह साबित करना होगा कि पीडि़ता की मौत बलात्कार की वजह से ही हुई है। ऐसी स्थिति में बचाव पक्ष का अधिवक्ता अदालत में यह तर्क दे सकता है कि पीडि़ता की मौत बलात्कार से नहीं, बल्कि उपचार में हुई लापरवाही से हुई है।'

कुल मिलाकर यह कहना गलत न होगा कि ‘दिल्ली गैंगरेप के मामले में देश में चाहे जितना उबाल आ जाए किसी भी दशा में अभियुक्तों को मौत की सजा नहीं दी जा सकती। यदि केन्द्र सरकार कानून में संशोधन कर बलात्कार में ‘मौत' की सजा का भी प्रावधान करती है तो भविष्य में घटित होने वाले बलात्कार के मामलों में ही ‘मौत' की सजा संभव है।

एक तरफ देश को दहला देने वाली इस घटना से चैतरफा जनाक्रोश भड़का है और युवा वर्ग आरोपियों को फांसी की सजा दिए की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ महिला जन संगठन ‘नागिन गैंग' की चीफ कमांडर शीलू निषाद अपने गांव शहबाजपुर में स्थापित देवी दुर्गा के मन्दिर में पूजा-अर्चना कर सिंगापुर के एलिजाबेथ अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही पीडि़ता के शीघ्र स्वस्थ्य होने की दुआ मांग रही हैं। उनका कहना है कि ‘मां दुर्गा में राक्षसों के वध करने की ताकत मौजूद है, वह अपनी इस ताकत से पीडि़ता को बचा सकती हैं और पीडि़ता को इन राक्षसों सें बदला लेने के लिए दुनिया में वापस भेज सकती हैं।'

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English summary
Giving reaction over Delhi gang rape, many law specialists said that changing law is not the solution of this case.
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